मित्रों आप सभी लोगों को नमस्कार कबीर के दोहे सम्पूर्ण 54000 शब्दों में Part-1 (kabir ke dohe) इस ब्लॉग पोस्ट पर आपको मिलेगा,ब्लॉग वेबपेज पर स्पीड से दिखे जिससे आप लोगों को सुविधा हो इसलिए इसे 7 पार्ट में बनाया गया है.
साखी – गुरुदेव को अंग,कबीर के दोहे सम्पूर्ण 54000 शब्दों में
सतगुर सवाँन को सगा, सोधी सईं न दाति।
हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाति॥1॥
अर्थ- इस पंक्ति में कहा गया है कि सतगुर (सत्पुरुष या गुरु) सभी को जानता है और उनकी कृपा से ही आत्मा को मुक्ति की प्राप्ति हो सकती है। आत्मा खोजने का मार्ग सतगुर के माध्यम से ही संभव है। सतगुर के माध्यम से हरिजी (भगवान) की सेवा करने का महत्व बताया गया है। यहां यह भी कहा जाता है कि सतगुर के साथ ही सभी लोग समान होते हैं, जन्म-जाति का कोई महत्व नहीं रखता।
बलिहारी गुर आपणैं द्यौं हाड़ी कै बार।
जिनि मानिष तैं देवता, करत न लागी बार॥2॥
अर्थ-श्रद्धाभक्ति और गुरु के प्रति कृतज्ञता का अभिवादन है। “बलिहारी” का अर्थ होता है “बड़ी भाग्यशाली” या “बड़ी कृतज्ञता”। यहां भक्त गुरु की महत्वपूर्णता को मानता है और उनकी सेवा करने में अपनी अद्वितीय भाग्यशालीता को स्वीकार करता है। “आपणैं द्यौं हाड़ी कै बार” का अर्थ है कि गुरु की सेवा करना बड़ी भाग्यशालीता है, जो आत्मा को मुक्ति की दिशा में ले जा सकता है। जो व्यक्ति गुरु की सेवा करता है, वह वास्तव में देवता के समान हो जाता है और उस पर कोई दुर्बलता नहीं होती। “देवता” शब्द यहां दिखावा करता है कि गुरु आत्मा को उच्चतम आदर्शों और दिव्यता की दिशा में प्रेरित करने में मदद करते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि गुरु की सेवा में आत्मा को अनंत सत्य का अनुभव होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सतगुर की महिमा, अनँत, अनँत किया उपगार।
लोचन अनँत उघाड़िया, अनँत दिखावणहार॥3॥
अर्थ- यह एक प्रशंसा (भक्ति) कविता का शुरुआती भाग है, जो एक सतगुरु की महिमा को स्तुति करने के लिए है। इसमें सतगुरु की अद्वितीयता और उसकी अनंत गुणगान किया गया है। इस प्रकार की कविताएँ आमतौर पर भक्ति और आत्मा के साथ दिव्य जीवन की ऊँचाईयों की ओर प्रेरित करने के लिए लिखी जाती हैं।सतगुरु की महिमा” का मतलब है कि सतगुरु की अद्वितीयता और महिमा अनंत (अविच्छिन्न और अनंत) हैं। “लोचन अनँत उघाड़िया” में इसका वर्णन है कि सतगुरु की आंखें अनंत की ओर हैं, और वह अनंत की गहराईयों को देख सकते हैं। “अनँत दिखावणहार” में यह कहा गया है कि सतगुरु वह दिखावणहार हैं जो अनंत को हमें दिखा सकते हैं, अर्थात् वे अनंत ब्रह्म को हमारे सामने प्रकट कर सकते हैं।
राम नाम के पटतरे, देबे कौ कुछ नाहिं।
क्या ले गुर सन्तोषिए, हौंस रही मन माहिं॥4॥
अर्थ-भगवान राम के नाम की रौंगत में कोई भी दुर्बलता या कमी नहीं है, और उनके नाम की महिमा अत्यंत उच्च है। यह कविता बता रही है कि भगवान के नाम में कोई असमर्थता या अभाव नहीं है।गुरु और संतों को क्या मिलता है? और उसका उत्तर है कि वह आत्मसंतोष है, जिससे मन को सुख मिलता है। इसमें यह भी सूचित है कि भक्ति में लगे रहने से मन सुखी रहता है।
सतगुर के सदकै करूँ, दिल अपणी का साछ।
सतगुर हम स्यूँ लड़ि पड़ा महकम मेरा बाछ॥5॥
अर्थ-सतगुरु की सेवा करना और उसके मार्ग पर चलना, दिल की सच्चाई से किया जाए। यानी, यह भक्ति और सेवा दिल से होनी चाहिए।सतगुरु के मार्ग पर चलते हुए, भक्त अपनी आत्मा के महकम (आत्मा के अद्वितीयता का अनुभव) में लड़ाई लड़ रहा है, और इससे उसकी आत्मा का उद्धार हो रहा है। “महकम मेरा बाछ” में “बाछ” का अर्थ होता है सागर या बारिश, जिससे आत्मा को शुद्धि मिलती है।
सतगुर लई कमाँण करि, बाँहण लागा तीर।
एक जु बाह्यां प्रीति सूँ, भीतरि रह्या सरीर॥6॥
अर्थ-इसमें यह कहा जा रहा है कि सतगुरु की सेवा करना, उसके लिए काम करना, व्यक्ति को उसके लक्ष्य तक पहुँचाने में मदद करता है। “बाँहण लागा तीर” में यह बताया गया है कि यह सतगुरु के मार्ग पर चलने में सहारा प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सजग रहता है।भक्ति में लगे रहने से व्यक्ति बाहरी और भीतरी प्रेम में लगा रहता है। उसका शरीर भी इस प्रेम में समर्पित हो जाता है। इससे यह भी सूचित होता है कि सतगुरु की सेवा और उसके मार्ग पर चलने से भक्ति में आत्मिक समृद्धि होती है।
सतगुर साँवा सूरिवाँ, सबद जू बाह्या एक।
लागत ही में मिलि गया, पढ़ा कलेजै छेक॥7॥
अर्थ- सतगुरु सूर्य की तरह सबको प्रकाशित करने वाले हैं और उनका सबद (उपदेश या बाणी) हमें एकता में मिला देता है।सतगुरु से मिलना और उनके साथ बनी रहना अत्यंत सरल है, जिससे भक्त को आत्मा का अनुभव होता है। “पढ़ा कलेजै छेक” में इसका तात्पर्य है कि सतगुरु की बाणी या उपदेश से आत्मा को शुद्धि मिलती है, जैसे कि शिक्षा कलेज में होती है और वह छेक (साफी) का कार्य करती है।
सतगुर मार्या बाण भरि, धरि करि सूधी मूठि।
अंगि उघाड़ै लागिया, गई दवा सूँ फूंटि॥8॥
अर्थ-सतगुरु ने अपने उपदेशों के बाणों से भरा हुआ है, जिससे भक्त ने अपनी आत्मा को सुधार लिया है। “धरि करि सूधी मूठि” में यह बताया गया है कि भक्त ने उन उपदेशों को अपनी आत्मा में स्थान दिया और उन्हें पूरी तरह से अपनाया हैसतगुरु के उपदेशों का अनुसरण करते हुए, भक्त ने अपने अंगों (शरीर) की उघाड़ाई (शुद्धि की प्रक्रिया) की है और उससे उसका रोग दूर हो गया है। “गई दवा सूँ फूंटि” में इसका अर्थ है कि उसने वह औषधि पूरी तरह से प्राप्त कर ली है और उससे उसकी आत्मा में शुद्धि हो रही है।
हँसै न बोलै उनमनी, चंचल मेल्ह्या मारि।
कहै कबीर भीतरि भिद्या, सतगुर कै हथियार॥9॥
अर्थ-जो व्यक्ति अचेतन है और ज्यों ही उसका मन चंचल होता है, वह बोलना बंद कर देता है और उसका मन मेल्हों (चंचलता) में रहता है।संत कबीर यह कह रहे हैं कि उन्होंने अपने भीतर एक गुप्त रहस्य को खोज लिया है, और इसे खोलने के लिए उनके पास सतगुरु का उपदेश और गुरु की शक्ति है। इससे यह भी सूचित होता है कि सतगुरु का हथियार अत्यंत महत्वपूर्ण है जो व्यक्ति को आत्मा के आद्यात्मिक रहस्यों को समझने में सहारा प्रदान करता है।
गूँगा हूवा बावला, बहरा हुआ कान।
पाऊँ थै पंगुल भया, सतगुर मार्या बाण॥10॥
अर्थ-जो व्यक्ति मूक हो गया है (गूँगा हूवा), और उसके कान बहरे हो गए हैं (बावला)। यह बयान करता है कि ऐसा व्यक्ति आत्मा के आद्यात्मिक ज्ञान से वंचित हो गया है,जब व्यक्ति को अपने पैरों में पंगुल आ गई (पाऊँ थै पंगुल भया), तब सतगुरु ने अपने उपदेश के बाण से उसे मारा (समझाया या शिक्षा दी)। इससे यह बताता है कि सतगुरु के उपदेश से ही व्यक्ति को आत्मा के आद्यात्मिक ज्ञान का अनुभव होता है और उसकी आत्मा को आध्यात्मिक रूप से सुधार होता है।
पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथि।
आगै थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि॥11॥
अर्थ-कई लोग पुराने धार्मिक शास्त्रों के साथ चल रहे थे या उनकी अनुयायी थे,आगे जाकर उन्होंने सतगुरु को मिला और उसने उन्हें एक दीपक (प्रकाश) दिया है, जो कि हाथी के समान भारी और महत्वपूर्ण है। यह बयान करता है कि सतगुरु के उपदेश और गुरु की शिक्षा व्यक्ति के जीवन में प्रकाश और मार्गदर्शन का कारण होती है।
दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट।
पूरा किया बिसाहूणाँ, बहुरि न आँवौं हट्ट॥12॥
अर्थ-जब दीपक में तेल भरा जाता है, तो उसकी बाती (बत्ती) बन जाती है और वह अघट्ट (अटल और अच्छी तरह से जलने वाली) होती है।समस्त को पूरा करने के बाद, दीपक बहुत दिनों तक नहीं बुझता है, यानी कि उसकी आत्मा का प्रकाश बहुत दिनों तक बना रहता है और कभी नहीं हटेगा.
ग्यान प्रकास्या गुर मिल्या, सो जिनि बीसरि जाइ।
जब गोबिंद कृपा करी, तब गुर मिलिया आइ॥13॥
अर्थ- जिनको ज्ञान का प्रकाश मिलता है, वही व्यक्ति समझता है कि सब कुछ उसी में है और उसे गुरु का आवश्यकता नहीं होती।जब गोबिंद (ईश्वर) कृपा करता है, तब ही कोई व्यक्ति अपने जीवन में एक सार्वभौमिक गुरु से मिलता है और उसे आत्मा का अद्वितीयता का अनुभव होता है।
कबीर गुर गरवा मिल्या, रलि गया आटैं लूँण।
जाति पाँति कुल सब मिटै, नांव धरोगे कौण॥14॥
अर्थ-संत कबीर जी को गुरु की कृपा मिली है, जिससे उनकी आता (गेहूं की बौणी) और लूँण (नमक) मिल गया है, यानी उनका जीवन समृद्धि और पूर्णता से भर गया है,जब गुरु की कृपा मिलती है, तो सभी जातियाँ, पाँतियाँ, और कुल समाप्त हो जाते हैं, और फिर व्यक्ति को अपना नाम कैसे धारण करना चाहिए, यह सवाल उठता है।
जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध।
अंधा अंधा ठेलिया, दून्यूँ कूप पड़ंत॥15॥
अर्थ- जिसका गुरु भी अंधा है, और उसका चेला बहुत ईमानदार और निष्कलंक (निरंध) है। यह बताता है कि अगर गुरु भी अंधा है तो भी शिष्य को आत्मा के आद्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति में सफलता मिल सकती है। अंधा व्यक्ति अंधविश्वास में फंसा होता है और वह अपने अज्ञान के कूप में गिर जाता है। इससे यह सिखने को मिलता है कि आत्मा को समझने और आत्मिक सुधार के लिए गुरु की आवश्यकता होती है, और गुरु की शिक्षा का महत्वपूर्ण होना चाहिए।
नाँ गुर मिल्या न सिष भया, लालच खेल्या डाव।
दुन्यूँ बूड़े धार मैं, चढ़ि पाथर की नाव॥16॥
अर्थ- जिसको गुरु नहीं मिला है और जो सिष्य नहीं बना है, वह लालच में डूबा हुआ है और अविवेक में फंसा हुआ है। यह बताता है कि गुरु की शिक्षा के बिना व्यक्ति आत्मिक सुधार करने में सक्षम नहीं हो सकता है।इस संसार में (दुनिया बूड़े धार में), जो व्यक्ति चढ़ी पथर की नाव पर बैठा है, वह आत्मिक सुधार का मार्ग नहीं चुन पा रहा है, और वह अज्ञान और लालच में डूबा हुआ है।
चौसठ दीवा जोइ करि, चौदह चन्दा माँहि।
तिहिं धरि किसकौ चानिणौं, जिहि घरि गोबिंद नाहिं॥17॥
अर्थ-चौसठ दीपक जलाकर, चौदह चाँदों के महीने में।तीनों धरती किसकी चमक को चाहें, जिस घर में गोविंद नहीं है।
निस अधियारी कारणैं, चौरासी लख चंद।
अति आतुर ऊदै किया, तऊ दिष्टि नहिं मंद॥18॥
अर्थ-रात के अंधेरे में, लाखों चांद चमक रहे हैं। मैं उन्हें देखने के लिए बहुत उत्सुक हूं, लेकिन मेरी दृष्टि कमजोर है।
भली भई जू गुर मिल्या, नहीं तर होती हाँणि।
दीपक दिष्टि पतंग ज्यूँ, पड़ता पूरी जाँणि॥19॥
अर्थ-गुरु मिलना बहुत बड़ी किस्मत की बात है। यदि मुझे गुरु नहीं मिलते, तो मैं भटक जाता।गुरु ज्ञान का दीपक है, जो अंधेरे में रास्ता दिखाता है। जैसे दीपक के प्रकाश से पतंगे आकर्षित होते हैं, वैसे ही गुरु के ज्ञान से मनुष्य आकर्षित होता है।
माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवै पड़ंत।
कहै कबीर गुर ग्यान थैं, एक आध उबरंत॥20॥
अर्थ-मनुष्य माया के दीपक के समान है, जो भ्रम में इधर-उधर भटकता रहता है। वह भौतिक सुखों को ही जीवन का सार समझता है और उनमें डूबा रहता है।
लेकिन गुरु का ज्ञान मनुष्य को इस भ्रम से मुक्त कर सकता है। गुरु उसे सच्चे सुख का मार्ग दिखाता है और उसे जीवन का वास्तविक अर्थ समझाता है।
सतगुर बपुरा क्या करै, जे सिषही माँहै चूक।
भावै त्यूँ प्रमोधि ले, ज्यूँ वंसि बजाई फूक॥21॥
अर्थ- यह कविता सतगुरु और शिष्य के बीच संबंध का वर्णन करती है। कवि कहता है कि यदि शिष्य में ही कोई त्रुटि है, तो सतगुरु क्या कर सकता है? सतगुरु उसे ज्ञान और मार्गदर्शन दे सकता है, लेकिन यदि शिष्य उस ज्ञान को ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं है, तो उसे कोई लाभ नहीं होगा।
संसै खाया सकल जुग, संसा किनहुँ न खद्ध।
जे बेधे गुर अष्षिरां, तिनि संसा चुणि चुणि खद्ध॥22॥
अर्थ-यह कविता संसार की क्षणभंगुरता और गुरु के महत्व का वर्णन करती है। कवि कहता है कि संसार ने सभी युगों को खा लिया है, इसका मतलब है कि संसार हमेशा बदलता रहता है और कुछ भी स्थायी नहीं है।
लेकिन जो गुरु की आंखों से देखते हैं, वे संसार का चुनाव करके खाते हैं। इसका मतलब है कि जो गुरु के ज्ञान को ग्रहण करते हैं, वे संसार के मोह में नहीं डूबते और केवल उन चीजों को ग्रहण करते हैं जो उनके लिए आवश्यक हैं।
चेतनि चौकी बैसि करि, सतगुर दीन्हाँ धीर।
निरभै होइ निसंक भजि, केवल कहै कबीर॥23॥
अर्थ- कबीर जी कहते हैं कि हमें आत्म-चेतना में बैठकर ध्यान लगाना चाहिए, सतगुरु की शरण में जाकर उनसे धीरज प्राप्त करना चाहिए, और भय को दूर करके निरंतर भजन करना चाहिए। इस श्लोक में भक्ति और आत्म-जागरूकता की महत्वपूर्ण बातें हैं।
सतगुर मिल्या त का भयां, जे मनि पाड़ी भोल।
पासि बिनंठा कप्पड़ा, क्या करै बिचारी चोल॥24॥
अर्थ- इस दोहे में कबीर जी कह रहे हैं कि सतगुरु के साक्षात्कार से भक्त के मन में निर्मलता और भोलापन आ जाता है। उन्हें भय की कोई अवश्यकता नहीं होती, क्योंकि उनका आत्मा गुरु के प्रकाश में एकाग्र हो जाता है। इसी तरह से, जैसे कपड़ा अपने बाँधने की आवश्यकता खो देता है जब वह किसी और के पास होता है, वैसे ही भक्त को सतगुरु के दर्शन के बाद अपने आप की महत्ता का अहसास होता है।
बूड़े थे परि ऊबरे, गुर की लहरि चमंकि।
भेरा देख्या जरजरा, (तब) ऊतरि पड़े फरंकि॥25॥
अर्थ- इस दोहे में, कबीर जी यह कह रहे हैं कि गुरु की प्रेरणा और उनकी शिक्षा से बूढ़े और अशिक्षित व्यक्ति भी परिवर्तित हो सकते हैं। गुरु की शिक्षा से समझ में आता है कि वास्तविकता क्या है और कैसे जीना चाहिए। भेरे की उसकी जर्जरता देखकर उसने गुरु की ओर रुख किया, इसका अर्थ है कि उसने गुरु के उपदेशों को स्वीकार किया और उनका पालन किया।
कबीर सब जग यों भ्रम्या फिरै ज्यूँ रामे का रोज।
सतगुर थैं सोधी भई, तब पाया हरि का षोज॥27॥
अर्थ- कबीर कहते हैं कि सभी लोग इस प्रकार दिन-रात राम की तलाश में भटकते रहते हैं। परंतु जब मैंने सतगुरु की खोज की, तो मुझे हरि का दर्शन हुआ।”
यह दोहा कबीर जी के द्वारा कही गई एक अद्भुत बात है। इसमें वे बता रहे हैं कि बहुत से लोग अपने जीवन में भगवान की तलाश में भटकते रहते हैं, लेकिन सतगुरु के संदेशों और मार्गदर्शन के बाद ही वे भगवान की साक्षात्कार की प्राप्ति करते हैं।
गुरु गोविन्द तौ एक है, दूजा यह आकार।
आपा मेट जीवत मरै, तो पावै करतार॥26॥
अर्थ-“गुरु और भगवान एक ही हैं, यह दोषरूपी आकार अलग है। जब जीवनी मिट जाती है, तो वही परमात्मा प्राप्त होता है।”
यह दोहा दिखाता है कि गुरु और भगवान में कोई भेद नहीं है। गुरु को समर्पित और उनके मार्गदर्शन में विश्वास रखने से ही व्यक्ति परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। यह दोहा भक्ति मार्ग को सार्थक बनाने के लिए महत्वपूर्ण संदेश प्रदान करता है।
कबीर सतगुर नाँ मिल्या, रही अधूरी सीप।
स्वांग जती का पहरि करि, घरि घरि माँगै भीष॥27॥
अर्थ- कबीर कहते हैं कि मैंने सतगुरु को नहीं पा लिया, और इसलिए मेरी जीवन-यात्रा अधूरी रह गई। मैंने अपनी सारी ऊर्जा और समय का व्यर्थ कर दिया, घर-घर भिख मांगता रहा।”
इस दोहे में कबीर जी व्यक्तिगत अनुभव के माध्यम से अपनी अनगिनत अधिकारियों को साझा करते हैं। उनका संदेश है कि अगर हम सतगुरु का साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं, तो हमारा जीवन अधूरा रह जाता है और हम अपने आत्मिक आनंद को नहीं पा सकते। इसलिए, समय का सही उपयोग करके सतगुरु के प्रति आदर और श्रद्धा रखना आवश्यक है।
कबीर सतगुर ना मिल्या, सुणी अधूरी सीष।
मुँड मुँडावै मुकति कूँ, चालि न सकई वीष॥29॥
अर्थ-“कबीर कहते हैं कि मुझे सतगुरु का दर्शन नहीं मिला, इसलिए मेरी जीवन-यात्रा अधूरी है। मुक्ति का अभिप्राय चरणों को प्राप्त करने से है, लेकिन मुझे वह समर्थ नहीं हो पाई।”
सतगुर साँचा सूरिवाँ, तातै लोहिं लुहार।
कसणो दे कंचन किया, ताई लिया ततसार॥28॥
अर्थ- इस दोहे में कबीर जी कह रहे हैं कि सतगुरु की शिक्षा अत्यंत मूल्यवान है, जैसे कि सोना लोहार के लिए महत्वपूर्ण होता है। उनका यह कहना है कि हमें सतगुरु की शिक्षा को अपनाना चाहिए, उसे अपनाकर ही हम अपनी आत्मिक उन्नति कर सकते हैं।
थापणि पाई थिति भई, सतगुर दीन्हीं धीर।
कबीर हीरा बणजिया, मानसरोवर तीर॥29॥
अर्थ- इस दोहे में, कबीर जी कह रहे हैं कि जब उन्हें उनके गुरु ने आदर्श और मार्गदर्शन दिया, तो उन्होंने अपने जीवन को सही दिशा में स्थापित किया। उनके अनुसार, उन्होंने समाज में महत्वपूर्ण अंश को निर्मित किया, जिसे उन्होंने एक हीरे के रूप में उत्तरण किया है। इस दोहे में, कबीर जी अपने गुरु की महिमा का गान करते हैं, जिन्होंने उन्हें उनके सार्वभौमिक स्वरूप को पहचानने में मदद की।
कबीर हीरा बणजिया, हिरदे उकठी खाणि।
पारब्रह्म क्रिपा करी सतगुर भये सुजाँण॥
अर्थ- इस दोहे में, कबीर जी अपने भक्ति मार्ग की यात्रा का वर्णन करते हैं। उन्होंने कहा है कि उनके हृदय की गहना, अर्थात उनका आत्मा, अब उन्हें मिल गया है। वे पारब्रह्म की कृपा से सतगुरु के माध्यम से सत्य को पहचान लिया है। इस दोहे में भक्ति और आत्मज्ञान की महत्वपूर्ण बातें हैं।
निहचल निधि मिलाइ तत, सतगुर साहस धीर।
निपजी मैं साझी घणाँ, बांटै नहीं कबीर॥30॥
अर्थ-“निहचल निधि को प्राप्त करने के लिए सतगुरु के साहस और धैर्य की आवश्यकता होती है। मैंने साझा की धन्य समाज के साथ, लेकिन मैंने इसे बांटने का नहीं किया, कबीर कहते हैं।”
अर्थ- इस दोहे में, कबीर जी कह रहे हैं कि सतगुरु के माध्यम से अचल धन को प्राप्त करने के लिए विशेष धैर्य और साहस की आवश्यकता होती है। वे यह भी कह रहे हैं कि वे अपने साझा किए गए धन को दूसरों के साथ साझा कर दिया है, लेकिन उन्होंने इसे बांटने का नहीं किया। यह दोहा नेतृत्व, साहस, और सामाजिक न्याय के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को प्रकट करता है।
चौपड़ि माँडी चौहटै, अरध उरध बाजार।
कहै कबीरा राम जन, खेलौ संत विचार॥31॥
पासा पकड़ा प्रेम का, सारी किया सरीर।
सतगुर दावा बताइया, खेलै दास कबीर॥32॥
अर्थ- इस दोहे में, कबीर जी विश्वास की महत्ता को व्यक्त कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि वे प्रेम के पासे को पकड़ लिया है, और सम्पूर्ण अपने शरीर का उपयोग किया है ताकि इसे महसूस कर सकें। उन्होंने अपने गुरु से इस सच्चाई को सिखा और इसमें खेला, यानी उसका अनुभव किया। इस दोहे में, प्रेम की अनुभूति को उन्होंने उत्कृष्ट रूप से व्यक्त किया है और गुरु के मार्गदर्शन की महत्ता को भी स्पष्ट किया है।
सतगुर हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग।
बरस्या बादल प्रेम का भीजि गया अब अंग॥33॥
अर्थ- सतगुरु ने मुझे एक रीति में संधि करा दी, और एक कहानी का प्रसंग सुनाया। प्रेम के बादल बरसे और अब मेरे शरीर को भीगा दिया।”
इस दोहे में, कबीर जी अपने गुरु की महत्ता को व्यक्त कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि गुरु की कृपा से उनकी आत्मिक संधि हो गई है और वे एक सत्य कहानी सुनकर सीख गए हैं। उनकी भक्ति की भावना अब उनके अंतर्मन को भीगा दी गई है, जैसे कि बादलों को प्रेम की वर्षा के बाद भूमि को भिगोते हैं।
कबीर बादल प्रेम का, हम परि बरष्या आइ।
अंतरि भीगी आत्माँ हरी भई बनराइ॥34॥
अर्थ- इस दोहे में, कबीर जी व्यक्त कर रहे हैं कि प्रेम का बादल आया है, यानी प्रेम की विशेषता या भावना की वर्षा हुई है। उनके अनुसार, यह प्रेम उनके भीतर के आत्मा को भिगो देता है और उसे हरियाली का रूप धारण करने में सहायक होता है। यहाँ प्रेम की विशेषता या भावना को बादल के रूप में दिखाया गया है, जो आत्मिक और आध्यात्मिक उत्थान को संकेत करता है।
पूरे सूँ परचा भया, सब दुख मेल्या दूरि।
निर्मल कीन्हीं आत्माँ ताथैं सदा हजूरि॥35॥
अर्थ- इस दोहे में, कबीर जी आत्म-समर्पण की महत्ता को व्यक्त कर रहे हैं। जब हम सम्पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ आत्मा को परमात्मा के समर्पित करते हैं, तो सभी दुःखों का नाश हो जाता है और हमें सच्चे आत्मिक संबल की प्राप्ति होती है। इस रूप में, परमात्मा हमेशा हमारे साथ होते हैं और हमें निरंतर गाइड करते हैं।
साखी – बिरह कौ अंग
रात्यूँ रूँनी बिरहनीं, ज्यूँ बंचौ कूँ कुंज।
कबीर अंतर प्रजल्या, प्रगट्या बिरहा पुंज॥1॥
अर्थ- जैसे रात को ही रोने वाली बिरहा समय में अंधेरे के रूप में बादलों में चुपचाप छिप जाती है, वैसे ही कबीर जी अपने आंतरिक विचारों को अंधकार से प्रकाश में परिणत करते हैं, जिससे उनकी बिरहा की पीड़ा प्रकट होती है।”
इस दोहे में, कबीर जी अपनी आत्मा की भावनाओं की व्याख्या कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि जैसे रात के अंधेरे में बिरहा समय के अंधेरे में छिप जाती है, वैसे ही उनके आंतरिक भावनाओं का प्रकट होना उनके अंतर मन के अंधकार को प्रकाश में बदल देता है। इस दोहे में, कबीर जी आत्मा के आंतरिक प्रकट होने की महत्वपूर्णता को बता रहे हैं।
अबंर कुँजाँ कुरलियाँ, गरिज भरे सब ताल।
जिनि थे गोविंद बीछुटे, तिनके कौण हवाल॥2॥
इस दोहे में, कबीर जी संसार की भगवान की असलीता को व्यक्त कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि जैसे बादल आये हैं और पक्षियाँ चहक रही हैं, सभी तालों में गर्जन हो रही है, वैसे ही भगवान के साथ जुड़े हुए व्यक्ति कौन हैं, उनका कौन है ध्यान। यह दोहा भगवान की खोज को और उनके साथ जुड़ने की महत्वपूर्णता को उजागर करता है।
चकवी बिछुटी रैणि की, आइ मिली परभाति।
जे जन बिछुटे राम सूँ, ते दिन मिले न राति॥3॥
इस दोहे में, कबीर जी संसार में भगवान के प्रति भक्ति के महत्व को व्यक्त कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि जो व्यक्ति भगवान की भक्ति को छोड़ देता है, उसे संसार में संतोष नहीं मिलता, चाहे वह रात हो या दिन। इस दोहे में भगवान के प्रति निष्ठा और उसकी भक्ति के महत्व को प्रकट किया गया है।
बासुरि सुख नाँ रैणि सुख, ना सुख सुपिनै माँहि।
कबीर बिछुट्या राम सूँ ना सुख धूप न छाँह॥4॥
बिरहनि ऊभी पंथ सिरि, पंथी बूझै धाइ।
एक सबद कहि पीव का, कब रे मिलैगे आइ॥5॥
इस दोहे में, कबीर जी अन्याय के खिलाफ खड़े होने और सच्चाई के पथ पर चलने की महत्वपूर्णता को व्यक्त कर रहे हैं। उनके अनुसार, सच्चे मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति कठिनाईयों का सामना करते हैं, लेकिन वे धारणा कर लेते हैं कि सही दिशा में चलना ही सबसे महत्वपूर्ण है। वे प्रश्न करते हैं कि कब हमें सच्चाई का अनुभव होगा?
बहुत दिनन की जोवती, बाट तुम्हारी राम।
जिव तरसै तुझ मिलन कूँ, मनि नाहीं विश्राम॥6॥
इस दोहे का हिंदी में अनुवाद किया गया है। इसमें कबीर जी भगवान के इच्छुक होने का अर्थ कर रहे हैं और उन्हें अपने साथ मिलने के लिए बेहद बेताबी से प्रतीक्षा है। यह दोहा उनकी भगवान के आवश्यकता और उनके दर्शन के प्रती प्रतीक्षा को व्यक्त करता है। यह भावना आत्मा की अधिकांश खोज का परिणाम होता है, जब उसे भगवान के प्रति प्रेम और आकर्षण होता है।
बिरहिन ऊठै भी पड़े, दरसन कारनि राम।
मूवाँ पीछे देहुगे, सो दरसन किहिं काम॥7॥
इस दोहे में, कबीर जी बता रहे हैं कि जब भक्त अपने भगवान के दर्शन की इच्छा से उठते हैं, तो उनकी यात्रा की पराकाष्ठा सफल होती है। वे उस दर्शन की अवश्यकता को इतनी महत्वपूर्ण मानते हैं कि वे उसकी प्राप्ति के लिए कुछ भी कर सकते हैं। इसलिए, उन्हें दर्शन की कोई चीज बड़ी नहीं होती, और वे उसे प्राप्त करने के लिए सभी कष्टों को सहन करते हैं।
मूवाँ पीछै जिनि मिलै, कहै कबीरा राम।
पाथर घाटा लोह सब, (तब) पारस कौंणे काम॥8॥
इस दोहे में, कबीर जी भगवान के आस्थान को बताते हैं। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति भगवान के पास जाता है, वही सच्चा भगवान है। सारे पत्थर, घाटा और लोहे तो हैं, लेकिन कौन सा पारस (सोने की खोज) सच्चे मुक्ति और आत्मा के लिए महत्वपूर्ण है, यह विचार कबीर जी व्यक्त कर रहे हैं।
अंदेसड़ा न भाजिसी, संदेसो कहियाँ।
कै हरि आयां भाजिसी, कै हरि ही पासि गयां॥9॥
इस दोहे में, कबीर जी व्यक्ति को उसकी अस्थिरता और मायावी विचारों के बारे में चेतावनी देते हैं। उनके अनुसार, जब हम अपनी अस्थिरता को समझते हैं, तब हम वास्तविक सत्य को समझने के लिए तत्परता प्राप्त करते हैं। भगवान किसी के पास आते हैं और किसी को वही दूर चला जाते हैं, इसलिए हमें स्थिरता और सत्य की खोज में लगे रहना चाहिए।
आइ न सकौ तुझ पै, सकूँ न तूझ बुझाइ।
जियरा यौही लेहुगे, बिरह तपाइ तपाइ॥10॥
इस दोहे में, कबीर जी भगवान की खोज में अपने भक्तों की भावनाओं को व्यक्त कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि मनुष्य अपनी परमात्मा को समझने में असमर्थ है, मनुष्य जितना भगवान को चाहता है, उतना ही उसकी बिरहा का तप भी बढ़ जाता है
यहु तन जालौं मसि करूँ, ज्यूँ धूवाँ जाइ सरग्गि।
मति वै राम दया, करै, बरसि बुझावै अग्गि॥11॥
इस दोहे में, कबीर जी भगवान की प्रेम को व्यक्त करते हैं और उनकी उपासना का तरीका बताते हैं। वे कहते हैं कि उनके शरीर को कसेंगे और अपने मन को इन्द्रियों के अवलोकन से पार करेंगे। जब हम भगवान के प्रेम को बुद्धि से पहचानते हैं, तो हमारी आग सारी बुझ जाती है, अर्थात् हमारा मन पवित्रता की ओर बढ़ता है।
कबीर पीर पिरावनीं, पंजर पीड़ न जाइ।
एक ज पीड़ परीति की, रही कलेजा छाइ॥13॥
इस दोहे में, कबीर जी मानवता के अद्वितीय गुणों को उजागर करते हैं। उन्हें बताया जाता है कि जो व्यक्ति अपने आस-पास के लोगों के दुःखों को समझता है और उनकी मदद करता है, उसकी आत्मा कभी पीड़ित नहीं होती है। इससे वह सच्चे प्रेम का अनुभव करता है और उसकी आत्मा हमेशा शांत और तृप्त रहती है।
चोट सताड़ी बिरह की, सब तन जर जर होइ।
मारणहारा जाँणिहै, कै जिहिं लागी सोइ॥14॥
इस दोहे में, कबीर जी व्यक्ति के भावनात्मक दुःख को व्यक्त करते हैं। उन्होंने कहा है कि बिरहा का दुःख बहुत तेज़ होता है और इससे शरीर में जलन की भावना होती है। उन्होंने भी यह कहा है कि सिर्फ वही व्यक्ति जानता है कि किसे कैसा प्रभाव डाला गया है जो इस दुःख को अनुभव कर रहा है।
कर कमाण सर साँधि करि, खैचि जू मार्या माँहि।
भीतरि भिद्या सुमार ह्नै जीवै कि जीवै नाँहि॥15॥
इस दोहे में, कबीर जी व्यक्ति को जीवन के संघर्षों और परीक्षणों के सामना करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। जब हमारे जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं और हमें सामना करना पड़ता है, तो हमारी आत्मा में एक गहरी दरार पैदा होती है। क्या हम उस दरार को जीवित रख सकते हैं या नहीं, यह हमारे व्यक्तित्व की गहरी परीक्षा होती है।
जबहूँ मार्या खैंचि करि, तब मैं पाई जाँणि।
लांगी चोट मरम्म की, गई कलेजा जाँणि॥16॥
इस दोहे में, कबीर दास जी कहते हैं कि जब उन्हें तीर से घायल किया गया तो उन्हें सच्चाई का अनुभव हुआ। यहाँ ‘तीर’ का अर्थ विवेक या दुखदाई अनुभव है। ‘लांगी चोट’ का अर्थ है महान चोट, जिससे ‘मरम्म’, यानी अंतरात्मा को चोट पहुंची है, और ‘कलेजा’ का अर्थ हृदय है। इस दोहे में कबीर दास जी अपने अनुभवों के माध्यम से बताते हैं कि असली सच्चाई को समझने के लिए कठिन परिस्थितियों का सामना करना आवश्यक है।
जिहि सर मारी काल्हि सो सर मेरे मन बस्या।
तिहि सरि अजहूँ मारि, सर बिन सच पाऊँ नहीं॥17॥
इस दोहे में, कबीर दास जी कहते हैं कि जो सिर को मारता है, वही सिर मेरे मन में बसता है। ‘काल्हि’ या ‘कान’ का अर्थ यहाँ समझाया जा सकता है कि जो व्यक्ति विवेक के विरुद्ध कार्य करता है, उसका मन में बसता है। इसका मतलब है कि अमानवीय कार्य करने वाले का मन उसी के साथ रहता है और वह अमानवीयता में डूबा रहता है। दूसरी पंक्ति में कहा गया है कि जिस सिर को मारा जाता है, उस सिर के बिना मैं सच्चाई को पाने के लिए सक्षम नहीं हूं। यहाँ ‘सिर’ का अर्थ विवेक है, जो व्यक्ति के आत्मचिंतन और सत्य के प्रति जागरूकता को प्रतिनिधित्ता करता है। इस पंक्ति में यह बताया जा रहा है कि सत्य को पहचानने के लिए विवेक की आवश्यकता होती है।
बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्रा न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै, जिवै त बीरा होइ॥18॥
इस दोहे में, कबीर दास जी कह रहे हैं कि जब विरह या अलगाव का दुख व्यक्ति के शरीर में बस जाता है, तो कोई भी मंत्र उसे ठीक नहीं कर सकता है। ‘राम’ यहाँ भगवान की उपस्थिति को संदर्भित करता है। यह कहा जाता है कि जो व्यक्ति ऐसी परिस्थिति में जीता है, वह सच्चे वीर के समान होता है।
बिरह भुवंगम पैसि करि, किया कलेजै घाव।
साधू अंग न मोड़ही, ज्यूँ भावै त्यूँ खाव॥19॥
इस दोहे में, कबीर दास जी कह रहे हैं कि विरह का दुख व्यक्ति के हृदय को बहुत गहरा घाव पहुंचाता है। ‘साधू अंग न मोड़ही’ का अर्थ है कि वे संत अपने आप को विचलित नहीं करते हैं, चाहे उन्हें कितना ही दुख हो। इसका अर्थ है कि वे हमेशा उदार और सहानुभूति रहते हैं और अपनी आत्मा की ऊँचाई को बनाए रखते हैं। वे अपने भाव के अनुसार जीते हैं और खाते हैं।
सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त।
और न कोई सुणि सकै, कै साई के चित्त॥20॥
इस दोहे में, कबीर दास जी यह कह रहे हैं कि हमारे शरीर के सभी रग-रस्ते और मानसिक तंत्रे भगवान की याद में संगीत की भाँति ध्वनित होते हैं। विरह के दुख सदैव हमारे मन में वाजते रहते हैं। किसी को भी यह ध्वनि सुनने में समर्थ नहीं होती है, क्योंकि विरह का दुख केवल उस व्यक्ति के मन में ही होता है जिसका मन भगवान की ओर लगा हुआ हो
बिरहा बिरहा जिनि कहौ, बिरहा है सुलितान।
जिह घटि बिरह न संचरै, सो घट सदा मसान॥21॥
इस दोहे में, कबीर दास जी कह रहे हैं कि जो व्यक्ति ‘बिरहा’ की बात करता है, वही ‘बिरहा’ का सिकंदर है। ‘बिरहा’ यहाँ अलगाव या दुःख को संदर्भित करता है। जो किसी व्यक्ति का मन ‘बिरहा’ के दुःख से बाहर नहीं निकलता, वही मन सदा ही मृत्यु के समान होता है।
अंषड़ियाँ झाई पड़ी, पंथ निहारि निहारि।
जीभड़ियाँ छाला पड़्या, राम पुकारि पुकारि॥22॥
इस दोहे में, कबीर दास जी द्वारा कहा गया है कि उन्हें अंशदारी और विचार करते हुए सभी पथ का अंश यथार्थतः जानने का अनुभव हो रहा है। उनकी जीभड़ी में भी राम के नाम की ध्वनि बनी हुई है, जो लगातार पुकार रही है। इस दोहे में राम के नाम के महत्व को उजागर किया गया है।
इस तन का दीवा करौं, बाती मेल्यूँ जीव।
लोही सींचौ तेल ज्यूँ, कब मुख देखौं पीव॥23॥
इस दोहे में, कबीर दास जी कह रहे हैं कि वह अपने शरीर को एक दीया की भाँति बनाना चाहते हैं और उसे इस जगह में मिलने वाले दिव्य जीवन की बातियों से जलाना चाहते हैं। वे तेल के समान अपने मुख को सींचना चाहते हैं, ताकि उन्हें दिव्य अनुभव हों। यहाँ ‘तेल’ का उपयोग आत्मा की शुद्धि और प्राप्ति के लिए किया गया है।
नैंना नीझर लाइया, रहट बहै निस जाम।
पपीहा ज्यूँ पिव पिव करौं, कबरू मिलहुगे राम॥24॥
इस दोहे में, कबीर दास जी कह रहे हैं कि जैसे जैसे पपीहा पानी पीता है, उसी तरह वह भी भगवान के दर्शन के लिए व्याकुल होता है। ‘नैंना नीझर लाइया’ का अर्थ है कि अपनी आँखों को बंद करके, अंतर्मन से परमात्मा की अनुभूति करता है। उन्हें यहाँ प्रेरित किया जाता है कि उनकी श्रद्धा और आसक्ति की भावना के समान पपीहा की तरह हो, ताकि वह भगवान को मिल सके।
अंषड़िया प्रेम कसाइयाँ, लोग जाँणे दुखड़ियाँ।
साँई अपणैं कारणै, रोइ रोइ रतड़िया॥25॥
इस दोहे में, कबीर दास जी कह रहे हैं कि अधिकांश लोग प्रेम को एक धोखे की तरह देखते हैं, और उन्हें इससे दुःख होता है। वे कहते हैं कि भक्त भगवान के प्रति अपने प्रेम को अपनी आत्मविश्वास में निर्मित करता है, और फिर भगवान की प्राप्ति के लिए रोता रहता है।
सोई आँसू सजणाँ, सोई लोक बिड़ाँहि।
जे लोइण लोंहीं चुवै, तौ जाँणों हेत हियाँहि॥26॥
इस दोहे में, कबीर दास जी कह रहे हैं कि जिस प्रकार एक व्यक्ति के आँसू अपने प्रियजनों को चाहते हैं, ठीक उसी प्रकार वे ही लोग उसी के विरुद्ध बिदा करते हैं। उन्हें यहाँ बताया जाता है कि जैसे कि लोहे को जिस चीज़ का स्पर्श होता है, वह उसका उसके गुणों के अनुसार उत्तर देता है, ठीक उसी प्रकार व्यक्ति के मन की भावनाओं को उसका हृदय बता देता है।
कबीर हसणाँ दूरि करि, करि रोवण सौं चित्त।
बिन रोयाँ क्यूँ पाइये, प्रेम पियारा मित्त॥27॥
इस दोहे में, कबीर दास जी कह रहे हैं कि वे हँसने और रोने को बराबर मानते हैं, और दोनों का अपने मन में स्थान है। उनके अनुसार, प्रेम और प्रियतम से बिना रोये, मनुष्य क्यों पाए? अर्थात्, बिना प्रेम के, जो कि बहुत महत्वपूर्ण है, व्यक्ति क्यों पाए?
जौ रोऊँ तो बल घटे, हँसौं तो राम रिसाइ।
मनही माँहि बिसूरणाँ, ज्यूँ घुंण काठहि खाइ॥28॥
इस दोहे में, कबीर दास जी कह रहे हैं कि अगर वह रोएँ तो उनका बल कम हो जाता है, लेकिन अगर हँसें तो उन्हें राम का आनंद मिलता है। वे कहते हैं कि मनुष्य को अपने मन की चापलूसी से निपटना चाहिए, जैसे कि खाद्य को लट्ठा काटकर काम में लाया जाता है।
हंसि हंसि कंत न पाइए, जिनि पाया तिनि रोइ।
जो हाँसेही हरि मिलै, तो नहीं दुहागनि कोइ॥29॥
इस दोहे में, कबीर दास जी कह रहे हैं कि वह लोग जो हंसते हंसते कामना से अपने लक्ष्य नहीं पाते, उन्हें वही रोते हुए पाया जाता है। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति हंसते हंसते ही भगवान को पा लेता है, उसके लिए कोई भी दुखी नहीं हो सकता।
हाँसी खेलौ हरि मिलै, तौ कौण सहे षरसान।
काम क्रोध त्रिष्णाँ तजै, ताहि मिलैं भगवान॥30॥
इस दोहे में, कबीर दास जी कह रहे हैं कि जो व्यक्ति हंसते हंसते और खेलते हुए भगवान को पा लेता है, उसके लिए किसी प्रकार का दुःख भी सहनीय नहीं होता। उन्हें बताया जाता है कि व्यक्ति को अपनी कामनाओं, क्रोध और तृष्णाओं को त्यागना चाहिए, क्योंकि उसी से भगवान का दर्शन होता है।
पूत पियारो पिता कौं, गौंहनि लागा धाइ।
लोभ मिठाई हाथ दे, आपण गया भुलाइ॥31॥
इस दोहे में, कबीर दास जी कह रहे हैं कि पुत्र अपने पिता के प्रति अत्यंत प्रेम करता है, लेकिन जब वह लोभी होता है और अन्यायपूर्ण भावनाओं के बल पर अपने पिता के साथ विश्वासघात करता है, तो वह खुद को भूल जाता है।
डारि खाँड़ पटकि करि, अंतरि रोस उपाइ।
रोवत रोवत मिलि गया, पिता पियारे जाइ॥32॥
इस दोहे में, कबीर दास जी कह रहे हैं कि जब हम अपने अन्तर में भ्रमित और उदास होते हैं, तो हमें अपने परमात्मा का अनुभव होता है। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति रोते-रोते अपने परमात्मा को पा लेता है, वह सच्चे पिता के पास जाता है।
टिप्पणी: ख-में इसके अनंतर यह दोहा है-
मो चित तिलाँ न बीसरौ, तुम्ह हरि दूरि थंयाह।
इहि अंगि औलू भाइ जिसी, जदि तदि तुम्ह म्यलियांह॥
इस पद में, कबीर दास ईश्वर को संबोधित करते हुए व्यक्त कर रहे हैं कि वह एक क्षण के लिए भी ईश्वरीय उपस्थिति को कभी नहीं भूलेंगे या उसकी उपेक्षा नहीं करेंगे। भगवान को दूर महसूस करने के बावजूद, कबीर आश्वस्त करते हैं कि भगवान कभी दूर नहीं हैं। यहां, कबीर ने रूपक रूप से खुद की तुलना एक उल्लू से की है, और सुझाव दिया है कि जिस तरह उल्लू दिन की रोशनी में नहीं देख सकता है, उसी तरह, वह कभी-कभी आध्यात्मिक रूप से अंधा महसूस करता है, लेकिन फिर भी, वह परमात्मा से जुड़ा हुआ है।
नैना अंतरि आचरूँ, निस दिन निरषौं तोहि।
कब हरि दरसन देहुगे सो दिन आवै मोंहि॥33॥
इस पद में कबीर दास ने ईश्वर के दर्शन की अपनी लालसा व्यक्त की है। उनका कहना है कि वह अपनी आंतरिक दृष्टि को लगातार ईश्वर पर केंद्रित रखते हैं और वह दिन-रात उस क्षण की प्रतीक्षा में बेचैन रहते हैं जब अंततः उन्हें ईश्वरीय उपस्थिति को देखने का सौभाग्यशाली अवसर मिलेगा।
कबीर देखत दिन गया, निस भी देखत जाइ।
बिरहणि पीव पावे नहीं, जियरा तलपै भाइ॥34॥
इस पद में कबीर अपने लक्ष्य को प्राप्त किए बिना दिन बीतने पर विचार करते हैं। वह गुज़रते दिनों की तुलना परमात्मा की ओर निरंतर यात्रा से करते हैं। इस चल रही यात्रा के बावजूद, वह परमात्मा के लिए अलगाव और लालसा की गहरी भावना महसूस करता है, इसकी तुलना एक प्यासे व्यक्ति से की जाती है जो पानी खोजने में असमर्थ है, लगातार तरस रहा है और सांत्वना की तलाश कर रहा है।
कै बिरहनि कूं मींच दे, कै आपा दिखलाइ।
आठ पहर का दाझणां, मोपै सह्या न जाइ॥35॥
अर्थ – इस पद में, कबीर अलगाव के निवारण और ईश्वर के प्रत्यक्ष रहस्योद्घाटन की इच्छा रखते हैं। वह अलगाव की पीड़ा से राहत पाने के लिए दिव्य उपस्थिति की अपनी इच्छा व्यक्त करता है। लंबे समय तक अलगाव के दर्द को सहने के बावजूद, उसे कोई राहत या आराम नहीं मिलता है, इस बात पर जोर देते हुए कि उसकी लालसा की तीव्रता बरकरार है।
बिरहणि थी तो क्यूँ रही, जली न पीव के नालि।
रहु रहु मुगध गहेलड़ी, प्रेम न लाजूँ मारि॥36॥
अर्थ – इस पद में, कबीर सवाल करते हैं कि अलगाव की पीड़ा का अनुभव करने के बावजूद, परमात्मा का साधक, कुएं के पानी से अपनी प्यास बुझाने के समान, दिव्य प्रेम में डूबकर सांत्वना क्यों नहीं ढूंढता है। वह इस स्थिति की तुलना एक मूर्ख हिरण से करता है जो भागने का कोई प्रयास किए बिना गहरे गड्ढे में फंसा रहता है। इसी प्रकार, दिव्य प्रेम की भावना से रहित साधक अज्ञानी बना रहता है और अलगाव की पीड़ा से राहत पाने में असफल रहता है।
हौं बिरहा की लाकड़ी, समझि समझि धूंधाउँ।
छूटि पड़ौं यों बिरह तें, जे सारीही जलि जाउँ॥37॥
अर्थ – इस पद में कबीर ने अलगाव की पीड़ा को लकड़ी के टुकड़े के रूप में रूपक रूप से वर्णित किया है। उनका सुझाव है कि व्यक्ति अक्सर इस दर्द को समझने या उसका विश्लेषण करने की कोशिश करते हैं, जैसे अंधेरे में कुछ खोजना। हालाँकि, अलगाव के इस दर्द से वास्तविक मुक्ति तब होती है जब कोई इससे पूरी तरह भस्म हो जाता है, जैसे लकड़ी आग से भस्म हो जाती है। श्लोक का तात्पर्य है कि केवल अलगाव के दर्द को पूरी तरह से अनुभव करने और उसके प्रति समर्पण करने से ही कोई इससे पार पा सकता है।
कबीर तन मन यों जल्या, बिरह अगनि सूँ लागि।
मृतक पीड़ न जाँणई, जाँणैगि यहूँ आगि॥38॥
अर्थ – इस पद में, कबीर ने ईश्वर से अलगाव की तीव्र पीड़ा का वर्णन अपने शरीर और मन को जलाने, अलगाव की आग में जलने के समान किया है। वह लाक्षणिक रूप से इस पीड़ा की तुलना जिंदा जलाए जाने से करता है। कबीर आगे सुझाव देते हैं कि जिन लोगों ने अलगाव की इस पीड़ा का अनुभव नहीं किया है, वे वास्तव में इसे समझ नहीं सकते हैं, ठीक उसी तरह जैसे जो व्यक्ति मरा नहीं है वह मृतक के दर्द को नहीं समझ सकता है। उनका तात्पर्य यह है कि केवल वे ही जो व्यक्तिगत रूप से इस तीव्र लालसा और अलगाव से गुज़रे हैं, वास्तव में इसकी गहराई और तीव्रता को समझ सकते हैं।
बिरह जलाई मैं जलौं, जलती जल हरि जाउँ।
मो देख्याँ जल हरि जलै, संतौं कहीं बुझाउँ॥39॥
अर्थ – इस पद में, कबीर ने ईश्वर से मिलन की अपनी गहरी लालसा व्यक्त की है और इसकी तुलना विरह की जलती आग से की है। वह कहते हैं कि वह स्वयं विरह की इस अग्नि में भस्म हो गए हैं और इस जलन में केवल ईश्वर का सार ही शेष रह जाता है। कबीर इस दिव्य तत्व को हर जगह जलते हुए देखना चाहते हैं, जैसे दिव्य अग्नि को हर चीज में व्याप्त देखना। वह इस समझ को संतों के साथ साझा करना चाहते हैं, जो पूरे अस्तित्व में व्याप्त दिव्य उपस्थिति के बारे में दूसरों को प्रबुद्ध करने की उनकी इच्छा को दर्शाता है।
परबति परबति में फिर्या, नैन गँवाये रोइ।
सो बूटी पाऊँ नहीं, जातें जीवनि होइ॥40॥
अर्थ – इस कविता में, कबीर ने रूपक रूप से ईश्वर की खोज में भटकने को पहाड़ों को पार करने के रूप में वर्णित किया है, जहां व्यक्ति गंतव्य की दृष्टि खो देता है और पीड़ा में रोता है। यह कल्पना आध्यात्मिक खोज में आने वाली कठिनाई और भ्रम का सुझाव देती है। कबीर को अफसोस है कि इतनी भटकने के बावजूद, उन्हें दिव्य सार नहीं मिला है, इसकी तुलना अमरता प्रदान करने वाली जड़ी-बूटी (बूटी) न मिलने से की जाती है, जिसका अर्थ है कि जीवन का असली सार या आध्यात्मिक पूर्ति मायावी बनी हुई है।
फाड़ि फुटोला धज करौं, कामलड़ी पहिराउँ।
जिहि जिहिं भेषा हरि मिलैं, सोइ सोइ भेष कराउँ॥41॥
अर्थ – इस कविता में, कबीर ने ईश्वर की निकटता प्राप्त करने के लिए अपने अहंकार और बाहरी दिखावे को त्यागने की प्रक्रिया का प्रतीकात्मक रूप से वर्णन किया है। वह अहंकार और अभिमान के कपड़े को फाड़ने और कमल के पत्ते की प्रतीक सादगी और विनम्रता से खुद को सजाने का सुझाव देते हैं। कबीर आगे इस बात पर जोर देते हैं कि जैसे-जैसे कोई ईश्वर के साथ मिलन की ओर बढ़ता है, उन्हें वह रूप अपनाना चाहिए जो उनके सामने आने वाले दैवीय गुणों को दर्शाता है, जो आंतरिक परिवर्तन और दैवीय गुणों के साथ संरेखण की आवश्यकता को दर्शाता है।
नैन हमारे जलि गये, छिन छिन लोड़ै तुझ।
नां तूं मिलै न मैं खुसी, ऐसी बेदन मुझ॥42॥
अर्थ – इस पद में, कबीर ने रूपक रूप से यह कहकर ईश्वर से अलग होने की गहरी पीड़ा व्यक्त की है कि उनकी आँखें आँसू बन गई हैं और उनका हृदय ईश्वर के लिए निरंतर पीड़ा महसूस करता है। उसे ऐसा महसूस होता है मानो हर पल ईश्वर की लालसा में व्यतीत हो रहा है, और यह लालसा बढ़ती ही जाती है, जिससे उसे परेशानी और पीड़ा होती है। कबीर आगे अफसोस जताते हुए कहते हैं कि न तो उन्हें खुशी मिलती है और न ही भगवान उनसे मिलने आते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें इतना गहरा दुख होता है।
भेला पाया श्रम सों, भौसागर के माँह।
जो छाँड़ौ तौ डूबिहौ, गहौं त डसिये बाँह॥43॥
अर्थ – इस पद में कबीर गहन आध्यात्मिक संदेश देने के लिए रूपक भाषा का प्रयोग करते हैं। वह जीवन की तुलना कठिनाइयों और चुनौतियों (भवसागर) के विशाल महासागर को पार करने से करता है। रूपक से पता चलता है कि जीवन समुद्र के अशांत पानी में नौकायन करने के समान संघर्षों और प्रयासों (श्रम) से भरा है। कबीर मानव अस्तित्व की दुविधा पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि यदि कोई इन चुनौतियों से बचने की कोशिश करता है, तो वे डूब सकते हैं, लेकिन अगर वे उन्हें पकड़ने की कोशिश करते हैं (यानी, सांसारिक गतिविधियों से बहुत अधिक जुड़ जाते हैं), तो वे भी उनमें भस्म हो जाएंगे। कविता जीवन में संतुलन और वैराग्य खोजने, चुनौतियों से अभिभूत हुए बिना उनका सामना करने के महत्व पर जोर देती है।
बिरह जलाई मैं जलौं, मो बिरहिन कै दूष।
छाँह न बैसों डरपती, मति जलि ऊठे रूष॥46॥
अर्थ – इस पद में, कबीर ने ईश्वर से अलगाव की पीड़ा से ग्रस्त होने की अपनी स्थिति व्यक्त की है। वह रूपक रूप से खुद को अलगाव में आग लगाने के रूप में वर्णित करता है, जिसका अर्थ है कि वह अलगाव के दर्द से घिरा हुआ है। इसके बाद कबीर ने इसकी तुलना उस व्यक्ति की स्थिति से की जो परमात्मा (बिरहिन) से अलग नहीं है, यह सुझाव देते हुए कि वे शुद्ध हैं। वह भय (अलगाव के) की छाया में न बैठने का आग्रह करता है, क्योंकि समझ (मति) प्रज्वलित होने पर मन में आक्रोश (क्रोध या कड़वाहट) पैदा होता है (जल उठे रुष)। यह कविता ईश्वर से अलगाव की गहरी आध्यात्मिक पीड़ा और शांति और स्वीकृति की स्थिति बनाए रखने के महत्व पर प्रकाश डालती है।
रैणा दूर बिछोहिया, रह रे संषम झूरि।
देवलि देवलि धाहड़ी, देखी ऊगै सूरि॥44॥
अर्थ – इस पद में, कबीर ने गहन आध्यात्मिक संदेश देने के लिए रूपकों का प्रयोग किया है। वह रात (रैना) की तुलना साधक को ईश्वर से अलग करने वाली दूरी (दूर) से करता है। इस दूरी के बावजूद, कबीर धैर्यवान और संयमित रहने (राह रे संसंम झूरी) और अधीरता या निराशा से अभिभूत न होने की सलाह देते हैं। इसके बाद उन्होंने अलंकारिक रूप से सुबह होने (देवली देवली धारी) को दैवीय उपस्थिति की अभिव्यक्ति के रूप में वर्णित किया, इसकी तुलना शेर (धाढ़ी) की दहाड़ से की, जिससे पता चलता है कि दैवीय सत्य की प्राप्ति आसन्न है। यह श्लोक आध्यात्मिक यात्रा में धैर्य और दृढ़ता के महत्व को रेखांकित करता है, इस आश्वासन के साथ कि आत्मज्ञान की सुबह अंततः आएगी।
सुखिया सब संसार है, खाये अरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रोवै॥45॥
अर्थ – इस पद में, कबीर सांसारिक सुख की सामान्य स्थिति की तुलना अपनी आध्यात्मिक असंतोष की स्थिति से करते हैं। उनका मानना है कि दुनिया में ज्यादातर लोग संतुष्ट, भौतिक सुखों में लिप्त और शांति से सोते हुए दिखते हैं। हालाँकि, कबीर खुद को दुखी (दुखिया) मानते हैं, क्योंकि वे जागृत हैं और गहरी आध्यात्मिक सच्चाइयों से अवगत हैं। जबकि अन्य लोग अज्ञानता में सोते हैं, कबीर जागते रहते हैं, ईश्वर से अलग होने के दर्द का अनुभव करते हैं और आध्यात्मिक जागृति की लालसा रखते हैं।
साखी – ग्यान बिरह कौ अंग
दीपक पावक आंणिया, तेल भी आंण्या संग।
तीन्यूं मिलि करि जोइया, (तब) उड़ि उड़ि पड़ैं पतंग॥1॥
अर्थ – यह दोहा भारतीय साहित्य का हिस्सा है, जिसे संत कबीर ने रचा है। इस दोहे में कबीर जी कह रहे हैं कि मतलब दीपक की ज्योति को भले ही पावक और तेल के संयोग से उत्पन्न किया जाए, लेकिन यह सिर्फ उसकी ज्योति को प्रकट नहीं कर सकता। वैसे ही जैसे कि पतंग को उड़ने के लिए उसको ऊपर की ओर उड़ने की जरूरत होती है, वैसे ही सच्चे ज्ञान की प्राप्ति के लिए मनुष्य को ऊँचाईयों की ओर जाना होता है।
मार्या है जे मरेगा, बिन सर थोथी भालि।
पड्या पुकारे ब्रिछ तरि, आजि मरै कै काल्हि॥2॥
अर्थ – यह दोहा भाग्य की अनिवार्यता और जीवन की अवधि की अनिश्चितता को दर्शाता है। यह सुझाव देता है कि मृत्यु सभी को आती है, चाहे उनकी परिस्थिति कुछ भी हो, और यह कब घटित होगी इसकी अप्रत्याशितता पर जोर देता है, इसकी तुलना एक पेड़ के गिरने से होती है जब एक कठफोड़वा उस पर चोंच मारता है।
हिरदा भीतरि दौ बलै, धूंवां प्रगट न होइ।
जाके लागी सो लखे, के जिहि लाई सोइ॥3॥
भले ही आँगन के अंदर दो चाँद हों, अगर रोशनी न हो, तो वह चमक नहीं पाएगा। जो होना तय है, वह होगा, बाकी कुछ नहीं होगा।”
अर्थ – यह दोहा इस बात पर जोर देता है कि केवल क्षमता या संसाधन होना ही पर्याप्त नहीं है; कार्रवाई और परिस्थितियाँ परिणाम प्रकट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह नियति की अनिवार्यता और जो होता है उसे स्वीकार करने के महत्व पर जोर देता है।
झल उठा झोली जली, खपरा फूटिम फूटि।
जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूत॥4॥
अर्थ – यह दोहा जीवन और भौतिक संपत्ति की क्षणिक प्रकृति को रूपक रूप से चित्रित करता है। थैले को उठाना और गठरी को जलाना सांसारिक आसक्तियों और इच्छाओं की नश्वरता का प्रतीक है। तपस्वी, सांसारिक मोह-माया को त्यागकर, केवल राख छोड़कर, खुशी-खुशी इस दुनिया से चला जाता है। यह वैराग्य की अवधारणा और भौतिक अस्तित्व की क्षणभंगुर प्रकृति को रेखांकित करता है।
अगनि जू लागि नीर में, कंदू जलिया झारि।
उतर दषिण के पंडिता, रहे विचारि बिचारि॥5॥
अर्थ – यह दोहा पानी में जलती हुई आग और अपने ही रस में उबलती लौकी की एक विरोधाभासी छवि प्रस्तुत करता है, उन स्थितियों को दर्शाता है जहां कुछ असंभव प्रतीत होता है। यह जीवन के विरोधाभासों और रहस्यों का प्रतीक है। दूसरी पंक्ति में उल्लिखित दक्षिण के विद्वान उन लोगों को संदर्भित कर सकते हैं जो गहन चिंतन और प्रतिबिंब के माध्यम से ज्ञान और समझ चाहते हैं।
दौं लागी साइर जल्या, पंषी बैठे आइ।
दाधी देह न पालवै सतगुर गया लगाइ॥6॥
अर्थ – यह दोहा गहन आध्यात्मिक सच्चाइयों को व्यक्त करने के लिए रूपक भाषा का उपयोग करता है। घास के ढेर में आग लगना और उस पर बैठे पक्षी सांसारिक परेशानियों और विकर्षणों का प्रतीक हैं। दूध का फटना किसी शुद्ध चीज़ को एक अलग रूप में बदलने का प्रतिनिधित्व करता है। आध्यात्मिक शिक्षाओं के संदर्भ में, ये घटनाएँ आत्मज्ञान के मार्ग पर आने वाली चुनौतियों और परिवर्तनों को दर्शाती हैं। सच्चे गुरु द्वारा छाप छोड़ने का उल्लेख किसी के जीवन पर आध्यात्मिक मार्गदर्शन और ज्ञानोदय के स्थायी प्रभाव का सुझाव देता है।
गुर दाधा चेल्या जल्या, बिरहा लागी आगि।
तिणका बपुड़ा ऊबर्या, गलि पूरे के लागि॥7॥
अर्थ – यह दोहा अपने गुरु की झोपड़ी जलने पर शिष्यों द्वारा अनुभव की गई परेशानी और उथल-पुथल का वर्णन करने के लिए कल्पना का उपयोग करता है। जलती हुई झोपड़ी मार्गदर्शन और ज्ञान की हानि का प्रतीक है। टिंडर द्वारा दर्शाए गए शिष्यों ने आग पकड़ ली, जिससे पता चलता है कि वे नुकसान से गहराई से प्रभावित हैं। धुएँ से भरी गली भ्रम और अनिश्चितता का प्रतीक है। कुल मिलाकर, कविता आध्यात्मिक मार्गदर्शन खोने के गहरे प्रभाव और शिष्यों द्वारा महसूस किए गए परिणामी भटकाव पर जोर देती है।
आहेड़ी दौ लाइया, मृग पुकारै रोइ।
जा बन में क्रीला करी, दाझत है बन सोइ॥8॥
अर्थ – यह दोहा सांसारिक प्रलोभनों और जाल में फंसने के परिणामों को दर्शाने के लिए एक शिकारी के जाल बिछाने और एक जानवर के पकड़े जाने के रूपक का उपयोग करता है। फंसे हुए जानवर का रोना पीड़ा और अफसोस का प्रतीक है। इसी तरह, जब कोई पक्षी जंगल में फंस जाता है, तो उसे खतरे का एहसास होता है और जंगल में प्रवेश करने के अपने फैसले पर पछतावा होता है। यह कविता जीवन की चुनौतियों और प्रलोभनों से निपटने में सावधानी और विवेक बरतने के महत्व पर प्रकाश डालती है।
पाणी मांहे प्रजली, भई अप्रबल आगि।
बहती सलिता रहि गई, मेछ रहे जल त्यागि॥9॥
अर्थ – यह दोहा आध्यात्मिक सत्य को व्यक्त करने के लिए रूपक भाषा का उपयोग करता है। पानी का जलना आग के प्रतीक एक बड़ी ताकत के सामने सांसारिक तत्वों की असुरक्षा और शक्तिहीनता को दर्शाता है। इसके विपरीत, बहती हुई नदी अप्रभावित और शांत रहती है, जो सांसारिक उथल-पुथल से लचीलापन और वैराग्य का संकेत देती है। इसी प्रकार, मछली स्वेच्छा से अपना निवास स्थान, पानी, छोड़ देती है, जिसका अर्थ है भौतिक आसक्तियों से वैराग्य। कुल मिलाकर, यह कविता जीवन की चुनौतियों और परिवर्तनों के बीच शांत और अलग रहने के महत्व पर जोर देती है
समंदर लागी आगि, नदियां जलि कोइला भई।
देखि कबीरा जागि, मंछी रूषां चढ़ि गई॥10॥
अर्थ – यह दोहा गहरी आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि व्यक्त करने के लिए ज्वलंत कल्पना का उपयोग करता है। समुद्र में आग लगना और नदियाँ कोयले में बदल जाना प्राकृतिक क्रम में होने वाले गहन व्यवधानों और परिवर्तनों का प्रतीक है। कबीर की जागृति इन असाधारण घटनाओं को देखने पर एक अहसास या आत्मज्ञान का सुझाव देती है। क्रोध में आरोही मछली ऐसी असाधारण घटनाओं के कारण होने वाली गड़बड़ी पर प्रतिक्रिया करने वाले प्राणियों का प्रतिनिधित्व कर सकती है, जो उथल-पुथल और परिवर्तन के प्रति सार्वभौमिक प्रतिक्रिया को उजागर करती है। कुल मिलाकर, यह कविता दुनिया की नश्वरता और अप्रत्याशितता और अराजकता के बीच आध्यात्मिक जागृति और समझ की आवश्यकता पर जोर देती है।
बिरहा कहै कबीर कौं तू जनि छाँड़े मोहि।
पारब्रह्म के तेज मैं, तहाँ ले राखौं तोहि॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर ने “बिरहा” को व्यक्त किया है, जिसे परमात्मा के लिए अलगाव या लालसा की भावना के रूप में समझा जा सकता है। कबीर सवाल करते हैं कि कोई व्यक्ति लालसा की इस भावना से क्यों दूर हो जाएगा, क्योंकि इस लालसा के माध्यम से ही कोई ईश्वर से मिलन पा सकता है। वह दावा करता है कि वह सर्वोच्च सत्ता की चमक या प्रतिभा का प्रतीक है, जो व्यक्तियों को आध्यात्मिक संतुष्टि और उनके वास्तविक स्वरूप की प्राप्ति के लिए उनकी शरण लेने के लिए प्रोत्साहित करता है।
साखी – परचा कौ अंग
कबीर तेज अनंत का, मानी ऊगी सूरज सेणि।
पति संगि जागी सूंदरी, कौतिग दीठा तेणि॥1॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर ने दिव्य प्रकाश और आध्यात्मिक मिलन के विचार को काव्यात्मक रूप से व्यक्त किया है। वह खुद की तुलना अनंत की चमक से करता है, यह सुझाव देता है कि उसका सार परमात्मा की प्रतिभा और असीमता को दर्शाता है। अपने पति की उपस्थिति में जागती एक खूबसूरत महिला की कल्पना आत्मा के जागरण या परमात्मा के साथ उसके वास्तविक स्वरूप की प्राप्ति का प्रतीक है। इसी तरह, मोती का अपने खोल के भीतर दिखाई देना आंतरिक सुंदरता और सच्चाई के प्रकट होने का प्रतीक है। कुल मिलाकर, यह कविता आध्यात्मिक जागृति और स्वयं के भीतर दिव्य उपस्थिति की पहचान के विषय को बताती है
कोतिग दीठा देह बिन, मसि बिना उजास।
साहिब सेवा मांहि है, बेपरवांही दास॥2॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर आध्यात्मिक सत्य को व्यक्त करने के लिए रूपक भाषा का प्रयोग करते हैं। उनका सुझाव है कि सच्ची अनुभूति और रोशनी तब होती है जब कोई व्यक्ति भौतिक शरीर और भौतिक आसक्तियों से परे चला जाता है। शरीर के बिना मोती को देखने और मांस के बिना मौजूद प्रकाश की कल्पना भौतिक रूपों से परे सार को समझने के विचार को दर्शाती है। कबीर इस बात पर जोर देते हैं कि गुरु (परमात्मा या आध्यात्मिक मार्गदर्शक का प्रतिनिधित्व) की सेवा करना एक आंतरिक मामला है, जो दर्शाता है कि यह केवल बाहरी कार्यों के बजाय दिल और आत्मा का मामला है। बिना किसी दूसरे विचार के सेवक बनने की धारणा आध्यात्मिक यात्रा में संपूर्ण हृदय से समर्पण और समर्पण के महत्व को रेखांकित करती है।
पारब्रह्म के तेज का, कैसा है उनमान।
कहिबे कूं सोभा नहीं, देख्याही परवान॥3॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर सर्वोच्च सत्ता की प्रतिभा की अवर्णनीय प्रकृति को दर्शाते हैं। उनका सुझाव है कि ईश्वर की महिमा और महिमा का वर्णन करने के लिए शब्द अपर्याप्त हैं। इसके बजाय, किसी को इसकी भव्यता को वास्तव में समझने और सराहने के लिए इसका प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहिए। कबीर का तात्पर्य है कि केवल ईश्वरीय महिमा के बारे में बात करना उसके साथ न्याय नहीं करता; वास्तव में योग्य या मान्य बनने के लिए व्यक्ति को इसे व्यक्तिगत रूप से देखना चाहिए। कविता इस विचार को रेखांकित करती है कि आध्यात्मिक अनुभूति मौखिक विवरण और बौद्धिक समझ से परे है, दिव्य ज्ञान की ओर यात्रा में प्रत्यक्ष अनुभव के महत्व पर जोर देती है।
अगम अगोचर गमि नहीं, तहां जगमगै जोति।
जहाँ कबीरा बंदिगी, ‘तहां’पाप पुन्य नहीं छोति॥4॥
अर्थ – इस दोहे में कबीर ईश्वरीय क्षेत्र की प्रकृति पर प्रकाश डालते हैं। उनका सुझाव है कि परमात्मा, जो समझ और धारणा से परे है, उसकी उज्ज्वल रोशनी से पहचाना जाता है। कबीर फिर इस बात पर जोर देते हैं कि जिस क्षेत्र में कबीरा की सच्ची पूजा (ईश्वरीय या सच्चे आध्यात्मिक मार्ग का प्रतिनिधित्व) मौजूद है, वहां पाप या पुण्य का कोई प्रभाव नहीं है। इसका तात्पर्य यह है कि सच्ची आध्यात्मिक भक्ति पाप और पुण्य जैसी सांसारिक अवधारणाओं के द्वंद्व से परे है, जो शुद्ध चेतना और मुक्ति की स्थिति की ओर ले जाती है। यह श्लोक इस विचार को रेखांकित करता है कि वास्तविक आध्यात्मिक अभ्यास व्यक्ति को नैतिक द्वंद्व की सीमाओं से परे दिव्य प्राप्ति की स्थिति की ओर ले जाता है।
हदे छाड़ि बेहदि गया, हुवा निरंतर बास।
कवल ज फूल्या फूल बिन, को निरषै निज दास॥5॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर ने एक ऐसे आत्मज्ञानी की पारलौकिक स्थिति का वर्णन किया है, जिसने सभी सीमाओं और सीमाओं को पार कर शाश्वत अस्तित्व की स्थिति प्राप्त कर ली है। बिना किसी चिंता या चिंता के खिलने वाले फूल का रूपक आध्यात्मिक अनुभूति के स्वाभाविक प्रकटीकरण को दर्शाता है। इसके बाद कबीर ने एक अलंकारिक प्रश्न उठाया और सुझाव दिया कि जिस प्रकार फूल को खिलने से कोई नहीं रोक सकता, उसी प्रकार आध्यात्मिक पथ के प्रति समर्पित सच्चे भक्त के मार्ग में कोई भी बाधा नहीं डाल सकता। यह श्लोक दैवीय इच्छा के प्रति समर्पण करने और आध्यात्मिक विकास को सहजता से विकसित होने देने के विचार पर प्रकाश डालता है।
कबीर मन मधुकर भया, रह्या निरंतर बास।
कवल ज फूल्या जलह बिन, को देखै निज दास॥6॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर ने दिव्य आनंद में लीन होने की अपनी स्थिति का वर्णन करने के लिए फूलों की सुगंध से मदहोश मधुमक्खी के रूपक का उपयोग किया है। मधुमक्खी लगातार फूल के रस में डूबी रहती है, जो कबीर के परमात्मा के साथ अटूट संबंध का प्रतीक है। इसी तरह, जिस तरह एक फूल पानी जैसे बाहरी सहारे के बिना स्वाभाविक रूप से खिलता है, कबीर का तात्पर्य है कि उनका आध्यात्मिक अहसास बाहरी कारकों पर निर्भरता के बिना सहजता से खिलता है। इसके बाद उन्होंने एक अलंकारिक प्रश्न उठाया और सुझाव दिया कि जिस प्रकार विनम्र सेवक पर कोई ध्यान नहीं देता, उसी प्रकार भक्ति और समर्पण की गहराई को केवल परमात्मा ही समझ सकता है। यह श्लोक परमात्मा में आंतरिक अवशोषण के विचार और आध्यात्मिक प्राप्ति के मार्ग में बाहरी मान्यता के महत्व पर जोर देता है।
अंतर कवल प्रकासिया, ब्रह्म बास तहां होइ।
मन भवरा तहां लुबधिया, जांणैगा जन कोइ॥7॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर उस आंतरिक रोशनी की बात करते हैं जो उस क्षेत्र में मौजूद है जहां ब्रह्मा, परम वास्तविकता, निवास करते हैं। उनका सुझाव है कि सच्चा ज्ञान और आध्यात्मिक बोध भीतर पाया जाता है, जहां दिव्य उपस्थिति प्रकट होती है। कबीर उन लोगों द्वारा अनुभव की जाने वाली आंतरिक शांति और संतुष्टि की तुलना करते हैं जिनका मन इस दिव्य क्षेत्र में लीन है और सामान्य मन की बेचैनी के साथ। उनका तात्पर्य यह है कि केवल कुछ ही व्यक्ति वास्तव में अंदर की ओर मुड़ने और आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त करने के महत्व को समझते हैं। यह कविता आंतरिक रोशनी के महत्व और इसे समझने और प्राप्त करने वालों की दुर्लभता पर जोर देती है।
सायर नाहीं सीप बिन, स्वाति बूँद भी नाहिं।
कबीर मोती नीपजै, सुन्नि सिषर गढ़ माँहिं॥8॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर गहन आध्यात्मिक सच्चाइयों को व्यक्त करने के लिए रूपकों का उपयोग करते हैं। पहली पंक्ति ब्रह्मांड में विभिन्न तत्वों की परस्पर निर्भरता का सुझाव देती है; जिस प्रकार धोबी के बिना कपड़ा साफ नहीं किया जा सकता और तारों की उपस्थिति के बिना बारिश नहीं हो सकती, उसी प्रकार अस्तित्व में हर चीज एक-दूसरे से जुड़ी हुई है और एक-दूसरे पर निर्भर है।
अर्थ – दूसरी पंक्ति में, कबीर समुद्र में मोती बनने और फिर एक खाली सीप में पाए जाने की कल्पना का उपयोग करते हैं। यह रूपक आध्यात्मिक अनुभूति की यात्रा का प्रतीक है। सागर चेतना या दिव्य उपस्थिति के विशाल विस्तार का प्रतिनिधित्व करता है, और मोती आत्मज्ञान या आध्यात्मिक ज्ञान के सार का प्रतीक है। कबीर सुझाव देते हैं कि सच्चा अहसास व्यक्ति के अस्तित्व की शून्यता के भीतर होता है, जैसे एक खाली खोल के भीतर एक कीमती मोती की खोज।
कुल मिलाकर, कविता अस्तित्व के अंतर्संबंध और इस विचार पर जोर देती है कि आध्यात्मिक अनुभूति व्यक्ति के अपने अस्तित्व की गहराई के भीतर से उत्पन्न होती है।
घट माँहे औघट लह्या, औघट माँहैं घाट।
कहि कबीर परचा भया, गुरु दिखाई बाट॥9॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर आध्यात्मिक सत्य को व्यक्त करने के लिए घड़े और घड़े के रूपक का उपयोग करते हैं। “बर्तन” व्यक्तिगत आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि “घड़ा” दिव्य या सभी अस्तित्व के स्रोत का प्रतीक है। कबीर सुझाव देते हैं कि व्यक्तिगत आत्मा परमात्मा से निकलती है, जैसे घड़े के भीतर से घड़ा निकाला जाता है। हालाँकि, परमात्मा व्यक्ति की आत्मा के भीतर उसी तरह रहता है, जैसे घड़ा घड़े के भीतर रहता है।
कबीर फिर दावा करते हैं कि व्यक्तिगत आत्मा और परमात्मा के बीच इस रिश्ते का रहस्य गुरु, आध्यात्मिक शिक्षक द्वारा प्रकट किया गया है। गुरु इस गहन सत्य को समझने का मार्ग दिखाते हैं और साधक को आध्यात्मिक प्राप्ति के मार्ग पर ले जाते हैं।
कुल मिलाकर, यह श्लोक व्यक्तिगत आत्मा और परमात्मा के बीच घनिष्ठ संबंध और आध्यात्मिक समझ और ज्ञानोदय को सुविधाजनक बनाने में गुरु की भूमिका पर जोर देता है।
सूर समांणो चंद में, दहूँ किया घर एक।
मनका च्यंता तब भया, कछू पूरबला लेख॥10॥
अर्थ – इस दोहे में कबीर आध्यात्मिक सत्य को व्यक्त करने के लिए रूपक भाषा का प्रयोग करते हैं। सूर्य दिव्य चेतना का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि चंद्रमा मन या व्यक्तिगत आत्म का प्रतीक है। कबीर सुझाव देते हैं कि दिव्य चेतना और व्यक्तिगत स्व दोनों एक ही ब्रह्मांडीय निवास के भीतर मौजूद हैं, जो व्यक्ति और परमात्मा के बीच अंतर्निहित एकता का संकेत देता है।
कबीर फिर उस क्षण का वर्णन करते हैं जब मन चिंतित या परेशान हो गया था। यह गड़बड़ी तब होती है जब व्यक्ति को दिव्य चेतना के साथ अपने संबंध का एहसास होता है, जिसके परिणामस्वरूप धारणा या समझ में गहरा बदलाव होता है। कबीर का तात्पर्य है कि यह अनुभूति असाधारण और परिवर्तनकारी है, जो आध्यात्मिक जागृति या आत्मज्ञान की ओर ले जाती है।
कुल मिलाकर, यह कविता व्यक्ति के भीतर रहने वाले परमात्मा की अवधारणा और इस अंतर्निहित एकता को साकार करने के परिवर्तनकारी प्रभाव को रेखांकित करती है।
हद छाड़ि बेहद गया, किया सुन्नि असनान।
मुनि जन महल न पावई, तहाँ किया विश्राम॥11॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर किसी ऐसे व्यक्ति की स्थिति का वर्णन करते हैं जिसने सभी सीमाओं को पार कर गहन शांति की स्थिति प्राप्त कर ली है। व्यक्ति ने सीमित दुनिया की सीमाओं को पार कर लिया है और आंतरिक शांति की गहरी भावना का अनुभव किया है। कबीर इस स्थिति की तुलना तपस्वी ऋषियों (मुनियों) द्वारा महल को खोजने में असमर्थता से करते हैं, जो परम सत्य या दिव्य अनुभूति का प्रतीक है। अपने प्रयासों और त्याग के बावजूद, वे अंतिम मंजिल को प्राप्त नहीं कर सके।
कबीर ने यह आलंकारिक प्रश्न उठाया है कि अगर इन तपस्वियों को महल भी नहीं मिला तो उन्हें आराम कहां मिलेगा, और सुझाव दिया कि सच्चा आराम या शांति केवल दैवीय सत्य की प्राप्ति में ही मिल सकती है। यह कविता आध्यात्मिक उत्कृष्टता और आंतरिक शांति और प्राप्ति की अंतिम खोज के विषय पर जोर देती है।
देखौ कर्म कबीर का, कछु पूरब जनम का लेख।
जाका महल न मुनि लहैं, सो दोसत किया अलेख॥12॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर अपने कार्यों और अपने पिछले जन्मों के परिणामों के बारे में बात करते हैं। उनका सुझाव है कि उनके वर्तमान कार्य पिछले जन्मों में संचित कर्मों से प्रभावित हैं। कबीर परम सत्य या ईश्वरीय अनुभूति को दर्शाने के लिए महल के रूपक का उपयोग करते हैं। उनका तात्पर्य यह है कि यहां तक कि तपस्वी ऋषि भी, जिन्होंने सांसारिक आसक्तियों और गतिविधियों को त्याग दिया है, इस परम सत्य को प्राप्त नहीं कर सके।
कबीर फिर इस परम सत्य को एक मित्र के रूप में वर्णित करते हैं, जो एक घनिष्ठ और अंतरंग रिश्ते का संकेत देता है। हालाँकि, उनका दावा है कि यह मित्र वर्णन (लेख) से परे है, जिसका अर्थ है कि यह शब्दों या समझ से परे है।
कुल मिलाकर, यह कविता पिछले कार्यों के परिणामों और अंतिम सत्य या दिव्य प्राप्ति की अक्षमता को समझने के महत्व पर जोर देती है। यह आध्यात्मिक खोज और आंतरिक अनुभूति की खोज के विषय पर जोर देता है।
पिंजर प्रेमे प्रकासिया, जाग्या जोग अनंत।
कुल मिलाकर, यह कविता दिव्य प्रेम की परिवर्तनकारी शक्ति और परमात्मा के साथ मिलन के माध्यम से आध्यात्मिक मुक्ति की प्राप्ति पर जोर देती है। यह भक्ति, आध्यात्मिक जागृति और आंतरिक पूर्णता की खोज के विषयों को रेखांकित करता है।
प्यंजर प्रेम प्रकासिया, अंतरि भया उजास।
मुख कसतूरी महमहीं, बांणीं फूटी बास॥14॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर व्यक्तिगत आत्म का प्रतिनिधित्व करने के लिए पिंजरे के रूपक का उपयोग करते हैं, जो दिव्य प्रेम से प्रकाशित होता है। यह दिव्य प्रेम जागरूकता और आध्यात्मिक अनुभूति की आंतरिक रोशनी को सामने लाता है। कस्तूरी मृग द्वारा सुगंध के स्रोत को बाहर खोजने का संदर्भ बाहरी वस्तुओं और अनुभवों में खुशी और संतुष्टि की तलाश करने की मानवीय प्रवृत्ति का प्रतीक है, इस बात से अनजान कि खुशी का असली स्रोत भीतर है।
कबीर सुझाव देते हैं कि, कस्तूरी मृग की तरह, व्यक्ति अक्सर आनंद के आंतरिक स्रोत को नजरअंदाज कर देते हैं, और इसे बाहरी रूप से खोजते हैं। हालाँकि, जैसे ही कस्तूरी मृग को अंततः पता चलता है कि सुगंध उसके अपने शरीर के भीतर से निकलती है, व्यक्तियों को यह एहसास हो सकता है कि सच्ची खुशी और संतुष्टि आध्यात्मिक अनुभूति के माध्यम से उनके भीतर पाई जाती है।
कुल मिलाकर, यह कविता अंदर की ओर मुड़ने और दिव्य प्रेम और आध्यात्मिक जागृति के माध्यम से खुशी और संतुष्टि के आंतरिक स्रोत की खोज करने के महत्व पर जोर देती है। यह आंतरिक बोध और आध्यात्मिक ज्ञान की खोज के विषय को रेखांकित करता है।
मन लागा उन मन्न सों, गगन पहुँचा जाइ।
देख्या चंदबिहूँणाँ, चाँदिणाँ, तहाँ अलख निरंजन राइ॥15॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर ने आध्यात्मिक धुन और अनुभूति के अनुभव का वर्णन किया है। उनका सुझाव है कि जब मन केंद्रित होता है और प्रिय के प्रति समर्पित होता है, तो यह सांसारिक सीमाओं को पार कर जाता है और आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुंच जाता है, जिसका प्रतीक आकाश है। यह सामंजस्य निराकार और बेदाग क्षेत्र के अनुभव की ओर ले जाता है, जहां दिव्य उपस्थिति का एहसास होता है।
इसके बाद कबीर शांति और सुंदरता की भावना पैदा करने के लिए चांदनी रातों की कल्पना का उपयोग करते हैं। चांदनी रातें आध्यात्मिक स्पष्टता और रोशनी के क्षणों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जहां परमात्मा को उसके शुद्ध, निराकार रूप में देखा जाता है। इस क्षेत्र में, कबीर का सुझाव है, भौतिक संसार की सीमाओं से परे, वास्तविकता की निराकार, बेदाग प्रकृति का रहस्योद्घाटन है।
कुल मिलाकर, यह कविता सांसारिक सीमाओं को पार करने और अपने शुद्धतम रूप में दिव्य उपस्थिति का अनुभव करने में आध्यात्मिक भक्ति और सामंजस्य के महत्व पर जोर देती है। यह आध्यात्मिक अनुभूति और प्रिय के साथ मिलन की खोज के विषय को रेखांकित करता है
मन लागा उन मन सों, उन मन मनहि बिलग।
लूँण बिलगा पाणियाँ, पाँणीं लूँणा बिलग॥16॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर मिलन या विलय की अवधारणा को दर्शाने के लिए नमक और पानी के रूपक का उपयोग करते हैं। उनका सुझाव है कि जब मन पूरी तरह से समर्पित हो जाता है और प्रिय के प्रति समर्पित हो जाता है, तो वह उस प्रिय के साथ पूरी तरह से विलीन हो जाता है, जैसे नमक और पानी एक साथ मिल जाते हैं।
कबीर की सादृश्यता का तात्पर्य व्यक्तिगत स्वयं और प्रिय के बीच पूर्ण एकता और सीमाओं के विघटन की स्थिति से है। जिस प्रकार नमक घुलकर पानी में एक हो जाता है, उसी प्रकार व्यक्तिगत आत्मा भी घुलकर परमात्मा में एक हो जाती है। यह रूपक आध्यात्मिक मिलन के विषय और दिव्य उपस्थिति के साथ विलय के अंतिम लक्ष्य को रेखांकित करता है।
कुल मिलाकर, यह श्लोक आध्यात्मिक प्राप्ति के मार्ग में आध्यात्मिक भक्ति और मिलन के महत्व पर जोर देता है, जो प्रिय के साथ एकता और एकता की अवधारणा को दर्शाता है।
पाँणी ही तें हिम भया, हिम ह्नै गया बिलाइ।
जो कुछ था सोई भया, अब कछू कह्या न जाइ॥17॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर अस्तित्व की क्षणभंगुर प्रकृति को चित्रित करने के लिए पानी के बर्फ में बदलने और फिर पिघलने के रूपक का उपयोग करते हैं। पानी का बर्फ में जमना सांसारिक रूपों के जमने या प्रकट होने का प्रतीक है, जबकि बर्फ का वापस पानी में पिघलना उन रूपों के विघटन या नश्वरता का प्रतिनिधित्व करता है।
कबीर सुझाव देते हैं कि जो कुछ भी जमी हुई अवस्था में था, एक बार जब वह पिघल जाता है, तो कुछ भी नहीं बचता है। इसकी व्याख्या सांसारिक घटनाओं की क्षणिक प्रकृति और सभी भौतिक रूपों के अंतिम विघटन पर प्रतिबिंब के रूप में की जा सकती है। इस नश्वरता के सामने, कबीर का तात्पर्य है कि समझने या कहने के लिए कुछ भी ठोस या स्थायी नहीं है।
कुल मिलाकर, यह कविता नश्वरता के विषय और सांसारिक अस्तित्व की भ्रामक प्रकृति पर जोर देती है। यह जीवन की क्षणभंगुर प्रकृति पर चिंतन और क्षणभंगुर के बीच शाश्वत की तलाश के महत्व को प्रोत्साहित करता है।
भली भई जु भै पड्या, गई दशा सब भूलि।
पाला गलि पाँणी भया, ढुलि मिलिया उस कूलि॥18॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर समर्पण या सांसारिक चिंताओं और आसक्तियों को त्यागने के अनुभव को दर्शाते हैं। वह गिरने के उस क्षण के लिए आभार व्यक्त करता है, जिसने उसे सभी बाहरी परिस्थितियों और विकर्षणों को भूलने की अनुमति दी। इस गिरावट की व्याख्या रूपक रूप से समर्पण या आध्यात्मिक जागृति की स्थिति के रूप में की जा सकती है, जहां व्यक्ति अहंकार और सांसारिक इच्छाओं के प्रति लगाव को छोड़ देता है।
कबीर फिर एक धारा के बहने और समुद्र में विलीन होने की कल्पना का उपयोग व्यक्तिगत आत्मा के परमात्मा के साथ मिलन के प्रतीक के रूप में करते हैं। जिस प्रकार धारा अपनी पहचान खो देती है और सागर की विशालता में विलीन हो जाती है, कबीर सुझाव देते हैं कि समर्पण की स्थिति में, व्यक्तिगत आत्मा आध्यात्मिक मुक्ति और पूर्णता प्राप्त करते हुए दिव्य चेतना में विलीन हो जाती है।
चौहटै च्यंतामणि चढ़ी, हाडी मारत हाथि।
मीरा मुझसूँ मिहर करि, इब मिलौं न काहू साथि॥19॥
अर्थ – इस कविता में, मीराबाई अपनी आध्यात्मिक यात्रा और उनके सामने आने वाली चुनौतियों को व्यक्त करने के लिए रूपक भाषा का उपयोग करती हैं। “छत” आध्यात्मिक पथ का प्रतीक है, और “इच्छा-पूर्ति करने वाला रत्न” दिव्य प्राप्ति या कृष्ण के साथ मिलन की उसकी खोज का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे वह अपना प्रिय मानती थी। हालाँकि, आध्यात्मिक संतुष्टि पाने के बजाय, उसे चमगादड़ द्वारा हमला करने वाली बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
इस झटके के बावजूद, मीराबाई को अपने प्रिय कृष्ण के करुणामय शब्दों में सांत्वना मिलती है। वह इस अनुभव की व्याख्या एक संकेत के रूप में करती है कि उसे बाहरी परिस्थितियों या साहचर्य पर निर्भरता के बिना, अपने आध्यात्मिक पथ पर अकेले चलना चाहिए।
पंषि उडाणी गगन कूँ, प्यंड रह्या परदेस।
पाँणी पीया चंच बिन, भूलि गया यहु देस॥20॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर गहन आध्यात्मिक सत्य को व्यक्त करने के लिए रूपक भाषा का उपयोग करते हैं। “पक्षी” व्यक्तिगत आत्मा या मनुष्य का प्रतीक है, जबकि “आकाश” अस्तित्व या आध्यात्मिक क्षेत्र के विशाल विस्तार का प्रतिनिधित्व करता है। आकाश में उड़ने के बावजूद, पक्षी का “घोंसला” या सच्चा घर दूर देश में है, जो बताता है कि व्यक्ति का असली सार भौतिक दुनिया से परे, परमात्मा के दायरे में है।
कबीर ने चंबल नदी का संदर्भ देकर इस बात को और स्पष्ट किया है, जो अपने गंदे और अशांत पानी के लिए जानी जाती है। चंबल नदी का पानी पीने से व्यक्ति अपने वास्तविक आध्यात्मिक स्वरूप और मूल को भूलकर सांसारिक इच्छाओं और आसक्तियों में उलझ जाता है।
पंषि उड़ानी गगन कूँ, उड़ी चढ़ी असमान।
जिहिं सर मण्डल भेदिया, सो सर लागा कान॥21॥
अर्थ – इस दोहे में कबीर आध्यात्मिक सत्य को व्यक्त करने के लिए रूपक भाषा का प्रयोग करते हैं। “पक्षी” व्यक्तिगत आत्मा या मनुष्य का प्रतीक है, जबकि “आकाश” अस्तित्व या आध्यात्मिक क्षेत्र के असीम दायरे का प्रतिनिधित्व करता है। आकाश में पक्षी की उड़ान आध्यात्मिक मुक्ति या अतिक्रमण की खोज का सुझाव देती है।
इसके बाद कबीर सिर के काटे जाने और फिर से जोड़े जाने की अवधारणा का परिचय देते हैं। इस रूपक की व्याख्या जन्म और मृत्यु के चक्र या जीवन के अनुभवों के प्रतीक के रूप में की जा सकती है। कबीर सुझाव देते हैं कि व्यक्ति के सामने चाहे कितनी भी चुनौतियाँ या बाधाएँ आएँ, नवीनीकरण या पुनर्जनन की संभावना हमेशा बनी रहती है।
सुरति समाँणो निरति मैं, निरति रही निरधार।
सुरति निरति परचा भया, तब खूले स्यंभ दुवार॥22॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर ने गहन ध्यान और आध्यात्मिक अभ्यास में तल्लीनता के अपने अनुभव का वर्णन किया है। “सुरति” शब्द ध्यान या चिंतन को संदर्भित करता है, जबकि “निरति” अवशोषण या स्थिर होने का प्रतीक है। कबीर इंगित करते हैं कि वे बिना किसी बाहरी समर्थन या व्याकुलता के, अपने ध्यान अभ्यास में अटल रहे।
इसके बाद कबीर ध्यान और तल्लीनता के विलय की बात करते हैं, और परमात्मा के साथ पूर्ण मिलन या संरेखण की स्थिति का सुझाव देते हैं। यह विलय सर्वोच्च के द्वार खोलने की ओर ले जाता है, जो आध्यात्मिक अनुभूति या ज्ञान की प्राप्ति का प्रतीक है।
सुरति समाँणो निरति मैं, अजपा माँहै जाप।
लेख समाँणाँ अलेख मैं, यूँ आपा माँहै आप॥23॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर ध्यान में अपनी गहरी व्यस्तता और अनकहे मंत्र (अजपा जप) के निरंतर दोहराव को व्यक्त करते हैं, जो निरंतर ध्यान और आंतरिक अवशोषण की स्थिति का संकेत देता है। “अजपा” शब्द मंत्र की पुनरावृत्ति को संदर्भित करता है जो सचेत प्रयास के बिना, अनायास और लगातार भीतर होता है।
कबीर तब आध्यात्मिक अनुभूति की गहन स्थिति को दर्शाने के लिए तल्लीनता के ग्रंथों में लिखे जाने के रूपक का उपयोग करते हैं। उनका सुझाव है कि यद्यपि उनकी तल्लीनता की स्थिति को आध्यात्मिक ग्रंथों में पहचाना और प्रलेखित किया गया है, लेकिन उनका वास्तविक सार वर्णन या वर्गीकरण से परे है। जिस प्रकार आत्मा स्वतंत्र रूप से और स्व-अस्तित्व में मौजूद है, कबीर का तात्पर्य है कि उनका आध्यात्मिक अहसास शब्दों या लिखित विवरणों से परे है।
आया था संसार में, देषण कौं बहु रूप।
कहै कबीरा संत ही, पड़ि गया नजरि अनूप॥24॥
अर्थ – इस दोहे में कबीर संसार में अस्तित्व की विविध अभिव्यक्तियों पर प्रकाश डालते हैं। वह अस्तित्व के दायरे में जीवन के असंख्य रूपों और दिखावे को स्वीकार करता है। हालाँकि, कबीर सुझाव देते हैं कि इस विविधता के बीच, केवल संत या आध्यात्मिक रूप से जागृत व्यक्ति ही हैं जो वास्तव में अस्तित्व की असाधारण प्रकृति को समझते हैं।
कबीर का तात्पर्य है कि संतों के पास एक विशेष अंतर्दृष्टि या दृष्टि होती है जो उन्हें दुनिया की सतही दिखावे से परे देखने और सभी सृष्टि में मौजूद अंतर्निहित एकता और दिव्य सार को पहचानने की अनुमति देती है। उनकी धारणा सामान्य से परे है और अस्तित्व की असाधारण सुंदरता और अंतर्संबंध को महसूस करती है।
अंक भरे भरि भेटिया, मन मैं नाँहीं धीर।
कहै कबीर ते क्यूँ मिलैं, जब लग दोइ सरीर॥25॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर औपचारिकताओं और दिखावे की विशेषता वाले सामाजिक संबंधों की सतहीता को दर्शाते हैं। उनका मानना है कि बैठकों और सभाओं के बाहरी दिखावे के बावजूद, मन में अक्सर वास्तविक जुड़ाव या स्थिरता की कमी होती है।
कबीर ऐसी बैठकों के उद्देश्य पर सवाल उठाते हैं जब इसमें शामिल व्यक्ति मन और आत्मा के स्तर पर अलग-थलग रहते हैं। उनका सुझाव है कि सच्चा संवाद और जुड़ाव तभी हो सकता है जब भौतिक शरीर की सीमाओं को पार करते हुए चेतना की एकता हो।
सचु पाया सुख ऊपनाँ, अरु दिल दरिया पूरि।
सकल पाप सहजै गये, जब साँई मिल्या हजूरि॥26॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर उस गहन आंतरिक परिवर्तन और आध्यात्मिक अनुभूति को दर्शाते हैं जो उन्होंने ईश्वर से मिलने पर अनुभव किया था। वह प्रतीकात्मक रूप से अपने भीतर सच्ची खुशी खोजने का वर्णन करता है, यह सुझाव देता है कि आध्यात्मिक संतुष्टि और संतुष्टि बाहरी स्रोतों के बजाय भीतर से उत्पन्न होती है।
कबीर अपने आध्यात्मिक अनुभव की विशालता और गहराई को व्यक्त करने के लिए हृदय के सागर बन जाने के रूपक का उपयोग करते हैं। उनका तात्पर्य यह है कि ईश्वर के साथ मिलन ने उनके हृदय को असीम प्रेम और करुणासे भर दिया, जिससे इसका विस्तार पूरे अस्तित्व में हो गया।
इसके अलावा, कबीर का दावा है कि ईश्वर के साथ मिलन के परिणामस्वरूप सभी पाप सहजता से नष्ट हो गए। इससे पता चलता है कि दिव्य उपस्थिति का एहसास और आध्यात्मिक मिलन का अनुभव व्यक्ति को पिछले कार्यों और नकारात्मक प्रवृत्तियों के बोझ से शुद्ध करने और मुक्त करने की शक्ति रखता है।
धरती गगन पवन नहीं होता, नहीं तोया, नहीं तारा।
तब हरि हरि के जन होते, कहै कबीर बिचारा॥27॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर अस्तित्व के मूल तत्वों पर विचार करते हैं: पृथ्वी, आकाश, वायु, जल और तारे। उनका सुझाव है कि ब्रह्मांड के इन आवश्यक घटकों के बिना, मानव अस्तित्व के लिए कोई भौतिक क्षेत्र नहीं होगा।
हालाँकि, कबीर भौतिक क्षेत्र से परे जाकर एक गहरा सवाल उठाते हैं: इन भौतिक तत्वों की अनुपस्थिति में, भगवान के भक्त या अनुयायी कौन होंगे? वह भक्ति और आध्यात्मिकता की प्रकृति पर चिंतन को आमंत्रित करते हैं, जिसका अर्थ है कि इन तत्वों की उपस्थिति आध्यात्मिक अभ्यास और परमात्मा के प्रति समर्पण का अवसर प्रदान करती है।
जा दिन कृतमनां हुता, होता हट न पट।
हुता कबीरा राम जन, जिनि देखै औघट घट॥28॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर किसी के कार्यों के परिणामों पर विचार करते हैं, यह सुझाव देते हुए कि किसी के कार्यों के परिणामों या नतीजों से बचा नहीं जा सकता है। वह छुपाने या टालने की संभावना के बिना, अपने कार्यों के परिणामों का सामना करने की अनिवार्यता पर जोर देता है।
इसके बाद कबीर सामान्य के भीतर असाधारण को समझने की अवधारणा का परिचय देते हैं। उनका सुझाव है कि राम या भगवान के सच्चे भक्त वे हैं जो जीवन के सांसारिक पहलुओं के भीतर दिव्य उपस्थिति को पहचानने की क्षमता रखते हैं। इसका तात्पर्य एक बढ़ी हुई जागरूकता और आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि से है जो व्यक्तियों को वास्तविकता की सतह से परे देखने और सभी चीजों में निहित गहरे आध्यात्मिक आयाम को समझने में सक्षम बनाता है।
थिति पाई मन थिर भया, सतगुर करी सहाइ।
अनिन कथा तनि आचरी, हिरदै त्रिभुवन राइ॥29॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर सच्चे गुरु, या आध्यात्मिक शिक्षक के मार्गदर्शन से मन के परिवर्तन और गहन सत्य के रहस्योद्घाटन पर विचार करते हैं। उनका सुझाव है कि गुरु की सहायता से, मन को स्थिरता और स्थिरता मिलती है, जिससे गहरी अंतर्दृष्टि और समझ मिलती है।
इसके बाद कबीर अनकही कहानी के उद्भव का वर्णन करते हैं, जिसका अर्थ है मौखिक अभिव्यक्ति से परे आध्यात्मिक सत्य का रहस्योद्घाटन। यह सत्य हृदय के भीतर रहता है, जो व्यक्ति के सबसे अंतरतम केंद्र का प्रतीक है जहां दिव्य ज्ञान और अनुभूति प्रकट होती है। इस सत्य के प्रकाश का गहरा प्रभाव पड़ता है, इसका प्रभाव तीनों लोकों तक फैल जाता है, जो इसके सार्वभौमिक महत्व को दर्शाता है।
हरि संगति सीतल भया, मिटा मोह की ताप।
निस बासुरि सुख निध्य लह्या, जब अंतरि प्रकट्या आप॥30॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर ईश्वरीय संगति की परिवर्तनकारी शक्ति को दर्शाते हैं। वह शीतलता पाने का वर्णन करता है, जो ईश्वरीय संगति में आंतरिक शांति और शांति का प्रतीक है। यह संगति व्यक्ति को सांसारिक इच्छाओं और विकर्षणों से मुक्त करके, लगाव की जलन को कम करने में मदद करती है।
इसके बाद कबीर रात की ठंडी छाया में शांति पाने के रूपक का उपयोग करते हैं, जो गहरी शांति और संतुष्टि की स्थिति का सुझाव देते हैं जो तब उत्पन्न होती है जब भीतर दिव्य उपस्थिति का एहसास होता है। यह आंतरिक अहसास शांति के खजाने की खोज की ओर ले जाता है, जो उस गहन आध्यात्मिक संतुष्टि को दर्शाता है जो सीधे ईश्वर का अनुभव करने से आती है।
तन भीतरि मन मानियाँ, बाहरि कहा न जाइ।
ज्वाला तै फिरि जल भया, बुझी बलंती लाइ॥31॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर शरीर के भीतर मन के आंतरिक समर्पण को दर्शाते हैं, आंतरिक सद्भाव और एकीकरण की स्थिति का सुझाव देते हैं। उनका तात्पर्य यह है कि जब मन पूरी तरह से समर्पित हो जाता है और शरीर के भीतर लीन हो जाता है, तो यह बाहरी अभिव्यक्ति या विवरण से परे हो जाता है।
इसके बाद कबीर उस आग के रूपक का उपयोग करते हैं जो एक बार भयंकर रूप से जलती थी लेकिन अब बुझ गई है और अवशोषित हो गई है। यह रूपक आंतरिक उथल-पुथल और उत्तेजना को शांति और शांति की स्थिति में बदलने का प्रतिनिधित्व करता है। इच्छाओं, आसक्तियों और अहंकार की आग को आंतरिक समर्पण और अवशोषण के माध्यम से बुझा दिया गया है, जिससे आंतरिक शांति और शांति की अनुभूति हुई है।
तत पाया तन बीसर्या, जब मुनि धरिया ध्यान।
तपनि गई सीतल भया, जब सुनि किया असनान॥32॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर ध्यान और वैराग्य की परिवर्तनकारी शक्ति को दर्शाते हैं। उनका सुझाव है कि अस्तित्व के सार का सच्चा अहसास तब प्राप्त होता है जब अभ्यासकर्ता भौतिक शरीर को भूल जाता है और ध्यान में लीन हो जाता है। जब भिक्षु ध्यान पर गहराई से ध्यान केंद्रित करता है, तो शरीर और उसकी चिंताएँ पृष्ठभूमि में फीकी पड़ जाती हैं, जिससे आध्यात्मिक अनुभूति का सार उभर कर सामने आता है।
फिर कबीर वैराग्य के प्रभाव को दर्शाने के लिए जलन और शीतलता के रूपक का उपयोग करते हैं। जलना सांसारिक इच्छाओं और चिंताओं के प्रति लगाव के कारण होने वाली उत्तेजना और पीड़ा को दर्शाता है। हालाँकि, वैराग्य को समझने और अभ्यास करने पर, यह जलन समाप्त हो जाती है, और शीतलता और शांति की भावना इसकी जगह ले लेती है। सांसारिक मोह-माया और इच्छाओं से वैराग्य से आंतरिक शांति मिलती है और कष्टों से मुक्ति मिलती है।
जिनि पाया तिनि सू गह्या गया, रसनाँ लागी स्वादि।
रतन निराला पाईया, जगत ढंढाल्या बादि॥33॥
अर्थ – इस दोहे में कबीर आध्यात्मिक अनुभूति के गहन अनुभव को दर्शाते हैं। उनका सुझाव है कि जो लोग इस अनुभूति को प्राप्त कर लेते हैं वे इसे चुपचाप अपने भीतर ही रखते हैं, इसकी मिठास और गहराई को बाहरी रूप से व्यक्त करने के बजाय आंतरिक रूप से अनुभव करते हैं। इस आंतरिक अनुभव की तुलना किसी स्वादिष्ट चीज़ को चखने से की जाती है, जो गहरी संतुष्टि और तृप्ति को दर्शाता है।
इसके बाद कबीर आध्यात्मिक अनुभूति की दुर्लभता और बहुमूल्यता को दर्शाने के लिए एक अद्वितीय रत्न की खोज के रूपक का उपयोग करते हैं। यह अहसास संसार की क्षणभंगुरता और अनिश्चित प्रकृति से परे है, जो संसार के क्षणभंगुर तरीकों का प्रतीक है। यह एक कालातीत और स्थायी सत्य का प्रतिनिधित्व करता है जो व्यक्ति को जीवन की सांसारिक चिंताओं से ऊपर उठाता है।
कबीर दिल स्याबति भया, पाया फल सम्रथ्थ।
सायर माँहि ढंढोलताँ, हीरै पड़ि गया हथ्थ॥34॥
अर्थ – इस दोहे में कबीर आध्यात्मिक अनुभूति की प्राप्ति पर विचार करते हैं। उनका सुझाव है कि जब हृदय शुद्ध और अशुद्धियों से मुक्त हो जाता है, तो आध्यात्मिक प्राप्ति सहज हो जाती है, जो किसी के प्रयासों का फल आसानी से प्राप्त करने के समान है।
इसके बाद कबीर संसार में जीवन की यात्रा के प्रतीक के रूप में बाज़ार में भटकने के रूपक का उपयोग करते हैं। सांसारिक अस्तित्व की विकर्षणों और चुनौतियों के बावजूद, हीरे द्वारा दर्शाया गया आध्यात्मिक खजाना अनायास ही हाथ में आ जाता है। इससे पता चलता है कि सच्ची आध्यात्मिक अनुभूति बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती है, बल्कि जब हृदय शुद्ध और ग्रहणशील होता है तो स्वतः ही उत्पन्न हो जाता है।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाँहि।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥35॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर स्वयं के भीतर दिव्य उपस्थिति को महसूस करने के परिवर्तनकारी अनुभव को दर्शाते हैं। वह अस्तित्व की दो अवस्थाओं में विरोधाभास करता है: एक जहां वह ईश्वर के बारे में जागरूकता के बिना अस्तित्व में था, और दूसरा जहां ईश्वर उसके भीतर मौजूद है, और उसकी व्यक्तिगत पहचान मिट जाती है।
कबीर अंधेरे से प्रकाश की ओर गहन बदलाव का वर्णन करते हैं जो भीतर दिव्य उपस्थिति को पहचानने पर होता है। अंधकार अज्ञानता और आध्यात्मिक अंधेपन का प्रतीक है, जबकि प्रकाश दिव्य रोशनी और प्राप्ति का प्रतिनिधित्व करता है। इस आंतरिक प्रकाश को देखने पर, सारा अंधकार और अज्ञान दूर हो जाता है, और दिव्य अस्तित्व का सत्य स्पष्ट हो जाता है।
जा कारणि मैं ढूंढता, सनमुख मिलिया आइ।
धन मैली पिव ऊजला, लागि न सकौं पाइ॥36॥
अर्थ – इस दोहे में कबीर अर्थ और पूर्ति की खोज पर विचार करते हैं। वह भौतिक संपदा की अशुद्धता की तुलना परमात्मा के साक्षात्कार की पवित्रता से करता है। कबीर ने अस्तित्व के कारण या उद्देश्य की खोज करते समय सीधे प्रिय या परमात्मा को खोजने का वर्णन किया है। इस मुठभेड़ को दैवीय उपस्थिति के साथ प्रत्यक्ष और अंतरंग मुलाकात के रूप में दर्शाया गया है।
इसके बाद कबीर भौतिक संपदा की, जो स्वाभाविक रूप से अशुद्ध है, परमात्मा की तुलना करते हैं, जो शुद्ध और बेदाग है। उनका सुझाव है कि चाहे कोई भी भौतिक धन प्राप्त करने की कितनी भी कोशिश कर ले, वह कभी भी सच्ची संतुष्टि या संतुष्टि नहीं लाएगा। इसके बजाय, सच्ची संतुष्टि परमात्मा के साक्षात्कार में मिलती है।
जा कारणि मैं जाइ था, सोई पाई ठौर।
सोई फिर आपण भया, जासूँ कहता और॥37॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर स्थिरता या अपनेपन की भावना की तलाश के विचार को दर्शाते हैं। उनका सुझाव है कि जिस स्थान की वह तलाश कर रहे थे, संभवतः बाहरी दुनिया में, वहीं अंततः उन्हें वह स्थिरता मिली जिसकी उन्हें तलाश थी। इस स्थिरता की व्याख्या आंतरिक शांति, संतुष्टि या आध्यात्मिक अनुभूति की भावना के रूप में की जा सकती है।
कबीर फिर इस बात पर जोर देते हैं कि वह स्थान स्वयं उनका हो गया। इससे उस स्थान पर स्वामित्व या संबंध की गहरी भावना का पता चलता है जहां उसे स्थिरता मिली, यह दर्शाता है कि उसे वहां अपनेपन या संतुष्टि की भावना मिली।
कबीर देख्या एक अंग, महिमा कही न जाइ।
तेज पुंज पारस धणों, नैनूँ रहा समाइ॥38॥
अर्थ – इस दोहे में कबीर आध्यात्मिक अनुभूति के गहन अनुभव को दर्शाते हैं। वह एक अंग को देखने का वर्णन करता है, जो एक दिव्य या पारलौकिक इकाई का प्रतीक है। इस अंग की महिमा इतनी अपार है कि इसका पर्याप्त वर्णन या शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता।
कबीर फिर इस दिव्य इकाई की प्रकृति का वर्णन करने के लिए रूपकों का उपयोग करते हैं। वह इसकी तुलना प्रतिभा के सार से करते हुए एक गहन और उज्ज्वल उपस्थिति का सुझाव देते हैं। इसके अतिरिक्त, वह इसकी तुलना एक कसौटी से करता है, जिसमें चीजों की वास्तविक प्रकृति को बदलने या प्रकट करने की शक्ति होती है। अंत में, कबीर वर्णन करते हैं कि कैसे यह दिव्य उपस्थिति उनकी आँखों में विलीन हो जाती है, जिससे मिलन या अहसास का गहरा और अंतरंग आध्यात्मिक अनुभव होता है।
मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं।
मुकताहल मुकता चुगैं, अब उड़ि अनत न जाहिं॥39॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर आध्यात्मिक सत्य को व्यक्त करने के लिए रूपकों का उपयोग करते हैं। मानसरोवर झील हिंदू पौराणिक कथाओं में जल का एक पवित्र भंडार है, जो पवित्रता और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतीक है। हंस, जिसे अक्सर पवित्रता और आध्यात्मिक अनुग्रह के प्रतीक के रूप में चित्रित किया जाता है, इस झील में खेलने के लिए चिल्लाता है, जो साधक की आध्यात्मिक पूर्ति और परमात्मा के साथ मिलन की लालसा का प्रतीक है।
कबीर फिर एक मुक्त पक्षी की बात करते हैं जो मोती चुगता है। यह पक्षी उस प्रबुद्ध आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है जिसने आध्यात्मिक मुक्ति या मोक्ष प्राप्त कर लिया है। भौतिक धन या मोतियों के प्रतीक सांसारिक इच्छाओं से मोहित होने के बजाय, मुक्त आत्मा अपने आध्यात्मिक सार में स्थिर रहती है और इससे दूर नहीं भटकती है।
गगन गरिजि अमृत चवै, कदली कंवल प्रकास।
तहाँ कबीरा बंदिगी, कै कोई निज दास॥40॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर आध्यात्मिक सच्चाइयों को व्यक्त करने के लिए ज्वलंत कल्पना का उपयोग करते हैं। वह आकाश की गड़गड़ाहट का वर्णन करता है, जिसे ब्रह्मांड में गूंजती दिव्य उपस्थिति के रूपक के रूप में समझा जा सकता है। गड़गड़ाहट के साथ जुड़े अमृत के स्वाद का तात्पर्य आध्यात्मिक अनुभूति के आनंद और मिठास से है।
इसके बाद कबीर ने केले के पौधों और कमलों का उल्लेख किया, जो पवित्रता और आध्यात्मिक विकास का प्रतीक हैं। उनकी चमक आत्मज्ञान की चमक और आध्यात्मिक जागृति की सुंदरता का प्रतिनिधित्व करती है।
अंत में, कबीर स्वयं को इस दिव्य उपस्थिति में पूजा करने की बात करते हैं। अपनी श्रद्धा और भक्ति के बावजूद, वह सवाल करते हैं कि क्या वास्तव में ईश्वर की सेवा करने वाला कोई है, जो वास्तविक भक्ति और निस्वार्थ सेवा की दुर्लभता को दर्शाता है।
नींव बिहुणां देहुरा, देह बिहूँणाँ देव।
कबीर तहाँ बिलंबिया करे अलप की सेव॥41॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर भौतिक शरीर की क्षणिक प्रकृति और भौतिक अस्तित्व की नश्वरता को व्यक्त करने के लिए रूपक भाषा का प्रयोग करते हैं। इमारत की नींव की तुलना रेत से करने से शरीर की नाजुकता और अस्थायी प्रकृति का पता चलता है। जिस प्रकार रेत पर बनी संरचना अस्थिर और नश्वर होती है, उसी प्रकार अस्तित्व की भव्य योजना में शरीर भी अस्थिर है।
फिर कबीर इस अस्थायी निवास में थोड़ी सेवा करने का सुझाव देते हैं। इसकी व्याख्या जीवन और भौतिक शरीर की क्षणिक प्रकृति के बावजूद, किसी के जीवनकाल के दौरान दया, करुणा और निस्वार्थता के कार्यों में संलग्न होने के रूप में की जा सकती है। कबीर वर्तमान क्षण का अधिकतम लाभ उठाने और पृथ्वी पर अपने समय का उपयोग दूसरों की सेवा करने और भौतिक क्षेत्र से परे गुणों को विकसित करने की वकालत करते हैं।
देवल माँहै देहुरी, तिल जेहैं बिसतार।
माँहैं पाती माँहिं जल, माँहे पुजणहार॥42॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर मानव शरीर और उसके आध्यात्मिक महत्व का वर्णन करने के लिए रूपक भाषा का उपयोग करते हैं। उन्होंने आध्यात्मिक यात्रा में इसकी पवित्रता और महत्व पर जोर देते हुए शरीर की तुलना एक मंदिर से की है। जिस प्रकार एक मंदिर पूजा और श्रद्धा का स्थान है, उसी प्रकार मानव शरीर भी आध्यात्मिक अनुभव और अनुभूति का एक पात्र है।
कबीर ने चारों ओर बिखरे तिलों का उल्लेख किया है, जो शरीर को घेरने वाले सांसारिक मोह-माया और विकर्षणों की अनित्य और क्षणिक प्रकृति का प्रतीक हो सकते हैं। इन विकर्षणों के बावजूद, कबीर हमें शरीर के भीतर की पवित्रता की याद दिलाते हैं।
वह आगे इस बात पर जोर देते हैं कि शरीर के भीतर पत्तियां और पानी हैं, जो आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक पवित्रता और जीविका के तत्वों का प्रतीक हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त, कबीर का दावा है कि जिसकी पूजा की जानी चाहिए, या परमात्मा, वह शरीर के भीतर ही रहता है। यह इस विचार को उजागर करता है कि पूजा और श्रद्धा का असली उद्देश्य बाहरी नहीं है बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर रहता है।
कबीर कवल प्रकासिया, ऊग्या निर्मल सूर।
निस अँधियारी मिटि गई, बाजै अनहद तूर॥43॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर परमात्मा की उज्ज्वल प्रकृति और उसकी परिवर्तनकारी शक्ति का जश्न मनाते हैं। उनका दावा है कि केवल परमात्मा के पास ही सच्ची चमक है, और इसकी तुलना उन्होंने शुद्ध और उज्ज्वल सूर्य से की है। यह कल्पना दिव्य उपस्थिति की प्रतिभा और स्पष्टता का सुझाव देती है, जो अज्ञान और झूठ के अंधेरे को उजागर करती है।
कबीर फिर घोषणा करते हैं कि परमात्मा की उपस्थिति में सारा अंधकार गायब हो गया है। यह आध्यात्मिक अज्ञान को दूर करने और सत्य और ज्ञान की प्राप्ति का प्रतीक है। अंधेरे के गायब होने के साथ, कबीर ने अप्रकाशित राग की गूंज का वर्णन किया है, जो अस्तित्व में व्याप्त सद्भाव और दिव्य प्रतिध्वनि का प्रतीक है।
अनहद बाजै नीझर झरै, उपजै ब्रह्म गियान।
अविगति अंतरि प्रगटै, लागै प्रेम धियान॥44॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर आध्यात्मिक ज्ञान और दिव्य प्राप्ति के विषय का पता लगाना जारी रखते हैं। वह हिंदू और सिख आध्यात्मिकता में शाश्वत और अनुपचारित ध्वनि कंपन, अनाहद नाद का जिक्र करते हुए, बिना रुके ध्वनि का वर्णन करके शुरुआत करते हैं। इस ध्वनि को सृष्टि में अंतर्निहित ब्रह्मांडीय कंपन माना जाता है और अक्सर इसे दिव्य प्रतिध्वनि और ज्ञानोदय से जोड़ा जाता है।
इसके बाद कबीर दिव्य ज्ञान के प्रवाह की बात करते हैं और इसकी तुलना उस धारा से करते हैं जो निरंतर बहती रहती है और साधक की आत्मा को पोषण देती है। यह दिव्य ज्ञान परिवर्तनकारी है और आध्यात्मिक जागृति और ज्ञानोदय की ओर ले जाता है।
दोहे के अगले भाग में, कबीर हृदय के गुप्त कक्ष में आत्मज्ञान की अभिव्यक्ति का उल्लेख करते हैं, जो किसी के अस्तित्व की अंतरतम गहराई का सुझाव देता है जहां आध्यात्मिक अनुभूति होती है। यहां, आत्मज्ञान स्पष्ट हो जाता है, जो साधक की चेतना को दिव्य समझ और अंतर्दृष्टि से प्रकाशित करता है।
आकासै मुखि औंधा कुवाँ, पाताले पनिहारि।
ताका पाँणीं को हंसा पीवै, बिरला आदि बिचारि॥45॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर गहन आध्यात्मिक सच्चाइयों को व्यक्त करने के लिए रूपक भाषा का प्रयोग करते हैं। अंधा कौआ अज्ञानता और भौतिकता के प्रति लगाव का प्रतीक है, क्योंकि यह आकाश से पीता है, जो दुनिया के बाहरी, क्षणिक पहलुओं का प्रतिनिधित्व करता है। इसके विपरीत, हंस, जो अक्सर शुद्धता और आध्यात्मिक अनुग्रह से जुड़ा होता है, अंडरवर्ल्ड के अमृत जल से पीता है, जो आध्यात्मिक सार और आंतरिक अहसास की खोज का प्रतीक है।
कबीर ने एक अलंकारिक प्रश्न उठाया: हंस किसका पानी पीता है? यहां, वह सच्चे आध्यात्मिक पोषण के स्रोत पर चिंतन को आमंत्रित करता है। जहां अंधा कौआ सांसारिक कार्यों में उलझा रहता है, वहीं हंस दिव्य तत्व की तलाश में रहता है। हालाँकि, कबीर सुझाव देते हैं कि लोग शायद ही कभी अपने आध्यात्मिक भरण-पोषण के मूल या स्रोत पर विचार करते हैं। प्रतिबिंब की यह कमी व्यक्तियों को अस्तित्व की वास्तविक प्रकृति और परमात्मा के साथ उनके संबंध को समझने से रोकती है।
सिव सकती दिसि कौंण जु जोवै, पछिम दिस उठै धूरि।
जल मैं स्यंघ जु घर करै, मछली चढ़ै खजूरि॥46॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर गहरी आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि व्यक्त करने के लिए रूपक भाषा का उपयोग करते हैं। शिव दिव्य मर्दाना सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि शक्ति दिव्य स्त्री सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करती है। कबीर पूछते हैं कि इन दो ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं के मिलन को कौन समझ सकता है। यह मिलन ब्रह्मांड के भीतर विरोधाभासों के सामंजस्य और संतुलन का प्रतीक है, जिसमें मर्दाना और स्त्रीत्व, सक्रिय और निष्क्रिय, या भौतिक और आध्यात्मिक पहलू शामिल हैं।
इसके बाद कबीर पश्चिम दिशा में धूल के उड़ने का उल्लेख करते हैं, जिसे रूपक के रूप में भौतिक संसार के विकर्षणों और भ्रमों के रूप में समझा जा सकता है जो आध्यात्मिक धारणा में बाधा डालते हैं। आध्यात्मिक प्रतीकवाद में पश्चिमी दिशा को अक्सर अंधकार या अज्ञान से जोड़ा जाता है।
अमृत बरसै हीरा निपजै, घंटा पड़ै टकसाल।
कबीर जुलाहा भया पारषू, अगभै उतर्या पार॥47॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर आध्यात्मिक सत्य को व्यक्त करने के लिए रूपकों का उपयोग करते हैं। अमृत की वर्षा और हीरे बिखरने की कल्पना प्रचुरता और आध्यात्मिक संपदा का संकेत देती है। हथौड़े से निहाई का बजना आध्यात्मिक अभ्यास की परिवर्तनकारी प्रक्रिया का प्रतीक है, जहां कच्चे माल को प्रयास और अनुशासन के माध्यम से आकार और परिष्कृत किया जाता है।
इसके बाद कबीर ने लाक्षणिक रूप से खुद को एक जुलाहा बताया। बुनाई का कार्य आध्यात्मिक परिवर्तन की प्रक्रिया का प्रतीक है, जहां अनुभव और समझ के अलग-अलग धागों को एक साथ जोड़कर एक एकीकृत संपूर्णता का निर्माण किया जाता है। जिस प्रकार एक बुनकर कच्चे कपड़े को बढ़िया कपड़े में बदल देता है, उसी प्रकार कबीर का सुझाव है कि अपनी साधना और अंतर्दृष्टि के माध्यम से, उसने अपना अस्तित्व बदल लिया है।
ममिता मेरा क्या करै, प्रेम उघाड़ी पौलि।
दरसन भया दयाल का, सूल भई सुख सौड़ि॥48॥
अर्थ – इस दोहे में, कबीर गहरी आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि व्यक्त करने के लिए मधुमक्खी और सुई के रूपक का उपयोग करते हैं। मधुमक्खी को अक्सर गुरु या प्रिय का प्रतिनिधित्व करने के लिए रूपक के रूप में उपयोग किया जाता है, जबकि सुई साधक या शिष्य का प्रतिनिधित्व करती है।
कबीर मधुमक्खी (गुरु या प्रिय) द्वारा उसे पहुंचाए जाने वाले किसी भी नुकसान की महत्वहीनता पर विचार करते हैं। इसके बजाय, वह प्रिय की उपस्थिति के माध्यम से प्रेम और दिव्य कृपा की रिहाई का अनुभव करता है। मधुमक्खी का प्रतीक यह प्रेम कबीर के हृदय को भर देता है और उन्हें सुई में धागा डालने जैसे अपने कर्तव्य निभाने में सक्षम बनाता है।
इसके अलावा, कबीर ईश्वरीय कृपा की परिवर्तनकारी शक्ति का वर्णन करते हैं। दयालु (प्रिय) के दर्शन या दर्शन से, कबीर के हृदय की सुई पिन की तरह हो जाती है, जो छोटी या महत्वहीन होने की स्थिति का प्रतीक है। विनम्रता और समर्पण की इस स्थिति में, कबीर को सच्चा आनंद और संतुष्टि मिलती है।
साखी – रस कौ अंग
कबीर हरि रस यौं पिया बाकी रही न थाकि।
पाका कलस कुँभार का, बहुरि न चढ़हिं चाकि॥1॥
अर्थ- जिस प्रकार कुम्हार द्वारा पकाए हुए घड़े को दोबारा चाक पर नहीं चढ़ाया जा सकता, उसी प्रकार जिस व्यक्ति ने हरि (ईश्वर) के प्रेमरस का अनुभव कर लिया हो, उसके मन में संसार के प्रति कोई और आसक्ति शेष नहीं रहती। वह व्यक्ति पूरी तरह से परमात्मा के प्रेम में तृप्त हो जाता है, और उसे फिर से सांसारिक जीवन के चक्र में नहीं डाला जा सकता
राम रसाइन प्रेम रस पीवत, अधिक रसाल।
कबीर पीवण दुलभ है, माँगै सीस कलाल॥2॥
अर्थ- राम के प्रेम और भक्ति का रस पीने वाला व्यक्ति सच्चे आनंद की अनुभूति करता है, क्योंकि यह प्रेम रस अत्यधिक मधुर और संतोषजनक होता है। लेकिन कबीर कहते हैं कि इस प्रेम रस को पीना बहुत कठिन है, क्योंकि इसे पाने के लिए व्यक्ति को अपने अहंकार और स्वाभिमान को पूरी तरह से त्यागना पड़ता है। यहाँ “माँगै सीस कलाल” का अर्थ है कि इस प्रेम को पाने के लिए अपने सिर को, यानी अपने अहंकार को, समर्पित करना पड़ता है। यह एक ऐसी साधना है जिसे साधारण व्यक्ति के लिए प्राप्त करना बहुत कठिन है।
कबीर भाठी कलाल की, बहुतक बैठे आइ।
सिर सौंपे सोई पिवै, नहीं तो पिया न जाइ॥3॥
अर्थ- कबीर कहते हैं कि कलाल (शराब बेचने वाला) की भट्ठी पर बहुत से लोग आते हैं, लेकिन उनमें से केवल वही लोग असली शराब (प्रेम और भक्ति का रस) पी सकते हैं जो अपना सिर (अहंकार) समर्पित करते हैं। अर्थात्, भक्ति और प्रेम का असली आनंद केवल उन्हीं को मिल सकता है जो अपने अहंकार को पूरी तरह त्याग देते हैं। जो लोग अपने अहंकार को नहीं छोड़ सकते, वे इस रस का आनंद नहीं ले सकते।
यह दोहा बताता है कि भक्ति और प्रेम का मार्ग कठिन है, और इस मार्ग पर चलने के लिए व्यक्ति को अपने अहंकार और स्वार्थ को त्यागना पड़ता है।
हरि रस पीया जाँणिये, जे कबहूँ न जाइ खुमार।
मैंमंता घूँमत रहै, नाँही तन की सार॥4॥
अर्थ- कबीर कहते हैं कि हरि का प्रेमरस (ईश्वर की भक्ति का आनंद) ऐसा है कि जिसे एक बार पीने के बाद उसका खुमार (नशा) कभी नहीं उतरता। जो भी इस रस का अनुभव करता है, वह जीवन भर उस प्रेम में डूबा रहता है। उसका मन हर समय भगवान के प्रेम में खोया रहता है और उसे शरीर या सांसारिक बातों की कोई परवाह नहीं रहती। वह हमेशा उस दिव्य आनंद में मग्न रहता है, मानो उसने खुद को पूरी तरह से ईश्वर को समर्पित कर दिया हो।
मैंमंता तिण नां चरै, सालै चिता सनेह।
बारि जु बाँध्या प्रेम कै, डारि रह्या सिरि षेह॥5॥
ममता (अहंकार) उस घास की तरह है, जिसे प्रेम की चिता की अग्नि जलाकर समाप्त कर देती है। जब कोई व्यक्ति प्रेम और भक्ति के जल में डूब जाता है, तो उसका अहंकार नष्ट हो जाता है।
अर्थ- कबीर आगे कहते हैं कि जैसे पानी को एक बाँध के द्वारा रोका जाता है, वैसे ही प्रेम का बांध भी व्यक्ति के जीवन में बनता है। इस प्रेम के बांध के कारण व्यक्ति का अहंकार नियंत्रित हो जाता है, और वह भगवान के प्रेम में पूरी तरह समर्पित हो जाता है। “डारि रह्या सिरि षेह” का अर्थ है कि प्रेम और भक्ति के सामने सिर झुक जाता है, यानी व्यक्ति का अहंकार समाप्त हो जाता है।
मैंमंता अविगत रहा, अकलप आसा जीति।
राम अमलि माता रहै, जीवन मुकति अतीकि॥6॥
जब कोई व्यक्ति “ममता” (अहंकार) को पूरी तरह से जीत लेता है और “अविगत” (जिसे समझा न जा सके) अवस्था में पहुँच जाता है, तब वह “अकलप” (कल्पनाओं) और “आसा” (इच्छाओं) से भी मुक्त हो जाता है।
अर्थ- इस स्थिति में व्यक्ति राम के प्रेम में इस तरह डूबा रहता है जैसे कोई अमल (अफीम) खाकर मस्त हो गया हो। ऐसे व्यक्ति के लिए यह जीवन ही मुक्ति का साधन बन जाता है। “जीवन मुकति अतीकि” का अर्थ है कि इस अवस्था में रहते हुए व्यक्ति जीवन में ही मुक्ति का अनुभव कर लेता है। वह सांसारिक मोह-माया और बंधनों से पूरी तरह मुक्त हो जाता है और भगवान के प्रेम में तल्लीन होकर जीता है।
जिहि सर घड़ा न डूबता, अब मैं गल मलि न्हाइ।
देवल बूड़ा कलस सूँ, पंषि तिसाई जाइ॥7॥
अर्थ- कबीर कहते हैं कि जिस सरोवर (पानी के स्रोत) में घड़ा नहीं डूबता, अब मैं उसमें गलकर (संपूर्ण आत्मसमर्पण से) मल-मल कर नहा रहा हूँ। इसका तात्पर्य यह है कि मैं अब उस दिव्य प्रेम और भक्ति में खुद को पूरी तरह समर्पित कर चुका हूँ, जिसमें मेरा अहंकार (घड़ा) डूब नहीं पाता।
आगे कबीर कहते हैं कि देवता (जो कि स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं) भी घड़े (अहंकार) के कारण डूब गए, जबकि साधारण पक्षी (जो कि ईश्वर के प्रति सरल और सच्चे हैं) आसानी से उस सरोवर को पार कर गए। यह दर्शाता है कि जिन लोगों में अहंकार होता है, वे ईश्वर के सच्चे ज्ञान और भक्ति तक नहीं पहुँच पाते, जबकि सरल, विनम्र और सच्चे भक्त ईश्वर तक आसानी से पहुँच जाते हैं।
सबै रसाइण मैं किया, हरि सा और न कोइ।
तिल इक घट मैं संचरे, तौ सब तन कंचन होइ॥8
अर्थ- कबीर कहते हैं कि मैंने संसार के सभी प्रकार के रसों (आनंदों) का अनुभव किया है, लेकिन हरि (ईश्वर) जैसा कोई और नहीं है। ईश्वर का प्रेम और भक्ति सबसे ऊपर और श्रेष्ठ है।
फिर कबीर एक गहरे आध्यात्मिक सत्य को प्रकट करते हैं: अगर ईश्वर का प्रेम और भक्ति, जो तिल के बराबर भी है, एक बार हमारे हृदय में समा जाए, तो पूरा शरीर और जीवन कंचन (सोने) जैसा मूल्यवान और पवित्र हो जाता है।
इसका मतलब है कि ईश्वर का प्रेम और भक्ति व्यक्ति के जीवन को पूरी तरह से बदल देती है। यहाँ “तिल इक घट मैं संचरे” का मतलब है कि अगर थोड़ा सा भी ईश्वर का प्रेम हमारे हृदय में आ जाता है, तो “सब तन कंचन होइ” यानी पूरा जीवन दिव्यता और पवित्रता से भर जाता है।
साखी – जर्णा कौ अंग
भारी कहौं त बहु डरौ, हलका कहूँ तो झूठ।
मैं का जाँणौं राम कूं, नैनूं कबहुं न दीठ॥1॥
अर्थ- कबीर कहते हैं कि अगर मैं राम (ईश्वर) की महिमा को बड़ा बताता हूँ, तो मुझे डर लगता है, क्योंकि मैं उसे पूरी तरह समझ नहीं सकता। और अगर मैं राम को हल्का (छोटा) कहूँ, तो यह झूठ होगा, क्योंकि राम का वास्तविक स्वरूप इतना महान है कि उसे कोई सीमित नहीं कर सकता।
कबीर आगे कहते हैं, “मैं क्या जानूं राम को, मैंने उन्हें कभी देखा ही नहीं।” इसका अर्थ है कि कबीर अपनी सीमित समझ और दृष्टि को स्वीकार करते हैं और यह भी मानते हैं कि ईश्वर की महिमा असीमित और अवर्णनीय है
दीठा है तो कस कहूँ, कह्या न को पतियाइ।
हरि जैसा है तैसा रहौ, तूं हरिषि हरिषि गुण गाइ॥2॥
अर्थ- कबीर कहते हैं कि अगर मैंने (ईश्वर को) देखा है, तो मैं कैसे बताऊँ (उसका वर्णन कैसे करूँ)? और अगर मैं कहता भी हूँ, तो कोई उस पर विश्वास नहीं करेगा, क्योंकि ईश्वर का स्वरूप ऐसा है जिसे समझ पाना या व्यक्त करना कठिन है।
कबीर आगे कहते हैं कि ईश्वर जैसा है, उसे वैसा ही रहने दो। तुम बस उसकी भक्ति में मग्न रहो और हर समय उसके गुण गाते रहो। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर को उसकी महिमा में स्वीकार करो, उसे समझने या सीमित करने की कोशिश न करो, बल्कि उसकी महिमा का गान करते हुए उसकी भक्ति में लीन हो जाओ।
ऐसा अद्भूत जिनि कथै, अद्भुत राखि लुकाइ
बेद कुरानों गमि नहीं, कह्याँ न को पतियाइ॥3॥
अर्थ- कबीर कहते हैं कि जो ईश्वर है, उसकी अद्भुतता को कोई भी वर्णन पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर सकता। ईश्वर की महिमा और उसकी असामान्यता इतनी गहरी और अतिरेक है कि इसे शब्दों या धार्मिक ग्रंथों में पूरी तरह से व्यक्त नहीं किया जा सकता।
“ऐसा अद्भूत जिनि कथै” का मतलब है कि जो ईश्वर की अद्वितीयता और चमत्कार का वर्णन करता है, वह स्वयं भी अद्भुत है। “अद्भुत राखि लुकाइ” का अर्थ है कि ईश्वर की असली अद्वितीयता और चमत्कार इतनी रहस्यमय हैं कि वे छुपी हुई हैं, और इनका सही अर्थ किसी भी धर्मग्रंथ (बेद, कुरान) में पूरी तरह से नहीं मिल सकता।
करता की गति अगम है, तूँ चलि अपणैं उनमान।
धीरैं धीरैं पाव दे, पहुँचैगे परवान॥4॥
अर्थ – कबीर कहते हैं कि ईश्वर की गति (स्वरूप और प्रकृति) और उसकी कृपा को पूरी तरह से समझना या पकड़ना बहुत कठिन है, क्योंकि यह अगम (अदृश्य और अज्ञेय) है।
इसलिए, तुम अपनी आत्मिक यात्रा में धैर्य बनाए रखो और धीरे-धीरे ईश्वर की कृपा और मार्गदर्शन प्राप्त करने का प्रयास करो।
“धीरैं धीरैं पाव दे” का मतलब है कि धैर्यपूर्वक और स्थिर मन से चलो, तो तुम्हें ईश्वर की कृपा और मार्गदर्शन प्राप्त होगा, और अंततः तुम्हारी आत्मा ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को समझ पाएगी और मुक्ति की ओर पहुँचेगी।
पहुँचैगे तब कहैंगे, अमड़ैगे उस ठाँइ।
अजहूँ बेरा समंद मैं, बोलि बिगूचै काँइ॥5॥
अर्थ –कबीर कहते हैं कि जब तुम अंततः ईश्वर की दिव्यता और आत्मज्ञान की स्थिति तक पहुँचोगे, तब तुम्हें यह महसूस होगा कि तुम उस अद्वितीय अवस्था या ठिकाने पर पहुँच चुके हो। लेकिन अभी तुम्हें उस स्थिति तक पहुँचने में समय लगेगा।
अभी भी, तुम समुद्र के मध्य में हो, जहाँ कई मुश्किलें और विघ्न हैं। “बोलि बिगूचै काँइ” का मतलब है कि तुम अभी भी शोर और अस्थिरता के बीच में हो, और तुम्हें उस गंतव्य को स्पष्ट रूप से देखने या समझने में कठिनाई हो रही है।
साखी – लै कौ अंग
जिहि बन सोह न संचरै, पंषि उड़ै नहिं जाइ।
रैनि दिवस का गमि नहीं, तहां कबीर रह्या ल्यो आइ॥1॥
अर्थ –कबीर कहते हैं कि जिस स्थान या स्थिति में सही समझ और ज्ञान नहीं होता, वहाँ पर एक भी कौआ (पंक्षी) नहीं उड़ सकता। यह दर्शाता है कि आध्यात्मिक ज्ञान और सत्य की प्राप्ति कठिन है और उस स्थान पर पहुँचने के लिए गहरी साधना और समझ की आवश्यकता है।
“रैनि दिवस का गमि नहीं” का अर्थ है कि वहाँ पर न तो दिन और न ही रात की कोई पहचान होती है, अर्थात् वहाँ की स्थिति समय और सामान्य जीवन के भेदभाव से परे होती है।
सुरति ढीकुली ले जल्यो, मन नित ढोलन हार।
कँवल कुवाँ मैं प्रेम रस, पीवै बारंबार॥2॥
अर्थ –कबीर कहते हैं कि अगर आत्मा (सुरति) को सही मार्ग पर ले जाया जाए (जैसे ढीकुली द्वारा जलाया जाए), तो मन हर समय एक ऊँचाई और नवीनीकरण की ओर बढ़ता है।
“मन नित ढोलन हार” का मतलब है कि मन हर समय बदलता और गतिशील होता है, लेकिन जब आत्मा सही मार्ग पर होती है, तो वह स्थिरता प्राप्त कर सकती है।
फिर कबीर ने कहा है कि जैसे कमल (कँवल) के कुएँ में (जो एक पवित्र स्थान है) प्रेम का रस भरा हुआ होता है, वैसा ही प्रेम का रस हमेशा पीते रहना चाहिए। यह रस बारंबार पीने से आत्मा को सच्चे आनंद और दिव्यता की प्राप्ति होती है
गंग जमुन उर अंतरै, सहज सुंनि ल्यौ घाट।
तहाँ कबीरै मठ रच्या, मुनि जन जोवैं बाट॥3॥
अर्थ –कबीर कहते हैं कि गंगा और यमुनाएँ, जो भौतिक नदियाँ हैं, आत्मा के अंतर में भी मौजूद हैं। यहाँ “गंग जमुन उर अंतरै” का मतलब है कि ईश्वर की दिव्यता और भक्ति का अनुभव आत्मा के अंदर भी होता है, जैसे इन नदियों का अस्तित्व भौतिक संसार में है।
“सहज सुंनि ल्यौ घाट” का अर्थ है कि आत्मा को सहज और सरल रूप में घाट (आध्यात्मिक साधना का स्थान) पर लाया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि आत्मा की स्थिति प्राकृतिक और स्वाभाविक रूप से दिव्य हो सकती है, जब इसे सही मार्ग पर ले जाया जाए।
फिर कबीर कहते हैं कि उन्होंने एक मठ (आध्यात्मिक केंद्र) स्थापित किया है, जहाँ मुनि (साधक) और भक्त मार्ग पर चलने आते हैं। “मुनि जन जोवैं बाट” का मतलब है कि लोग इस मठ में आकर सही मार्ग और दिशा को समझते हैं।
साखी – निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग
कबीर प्रीतडी तौ तुझ सौं, बहु गुणियाले कंत।
जे हँसि बोलौं और सौं, तौं नील रँगाउँ दंत॥1॥
अर्थ –कबीर कहते हैं कि मेरी सच्ची भक्ति और प्रेम तो केवल तुझसे (ईश्वर या प्रेमिका) है, जो अत्यंत गुणवान और सुंदर है। “बहु गुणियाले कंत” का अर्थ है कि तुम बहुत सारे गुणों और विशेषताओं से भरे हुए हो।
फिर कबीर यह भी कहते हैं कि अगर मैं तुझसे हँसते हुए और प्रेमपूर्वक बात करूँ, तो मेरी मुस्कान और प्यार की चमक (दांत) नीले रंग में बदल जाएगी। यहाँ “नील रँगाउँ दंत” का मतलब है कि तुम्हारे प्रेम में मग्न होकर, मेरी मुस्कान और प्रेम की अनुभूति इतनी गहन और सुंदर हो जाएगी कि उसकी चमक भी बदल जाएगी।
नैना अंतरि आव तूँ, ज्यूँ हौं नैन झँपेउँ।
नाँ हौं देखौं और कूं, नाँ तुझ देखन देउँ॥2॥
अर्थ –कबीर कहते हैं कि जब तू (ईश्वर) मेरी आँखों के भीतर (आध्यात्मिक दृष्टि से) आता है, तो मैं खुद को भी नहीं देख पाता। जैसे मेरे नेत्र (आँखें) मुझे खुद नहीं देख सकतीं, वैसे ही मैं तुझे देखने के लिए सक्षम नहीं हूँ।
“नाँ हौं देखौं और कूं” का मतलब है कि मैं किसी और को नहीं देख सकता। और “नाँ तुझ देखन देउँ” का अर्थ है कि मैं तुझे देखने की अनुमति भी नहीं दे सकता। इसका तात्पर्य है कि जब ईश्वर की दिव्यता और प्रेम आत्मा में समा जाता है, तो बाहरी दुनिया की कोई चीज़ महत्व नहीं रहती।
मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा।
तेरा तुझको सौंपता, क्या लागै है मेरा॥3॥
अर्थ –कबीर कहते हैं कि मेरा (स्वयं) में कुछ भी नहीं है; जो कुछ भी है, वह सब तेरा (ईश्वर) है। मेरा स्वभाव और अस्तित्व पूरी तरह से तुझसे (ईश्वर से) जुड़ा हुआ है।
“तेरा तुझको सौंपता” का मतलब है कि मैं अपने आप को पूरी तरह से तुझको (ईश्वर को) समर्पित करता हूँ। “क्या लागै है मेरा” का अर्थ है कि जब सब कुछ तेरा है और मैं खुद को तुझको सौंप रहा हूँ, तो मेरे पास कुछ भी नहीं बचता जो मेरा हो।
कबीर रेख स्यंदूर की, काजल दिया न जाइ।
नैनूं रमइया रमि रह्या, दूजा कहाँ समाइ॥4॥
अर्थ – कबीर कहते हैं कि “रेख स्यंदूर की” (सिंदूर की एक रेखा) या “काजल” (सिंदूर या काजल का रंग) वास्तविक भक्ति और प्रेम का वर्णन नहीं कर सकते। इन बाहरी रंगों से ईश्वर की दिव्यता या प्रेम को व्यक्त नहीं किया जा सकता।
“नैनूं रमइया रमि रह्या” का मतलब है कि जब नैन (आँखें) ईश्वर की दिव्यता में पूरी तरह से डूब जाती हैं और उनके प्रेम में रम जाती हैं, तो अन्य किसी चीज़ की कोई अहमियत नहीं रहती। “दूजा कहाँ समाइ” का अर्थ है कि जब आत्मा और नैन ईश्वर के प्रेम में पूरी तरह लीन हो जाते हैं, तो बाहरी दुनिया या अन्य किसी चीज़ के लिए कोई स्थान नहीं बचता।
कबीर सीप समंद की, रटै पियास पियास।
संमदहि तिणका बरि गिणै स्वाँति बूँद की आस॥5॥
अर्थ –कबीर कहते हैं कि सीप (मुट्ठी) समुद्र में एक बूँद की प्यास लिए रहता है। इस प्रकार, सीप बार-बार समुद्र की ओर देखता है, लेकिन उसे एक बूँद भी नहीं मिलती। यहाँ “रटै पियास पियास” का मतलब है कि सीप को समुद्र की बूँद पाने की गहरी प्यास है।
“संमदहि तिणका बरि गिणै स्वाँति बूँद की आस” का अर्थ है कि सीप जैसे प्यासे को एक बूँद का भी इंतजार रहता है। यह दर्शाता है कि सच्चे प्रेम और भक्ति में, व्यक्ति की आत्मा भी उस दिव्य प्रेम की एक बूँद को पाने की लालसा में रहती है।
कबीर सुख कौ जाइ था, आगै आया दुख।
जाहि सुख घरि आपणै हम जाणैं अरु दुख॥6॥
अर्थ –कबीर कहते हैं कि सुख की अवस्था केवल अस्थायी होती है; जब सुख का अनुभव होता है, तब दुख आने की संभावना बनी रहती है। इसका मतलब है कि सुख स्थायी नहीं होता और उसके बाद दुख आ सकता है।
“जाहि सुख घरि अपनै हम जाणैं अरु दुख” का मतलब है कि हम तब ही सुख और दुख को सही मायने में समझ सकते हैं जब दोनों का अनुभव होता है। इसका तात्पर्य है कि केवल सुख या केवल दुख का अनुभव करने से उनकी सच्चाई का पूरा अहसास नहीं होता। दोनों के बीच का फर्क तब समझ में आता है जब दोनों का अनुभव एक साथ होता है।
दो जग तो हम अंगिया, यहु डर नाहीं मुझ।
भिस्त न मेरे चाहिये, बाझ पियारे तुझ॥7॥
अर्थ –कबीर कहते हैं कि मैं इस जीवन (या जगत) और अगले जीवन (या दूसरी दुनिया) को पूरी तरह से तुच्छ मानता हूँ। इसका अर्थ है कि मुझे इन दोनों दुनियाओं में कोई विशेष रुचि या चिंता नहीं है।
“यहु डर नाहीं मुझ” का मतलब है कि मुझे इन दुनियाओं के डर या चिंताओं से कोई परवाह नहीं है।
“भिस्त न मेरे चाहिये, बाझ पियारे तुझ” का अर्थ है कि मुझे कोई भी भौतिक या सांसारिक सुख (भिस्त) नहीं चाहिए। मुझे केवल तेरा (ईश्वर या प्रिय) प्रेम और भक्ति चाहिए।
जे वो एकै न जाँणियाँ तो जाँण्याँ सब जाँण।
जो वो एक न जाँणियाँ, तो सबहीं जाँण अजाँण॥8॥
अर्थ –कबीर कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति उस एक (ईश्वर या सच्चे ज्ञान) को नहीं जानता, तो उसने वास्तव में कुछ भी नहीं जाना। इसका मतलब है कि जब तक व्यक्ति सच्चे ईश्वर या सत्य को नहीं जानता, तब तक उसकी सारी जानकारी और ज्ञान अधूरा है।
“जे वो एकै न जाँणियाँ तो जाँण्याँ सब जाँण” का अर्थ है कि अगर कोई व्यक्ति उस एक (ईश्वर) के ज्ञान को प्राप्त नहीं करता, तो वह सब ज्ञान अप्रासंगिक और अधूरा होता है।
कबीर एक न जाँणियाँ, तो बहु जाँण्याँ क्या होइ।
एक तैं सब होत है, सब तैं एक न होइ॥9॥
अर्थ – कबीर कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति उस “एक” (ईश्वर या सच्चा ज्ञान) को नहीं जानता, तो उसके बहुत सारे ज्ञान और समझ का कोई मतलब नहीं होता।
“एक तैं सब होत है, सब तैं एक न होइ” का अर्थ है कि सभी चीज़ें और ज्ञान उस एक ईश्वर या सत्य से उत्पन्न होते हैं। लेकिन सब चीज़ें और ज्ञान मिलकर भी उस “एक” के समान नहीं हो सकते। इसका मतलब है कि सभी भौतिक और सांसारिक ज्ञान और वस्तुएँ उस एक दिव्य सत्य से भिन्न हैं, और उन्हें जानने से उस “एक” का ज्ञान प्राप्त नहीं होता।
जब लगि भगति सकांमता, तब लग निर्फल सेव।
कहै कबीर वै क्यूं मिलैं, निहकामी निज देव॥10॥
अर्थ – कबीर कहते हैं कि जब तक भक्ति और सेवा में सच्ची प्रतिबद्धता और समर्पण नहीं होता, तब तक ये निष्फल (अप्रभावी) होती हैं।
“जब लगि भगति सकांमता, तब लग निर्फल सेव” का मतलब है कि जब तक भक्ति और सेवा में पूरी निष्ठा और समर्पण नहीं है, तब तक वे वास्तव में किसी लाभकारी परिणाम को उत्पन्न नहीं करतीं।
फिर कबीर ने कहा है कि ऐसे भक्त या साधक को मिलना मुश्किल होता है, जो सच्चे और निःस्वार्थ हो। “निहकामी निज देव” का अर्थ है कि सच्चे भक्त वही होते हैं जो बिना किसी व्यक्तिगत लाभ या स्वार्थ के भक्ति करते हैं।
आसा एक जू राम की, दूजी आस निरास।
पाँणी माँहै घर करैं, ते भी मरै पियास॥11॥
इसका अर्थ है कि अगर आपकी एकमात्र आस्था राम (ईश्वर) में है, तो दूसरी सभी आस्थाएँ निरर्थक हैं। जिनका ईश्वर में विश्वास नहीं है, वे संसार के जल में घर बनाते हैं, यानी संसारिकता में लिप्त रहते हैं, लेकिन फिर भी वे तृष्णा से ग्रस्त रहते हैं।
आसा एक ज राम की, दूजी आस निवारी।
आसा फिरि फिर मारसी, ज्यूँ चौपड़ि का सारि॥11॥
इस दोहे का भावार्थ यह है कि अगर आपकी एकमात्र आस्था (आसा) भगवान राम में है और आपने दूसरी सभी इच्छाओं को त्याग दिया है, तो कोई भी सांसारिक या अन्य इच्छा आपको कभी भी परेशान नहीं कर सकेगी। यह आपकी आस्था को डगमगाने वाली नहीं होगी।
आसा एक ज राम की जुग जुग पुरवे आस।
जै पाडल क्यों रे करै, बसैहिं जु चंदन पास॥12॥
इस दोहे का अर्थ है कि जिस व्यक्ति की एकमात्र आस्था राम (ईश्वर) में है, उसकी यह आस्था युगों-युगों तक बनी रहती है और उसे सदा संतोष और शांति मिलती है।
दूसरे भाग में, यह कहा गया है कि जैसे पाडल (एक कांटेदार पौधा) चंदन के पास भी रहने पर उसकी महक या गुण नहीं अपना सकता, वैसे ही जिनके मन में अशुभ इच्छाएँ और बुराइयाँ भरी हों, वे सच्चे आस्तिकों की संगत में भी अच्छे नहीं बन सकते।
जे मन लागै एक सूँ, तो निरबाल्या जाइ।
तूरा दुइ मुखि बाजणाँ न्याइ तमाचे खाइ॥12॥
इस दोहे का अर्थ यह है कि अगर आपका मन एक ही ईश्वर (या एक ही लक्ष्य) पर पूरी तरह से केंद्रित है, तो आप किसी भी स्थिति में कमजोर नहीं पड़ेंगे। आपका संकल्प और ध्यान आपको हर परिस्थिति में मजबूती प्रदान करेगा।
दूसरे भाग में, तूरा (एक प्रकार का बाजा) का उदाहरण देकर यह समझाया गया है कि जैसे दो मुंह वाले तूरा (बाजा) को बजाने पर वह सही ध्वनि नहीं निकालता और असफल रहता है, उसी तरह यदि आपका मन दो अलग-अलग चीजों में बंटा हुआ है, तो आप बार-बार असफल होंगे और लोगों से आलोचना का सामना करेंगे।
कबीर कलिजुग आइ करि, कीये बहुतज मीत।
जिन दिल बँधी एक सूँ, ते सुखु सोवै नचींत॥13॥
इस दोहे का अर्थ है कि कलियुग में लोगों ने कई मित्र बनाए, लेकिन जिनका दिल केवल एक ईश्वर से बंधा है, वे बिना चिंता के सुखपूर्वक सोते हैं। दोहा इस बात पर जोर देता है कि सच्ची शांति और सुख केवल एकनिष्ठ भक्ति में ही मिलती है।
कबीर कुता राम का, मुतिया मेरा नाउँ।
गलै राम की जेवडी, जित खैचे तित जाउँ॥14॥
कबीरदास के इस दोहे का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। इसमें कबीरदास ने स्वयं को भगवान राम का एक समर्पित सेवक बताया है।
दोहा का भावार्थ इस प्रकार है:
कबीर कुता राम का, मुतिया मेरा नाउँ।
कबीर कहते हैं कि मैं भगवान राम का कुत्ता हूँ, और “मुतिया” (मेरा नाम या पहचान) है। यहाँ “कुत्ता” शब्द का प्रयोग अत्यंत विनम्रता और पूर्ण समर्पण के भाव को व्यक्त करने के लिए किया गया है। जैसे कुत्ता अपने मालिक का वफादार होता है, उसी तरह कबीर स्वयं को भगवान राम का पूर्णतः समर्पित और वफादार भक्त मानते हैं।
गलै राम की जेवड़ी, जित खैचे तित जाउँ।
कबीर कहते हैं कि मेरी गर्दन में राम (भगवान) की जेवड़ी (रस्सी या पट्टा) बंधी है, और जिस दिशा में राम मुझे खींचते हैं, मैं उसी दिशा में चला जाता हूँ। इसका अर्थ है कि कबीर ने अपने जीवन को पूरी तरह से भगवान की इच्छा के अनुसार समर्पित कर दिया है। वे ईश्वर की इच्छा के अनुसार अपना जीवन जीते हैं और उनके आदेशों का पालन करते हैं।
कुल मिलाकर, यह दोहा पूर्ण समर्पण, विनम्रता और भगवान के प्रति अनन्य भक्ति का प्रतीक है। कबीरदास इस दोहे के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि सच्चे भक्त को अपने जीवन को भगवान की इच्छा के अनुसार समर्पित कर देना चाहिए।
तो तो करै त बाहुड़ों, दुरि दुरि करै तो जाउँ।
ज्यूँ हरि राखैं त्यूँ रहौं, जो देवै सो खाउँ॥15॥
इस दोहे में कबीरदास जी ने पूर्ण समर्पण और ईश्वर पर विश्वास को व्यक्त किया है। इसका अर्थ है:
**तो तो करै त बाहुड़ों, दुरि दुरि करै तो जाउँ।**
कबीर कहते हैं कि यदि ईश्वर मुझे अपने पास बुलाते हैं, तो मैं दौड़कर उनके पास जाऊँगा। और यदि वे मुझे दूर भेजते हैं, तो मैं भी खुशी-खुशी वहाँ चला जाऊँगा। इसका मतलब है कि ईश्वर के बुलावे या उनकी इच्छा के अनुसार, मैं उनके पास रहूँगा या उनकी आज्ञा का पालन करते हुए जहाँ भी वे भेजेंगे, वहीं जाऊँगा।
**ज्यूँ हरि राखैं त्यूँ रहौं, जो देवै सो खाउँ।**
कबीर कहते हैं कि जैसे ईश्वर मुझे रखते हैं, वैसे ही मैं रहूँगा, और जो कुछ वे मुझे प्रदान करेंगे, उसे ही मैं स्वीकार करूँगा। इसका भाव है कि मैं ईश्वर की इच्छा में पूर्णतः समर्पित हूँ और उनकी इच्छा के अनुसार ही जीवन व्यतीत करूँगा। मुझे जो भी स्थिति या परिस्थिति मिलती है, मैं उसे स्वीकार करता हूँ क्योंकि वह ईश्वर की इच्छा है।
यह दोहा बताता है कि ईश्वर की इच्छा में समर्पण और संतोष रखना ही सच्ची भक्ति है। भक्त को यह मानकर चलना चाहिए कि जो कुछ भी उसे प्राप्त होता है, वह ईश्वर की कृपा और इच्छा से ही मिलता है, और उसमें संतुष्ट रहना चाहिए।
मन प्रतीति न प्रेम रस, नां इस तन मैं ढंग।
क्या जाणौं उस पीव सूं, कैसे रहसी रंग॥16॥
मन प्रतीति न प्रेम रस, नां इस तन मैं ढंग।
कबीर कहते हैं कि मेरे मन में न तो ईश्वर के प्रति सच्चा विश्वास है और न ही प्रेम का रस है, और न ही मेरे शरीर में (भक्ति के लिए) कोई सही तरीका या ढंग है। इसका मतलब यह है कि वे अपने भीतर ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति और प्रेम की कमी महसूस कर रहे हैं। वे यह स्वीकार कर रहे हैं कि उनके मन में वह स्थिरता और प्रेम का भाव नहीं है जो एक सच्चे भक्त में होना चाहिए।
क्या जाणौं उस पीव सूं, कैसे रहसी रंग।
कबीर कहते हैं कि जब मेरे मन में प्रेम और भक्ति का अभाव है, तो मैं कैसे जान पाऊँगा कि उस प्रियतम (ईश्वर) के साथ रहकर कैसा आनंद और रंग (आनंदमयी स्थिति) होगा? यहां वे यह कह रहे हैं कि यदि मैं ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम नहीं रखता, तो मैं उस आनंद का अनुभव कैसे कर सकता हूँ जो एक सच्चे भक्त को प्राप्त होता है।
इस दोहे का भाव यह है कि सच्ची भक्ति और प्रेम के बिना, ईश्वर के साथ सच्चे आनंद का अनुभव संभव नहीं है। कबीरदास जी इस दोहे में आत्मनिरीक्षण कर रहे हैं और इस बात पर ध्यान दिला रहे हैं कि ईश्वर के साथ सच्चा मिलन तभी संभव है जब हमारे मन में सच्ची भक्ति, प्रेम और विश्वास हो।
उस संम्रथ का दास हौं, कदे न होइ अकाज।
पतिब्रता नाँगी रहै, तो उसही पुरिस कौ लाज॥17॥
उस संम्रथ का दास हौं, कदे न होइ अकाज।
कबीर कहते हैं कि मैं उस सर्वशक्तिमान (ईश्वर) का दास हूँ, और उनके दास का कोई काम कभी विफल नहीं होता। “संम्रथ” का मतलब है सर्वशक्तिमान, और “अकाज” का मतलब है ऐसा काम जो असफल हो जाए या जिसमें रुकावट आ जाए। यहाँ कबीर इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि जब कोई व्यक्ति ईश्वर का सच्चा भक्त होता है, तो उसका हर काम सफल होता है, क्योंकि उसे ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।
पतिब्रता नाँगी रहै, तो उसही पुरिस कौ लाज।
दोहा के दूसरे भाग में कबीर एक उदाहरण के रूप में पतिव्रता (सती स्त्री) की बात करते हैं। वे कहते हैं कि यदि पतिव्रता स्त्री बिना वस्त्रों के भी हो, तो भी उसके पति की प्रतिष्ठा और सम्मान सुरक्षित रहता है। इस प्रतीकात्मकता का मतलब यह है कि जैसे एक पतिव्रता स्त्री के बिना वस्त्र के भी उसका पति उसकी लाज (मर्यादा) की रक्षा करता है, वैसे ही एक सच्चे भक्त की रक्षा और सम्मान भी ईश्वर द्वारा ही सुरक्षित रखा जाता है, चाहे वह कैसी भी स्थिति में हो।
धरि परमेसुर पाँहुणाँ, सुणौं सनेही दास।
षट रस भोजन भगति करि, ज्यूँ कदे न छाड़ैपास॥18
धरि परमेसुर पाँहुणाँ, सुणौं सनेही दास।
कबीरदास जी कहते हैं कि मैं परमेश्वर (ईश्वर) को अपने अतिथि के रूप में अपने हृदय में धारण करता हूँ और उनके सच्चे भक्त के रूप में, मैं उनकी सेवा करता हूँ। यहाँ “पाँहुणा” का अर्थ अतिथि या मेहमान है, और “सनेही दास” का अर्थ है प्रेमी भक्त। इसका भाव यह है कि भक्त अपने हृदय में ईश्वर को स्थान देता है और अपनी सच्ची भक्ति से उनकी सेवा करता है।
षट रस भोजन भगति करि, ज्यूँ कदे न छाड़ै पास।
यहाँ कबीर कहते हैं कि जैसे एक व्यक्ति छह प्रकार के स्वादिष्ट भोजन (षट रस) का आनंद लेता है, वैसे ही मैं भक्ति रूपी भोजन का आनंद लेता हूँ। और जिस प्रकार कोई व्यक्ति स्वादिष्ट भोजन को छोड़ना नहीं चाहता, उसी प्रकार मैं अपनी भक्ति को कभी नहीं छोड़ता।
साखी – चितावणी कौ अंग
कबीर नौबति आपणी, दिन दस लेहु बजाइ।
ए पुर पटन ए गली, बहुरि न देखै आइ॥1॥
कबीर कहते हैं कि यह संसार एक नगाड़ा है, जो केवल कुछ समय के लिए ही बजता है। जीवन के दिन गिने-चुने होते हैं, जैसे नगाड़े की ध्वनि कुछ समय तक गूंजती है और फिर समाप्त हो जाती है। जिस गली, जिस रास्ते से हम इस संसार में आते हैं, उसी रास्ते से वापस नहीं लौट सकते। यह जीवन एक बार मिलता है, और जब यह समाप्त होता है, तो हमें इस संसार में लौटने का अवसर नहीं मिलता।
जिनके नौबति बाजती, मैंगल बँधते बारि।
एकै हरि के नाँव बिन, गए जन्म सब हारि॥2॥
कबीर कहते हैं कि जिनके लिए इस संसार में नगाड़े बजते हैं और जिनकी शादियाँ धूमधाम से होती हैं, वे भी इस दुनिया से खाली हाथ ही जाते हैं। यदि उन्होंने अपने जीवन में ईश्वर का नाम नहीं जपा, तो उनके सारे जन्म व्यर्थ हो गए।
ढोल दमामा दड़बड़ी, सहनाई संगि भेरि।
औसर चल्या बजाइ करि, है कोइ राखै फेरि॥3॥
कबीर कहते हैं कि जब ढोल, दमामा, सहनाई, और भेरी (नगाड़ा) जैसे वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं, तो यह केवल एक अवसर (समारोह या उत्सव) के लिए होता है। जब वह अवसर समाप्त हो जाता है, तो इन वाद्ययंत्रों की ध्वनि भी समाप्त हो जाती है। इस जीवन के अवसर को समाप्त होने के बाद कोई इसे फिर से नहीं लौटा सकता।
कबीरदास जी इस दोहे के माध्यम से हमें यह याद दिलाते हैं कि हमें अपने जीवन के समय को व्यर्थ के कार्यों में नष्ट नहीं करना चाहिए। जीवन के अवसर का सदुपयोग करें, क्योंकि जब यह समय बीत जाएगा, तो इसे पुनः प्राप्त करना असंभव है।
सातो सबद जु बाजते, घरि घरि होते राग।
ते मंदिर खाली पड़े, बैसण लागे काग॥4॥
अनुवाद: कबीरदास जी कहते हैं कि जब सातों सुर (सप्तक) घर-घर में बजते हैं और राग-रागिनियाँ गाई जाती हैं, तब भी यदि उस घर के अंदर आत्मिक शांति और भक्ति नहीं है, तो वह मंदिर (हृदय) खाली पड़ा रहता है, और अंततः वहां कौवे (अशुद्ध विचार या नकारात्मकता) निवास करने लगते हैं।
कबीरदास जी का यह दोहा हमें यह संदेश देता है कि वास्तविक साधना और भक्ति बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि हृदय में ईश्वर के प्रति सच्चे प्रेम और समर्पण में निहित है। यदि हृदय (मंदिर) में ईश्वर का वास नहीं है, तो चाहे कितनी भी विधियों से पूजा की जाए, वह निरर्थक ही रहती है।
कबीर थोड़ा जीवणा माड़े बहुत मँडाण।
सबही ऊभा मेल्हि गया, राव रंक सुलितान॥5॥
कबीरदास जी का यह दोहा जीवन की क्षणभंगुरता और मृत्यु की अनिवार्यता पर प्रकाश डालता है। इसमें वे बताते हैं कि जीवन चाहे छोटा हो या बड़ा, अंततः सभी को मृत्यु का सामना करना पड़ता है।
कबीरदास जी का यह दोहा हमें याद दिलाता है कि हमें अपने जीवन के समय को समझदारी से उपयोग करना चाहिए, क्योंकि मृत्यु एक अटल सत्य है जो राजा और रंक, सभी को समान रूप से प्रभावित करती है। हमें जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पहचान कर अपने कर्मों को सही दिशा में लगाना चाहिए।
इक दिन ऐसा होइगा, सब सूँ पड़ै बिछोइ।
राजा राणा छत्रापति, सावधान किन होइ॥6॥
कबीरदास जी के इस दोहे में जीवन की अनिवार्य नश्वरता और मृत्यु की निश्चितता का संदेश दिया गया है। वे इस बात पर जोर देते हैं कि चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली या प्रतिष्ठित क्यों न हो, अंततः मृत्यु सबको एक समान रूप से प्राप्त होती है।
इस दोहे में कबीरदास जी यह बताना चाहते हैं कि संसार में चाहे कोई कितनी भी ऊँची पदवी पर क्यों न हो, चाहे वह राजा हो या साधारण व्यक्ति, सभी को अंततः मृत्यु का सामना करना पड़ेगा। मृत्यु के इस अटल सत्य के सामने कोई भी ताकत, धन, या शक्ति नहीं टिक सकती। इसलिए जीवन में सदैव सचेत और सावधान रहना चाहिए और अपने जीवन को सही दिशा में लगाना चाहिए, क्योंकि यह जीवन अस्थायी है और एक दिन इसे समाप्त होना ही है।
ऊजड़ खेड़ै ठीकरी, घड़ि घड़ि गए कुँभार।
रावण सरीखे चलि गए, लंका के सिकदार॥7॥
कबीरदास जी का यह दोहा जीवन की नश्वरता और संसार की अस्थायित्वता पर गहरी दृष्टि प्रस्तुत करता है। इस दोहे में वे बताते हैं कि चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली या संपन्न क्यों न हो, अंततः सबको मृत्यु का सामना करना पड़ता है और सब कुछ यहीं छोड़कर जाना पड़ता है।
इस दोहे के माध्यम से कबीरदास जी जीवन की अनिश्चितता और नश्वरता का बोध कराते हैं। कुम्हार के द्वारा बनाई गई घड़ों की तुलना मनुष्यों से की गई है, जो समय के चक्र में बार-बार जन्म लेते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते हैं। चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली, धनी, या प्रभावशाली क्यों न हो, जैसे रावण जो लंका का राजा था, उसे भी मृत्यु का सामना करना पड़ा और उसकी सारी संपत्ति और शक्ति यहीं रह गई।
कबीर पटल कारिवाँ, पंच चोर दस द्वार।
जन राँणौं गढ़ भेलिसी, सुमिरि लै करतार॥7॥
कबीर कहा गरबियौ, इस जीवन की आस।
टेसू फूले दिवस चारि, खंखर भये पलास॥8॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि इस जीवन पर घमंड मत करो। जैसे टेसू के फूल चार दिन खिलते हैं और फिर सूखकर गिर जाते हैं, वैसे ही यह जीवन भी क्षणभंगुर है। जीवन की नश्वरता को समझकर विनम्र रहना चाहिए।
कबीर कहा गरबियो, देही देखि सुरंग।
बिछड़ियाँ मिलिनौ नहीं, ज्यूँ काँचली भुवंग॥9॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि अपने शरीर की सुंदरता या ताकत पर घमंड मत करो। यह शरीर तो अस्थायी है, जैसे एक साँप अपनी केंचुली (कंचुली) छोड़ देता है और फिर कभी उस पुरानी केंचुली से नहीं मिलता। इसी तरह, एक बार जब यह शरीर खत्म हो जाएगा, तो फिर से नहीं मिलेगा। इसलिए अहंकार छोड़कर सच्चाई को समझो।
कबीर कहा गरिबियो, ऊँचे देखि अवास।
काल्हि पर्यूँ भ्वै लेटणाँ, ऊपरि जामैं घास॥10॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि ऊंचे मकानों और बड़ी संपत्ति को देखकर गरीबी या छोटी स्थिति पर दुखी मत होओ। क्योंकि एक दिन ऐसा आएगा जब ये बड़े मकान भी मिट्टी में मिल जाएंगे, और उन पर घास उग आएगी। दुनिया की चकाचौंध पर नहीं, बल्कि सच्चे सुख और आत्मिक शांति पर ध्यान देना चाहिए।
कबीर कहा गरबियौ, चाँम लपेटे हड।
हैबर ऊपरि छत्रा सिरि, ते भी देबा खड॥11॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि अपने शरीर (चमड़ी और हड्डियों) पर घमंड मत करो। चाहे सिर पर छत्र (राजसी चिन्ह) हो, फिर भी अंत में सभी को इस शरीर को छोड़कर जाना है। यहां तक कि राजा-महाराजाओं को भी मृत्यु के बाद यही हश्र होता है। इसलिए घमंड छोड़कर जीवन का सच्चा अर्थ समझना चाहिए।
कबीर कहा गरबियो, काल गहै कर केस।
नां जाँणों कहाँ मारिसी, कै घरि कै परदेस॥12॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि अपने जीवन पर घमंड मत करो। जब मृत्यु (काल) तुम्हारे बालों को पकड़ लेगी, तब तुम्हें नहीं पता होगा कि वह तुम्हें कहां मार डालेगी—अपने घर में या परदेस (कहीं दूर)। इसलिए घमंड छोड़कर जीवन को सही ढंग से जीना चाहिए।
यहु ऐसा संसार है जैसा सैबल फूल।
दिन दस के व्योहार को, झूठै रंगि न भूल॥13॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि यह संसार सैबल (रेत में उगने वाला) फूल जैसा है, जो बहुत जल्दी मुरझा जाता है। जीवन कुछ ही दिनों का है, इसलिए इसकी अस्थायी खुशियों के झूठे रंग में मत फंसो। संसार की नश्वरता को समझो और सच्चे मार्ग पर चलो।
मीति बिसारी बाबरे, अचिरज कीया कौन।
तन माटी में मिलि गया, ज्यूँ आटे मैं लूण॥15॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि अगर तुमने अपनी मृत्यु को भुला दिया है, तो इसमें आश्चर्य की बात क्या है? आखिरकार, यह शरीर भी मिट्टी में मिल जाएगा, जैसे आटे में नमक घुल जाता है। इसलिए मृत्यु को याद रखते हुए जीवन को सार्थक बनाओ।
जाँभण मरण बिचारि करि, कूडे काँम निहारि।
जिनि पंथू तुझ चालणां, सोई पंथ सँवारि॥14॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि मरने और जीवन की असलियत को ध्यान में रखकर ही काम करने चाहिए। झूठे और बेकार के कामों में समय बर्बाद मत करो। जिस रास्ते पर तुम्हें अंततः चलना है (अर्थात् मृत्यु के बाद का रास्ता), उसे ही अभी से सुधारो और उस पर चलने की तैयारी करो।
बिन रखवाले बहिरा, चिड़ियैं खाया खेत।
आधा प्रधा ऊबरै, चेति कै तो चेति॥15॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि बिना रखवाले के खेत को पक्षियों ने नष्ट कर दिया। अब जो थोड़ा-बहुत बचा है, उसे ही बचाने की कोशिश करो। इसका मतलब है कि जीवन में अगर पहले से सावधानी नहीं बरती, तो बहुत कुछ खो सकते हो। जो भी बचा है, उसे सही तरीके से संभाल लो और आगे से सावधान रहो।
हाड़ जलै ज्यूँ लाकड़ी, केस जलै ज्यूँ घास।
सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास॥16॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि हड्डियाँ लकड़ी की तरह जलती हैं और बाल घास की तरह जलते हैं। जब शरीर के सभी हिस्से जलते हैं, तो कबीर को बहुत दुख होता है। इसका मतलब है कि शरीर की नश्वरता और उसकी पीड़ा को देखकर कबीर जी उदास हो जाते हैं।
मड़ा जलै लकड़ी जलै, जलै जलावणहार।
कौतिगहारे भी जलैं, कासनि करौ पुकार॥23॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि शव जलता है, लकड़ी जलती है, और आग लगाने वाला भी जलता है। सब कुछ जलने से बचने के लिए, बुद्धिमान व्यक्ति को ध्यान और सत्य की ओर ध्यान देना चाहिए।
कबीर देवल हाड का, मारी तणा बधाँण।
खड हडता पाया नहीं, देवल का रहनाँण॥24॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि यह शरीर (देवल) हड्डियों से बना है, और यह जीवन (बधाँण) को समाप्त करता है। किसी ने भी इसे स्थायी नहीं पाया, इसलिए इसे अधिक महत्व मत दो। इस शरीर की सच्चाई को समझो और सच्चे मार्ग पर चलो।
कबीर मंदिर ढहि पड़ा, सेंट भई सैबार।
कोई मंदिर चिणि गया, मिल्या न दूजी बार॥17॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि मंदिर ढह गया और पत्थर बिखर गए, लेकिन कोई नया मंदिर नहीं मिल पाया। इसका मतलब है कि भौतिक स्थापनाएँ अस्थायी हैं। सच्चा धार्मिक अनुभव और आध्यात्मिकता स्थायी होती है, जो इन्हें ढहने या बदलने से परे होती है।
आजि कि काल्हि कि पचे दिन, जंगल होइगा बास।
ऊपरि ऊपरि फिरहिंगे, ढोर चरंदे घास॥18॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि आज या कल, कुछ ही दिनों में जंगल हो जाएगा। जंगल में केवल ढोर (पशु) घास चरेंगे और कुछ भी खेती या मानव निवास नहीं रहेगा। इसका मतलब है कि प्राकृतिक परिवर्तन और विनाश अवश्यम्भावी हैं। इसलिए, स्थायी चीज़ों की तलाश करनी चाहिए और सच्चे मूल्यों की ओर ध्यान देना चाहिए।
मरहिंगे मरि जाहिंगे, नांव न लेखा कोइ।
ऊजड़ जाइ बसाहिंगे, छाँड़ि बसंती लोइ॥19॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि लोग मरकर चले जाएंगे और उनका नाम भी नहीं रहेगा। उनके घर-बार उजड़ जाएंगे, और बसंती (सुखद) यथार्थ छोड़कर केवल भ्रमितता रह जाएगी। इसका मतलब है कि भौतिक और सांसारिक चीज़ें क्षणभंगुर हैं, और अंत में केवल सच्चे ज्ञान और आत्मा की स्थिरता ही महत्वपूर्ण है।
कबीर खेति किसाण का, भ्रगौ खाया खाड़ि।
खेत बिचारा क्या करे, जो खसम न करई बाड़ि॥20॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि किसान की खेती को एक पक्षी (भ्रगौ) ने खा लिया। खेत की हालत पर ध्यान दो—जो किसान (खसम) अपनी ज़मीन (बाड़ि) की देखभाल नहीं करता, उसका खेत ऐसे ही बर्बाद हो जाता है। इसका मतलब है कि अगर कोई अपनी जिम्मेदारियों की ओर ध्यान नहीं देगा, तो उसकी मेहनत व्यर्थ हो जाएगी।
कबीर देवल ढहि पड़ा, ईंट भई सैवार।
करि चेजारा सौ प्रीतिड़ी, ज्यौं ढहै न दूजी बार॥18॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि मंदिर (देवल) ढह गया और उसकी ईंटें बिखर गईं। लेकिन अगर तुमने सही कर्म और सच्ची भक्ति (चेजारा) की है, तो तुम पक्की मान्यता और सच्चे प्रेम (प्रीतिड़ी) के साथ फिर से नहीं ढहोगे। इसका मतलब है कि सच्ची भक्ति और आस्था स्थायी होती है, जबकि भौतिक संरचनाएँ अस्थायी हैं।
कबीर मंदिर लाष का, जड़िया हीरै लालि।
दिवस चारि का पेषणां, विनस जाइगा काल्हि॥19॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि मंदिर (या शरीर) शव का है और उसकी सुंदरता (हीरै लालि) अस्थायी है। जैसे ही चार दिन बीत जाएंगे, सब कुछ नष्ट हो जाएगा। इसका मतलब है कि भौतिक शरीर या संरचनाएँ अस्थायी हैं और अंततः नष्ट हो जाएंगी। सच्चा ध्यान और आस्था जीवन के अस्थायी रूपों से परे होती है।
कबीर धूलि सकेलि करि, पुड़ी ज बाँधी एह।
दिवस चारि का पेषणाँ, अंति षेह का षेह॥20॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि धूल (या माटी) को गूंथकर एक पुड़ी (रोटी) बनाई गई है। लेकिन चार दिन के भीतर ही वह पुड़ी समाप्त हो जाएगी और केवल धूल रह जाएगी। इसका मतलब है कि भौतिक वस्तुएं और शरीर भी समय के साथ नष्ट हो जाते हैं। अंततः केवल शाश्वत सत्य ही स्थायी रहता है।
कबीर जे धंधै तौ धूलि, बिन धंधे धूलै नहीं।
ते नर बिनठे मूलि, जिनि धंधे मैं ध्याया नहीं॥21॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि जो लोग केवल भौतिक कामकाज (धंधा) में लगे रहते हैं, उनका जीवन धूल में मिल जाता है। बिना किसी सच्चे उद्देश्य (धंधे) के, जीवन केवल धूल की तरह बेकार हो जाता है। जो लोग सच्चे ध्यान और भक्ति (धंधे) की ओर नहीं बढ़ते, वे अपने जीवन का वास्तविक मूल्य नहीं समझ पाते।
कबीर सुपनै रैनि कै, ऊघड़ि आयै नैन।
जीव पड्या बहु लूटि मैं, जागै तो लैण न दैण॥22॥
*टिप्पणी: *ख- बहु भूलि मैं।
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि नींद (सपना) रात को आती है, लेकिन आंखें खुलने पर वह सपने का प्रभाव समाप्त हो जाता है। जैसे नींद के समय में बहुत से सपने देखे जाते हैं, वैसे ही जीवन में कई बार हम खुद को लूटा हुआ महसूस करते हैं। जब जागते हैं, तो उन सपनों की कोई वास्तविकता नहीं रहती और जीवन की सच्चाई हमें समझ में आती है। इसलिए जागने पर सही मार्ग पर चलने की कोशिश करनी चाहिए।
कबीर सुपनै रैनि के, पारस जीय मैं छेक।
जे सोऊँ तो दोइ जणाँ, जे जागूँ तो एक॥23॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि रात के सपनों में, पारस (सप्तगुण) की तरह एक विशेषता होती है। सपनों में दो व्यक्ति (या सपने) होते हैं, लेकिन जागने पर केवल एक ही सत्य रह जाता है। इसका मतलब है कि सपनों और वास्तविकता में अंतर होता है, और केवल जागरूकता ही सच्चे ज्ञान की ओर ले जाती है।
कबीर इहै चितावणी, जिन संसारी जाइ।
जे पहिली सुख भोगिया, तिन का गूड ले खाइ॥30॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि यह चेतावनी है उन लोगों के लिए जो सांसारिक सुखों में लगे रहते हैं। जो पहले सुख भोग चुके हैं, वे अब बुरे परिणामों (गूड) को भुगतेंगे। इसका मतलब है कि जो लोग केवल भौतिक सुखों की ओर ध्यान देते हैं, उन्हें अंत में उसके नकारात्मक परिणामों का सामना करना पड़ता है। इसलिए सच्चे और स्थायी सुख की ओर ध्यान देना चाहिए।
कबीर इस संसार में घणै मनिप मतिहींण।
राम नाम जाँणौं नहीं, आये टापी दीन॥24॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि इस संसार में बहुत से लोग मूर्ख और अज्ञानी हैं। वे राम के नाम की वास्तविकता को नहीं जानते, और केवल ढोंग या दिखावा करते हैं। ऐसा व्यक्ति बहुत ही गरीब और निराश्रित होता है, क्योंकि उसे सच्चे ज्ञान और भक्ति का पता नहीं होता। सच्चा ज्ञान और आस्था ही जीवन को समृद्ध बनाते हैं।
पीपल रूनों फूल बिन, फलबिन रूनी गाइ।
एकाँ एकाँ माणसाँ, टापा दीन्हा आइ॥32॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि पीपल के पेड़ में फूल नहीं होते और फल भी नहीं आते, फिर भी वह अपने तरीके से फलता-फूलता रहता है। इसी तरह, एक-एक व्यक्ति (मनुष्य) अपने जीवन में केवल बाहरी दिखावे की ओर ध्यान देते हैं, जबकि वास्तविकता और सच्चाई से दूर रहते हैं। इस तरह, केवल दिखावा या बाहरी दिखावट का महत्व नहीं है; सच्चे गुण और आस्था महत्वपूर्ण हैं।
कहा कियौ हम आइ करि, कहा करेंगे जाइ।
इत के भए न उत के, चाले मूल गँवाइ॥25॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि जब हमें खुद नहीं पता कि हम कहाँ से आए हैं और कहाँ जाएंगे, तो हमें अपने वर्तमान समय और साधनों की सही पहचान करनी चाहिए। इस भ्रम और अनिश्चितता में, हम अपनी सच्ची दिशा और उद्देश्य (मूल) खो देते हैं। इसका मतलब है कि जीवन के उद्देश्य और सच्चाई को समझना महत्वपूर्ण है, ताकि हम सही मार्ग पर चल सकें।
आया अणआया भया, जे बहुरता संसार।
पड़ा भुलाँवा गफिलाँ, गये कुबंधी हारि॥26॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि इस संसार में आने और जाने का कोई ठिकाना नहीं है। जीवन एक भ्रम और भुलावे से भरा हुआ है, और ऐसे में लोग अपने असली उद्देश्य को खो देते हैं। अंत में, वे जीवन के खेल में हार जाते हैं और बंधन में फंस जाते हैं। इसका मतलब है कि संसार की अस्थिरता और भ्रामकता से बचने के लिए आत्मज्ञान और सच्चे मार्ग पर चलना जरूरी है।
कबीर हरि की भगति बिन, धिगि जीमण संसार।
धूँवाँ केरा धौलहर जात न लागै वार॥27॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि अगर हरि (ईश्वर) की भक्ति के बिना जीवन जीते हैं, तो यह संसार केवल धुएं के समान है, जो अंततः निरर्थक है। जैसे धुएं की ठोसता नहीं होती और वह कहीं भी टिकता नहीं, वैसे ही बिना भक्ति के जीवन भी अर्थहीन और अस्थिर होता है। इसका मतलब है कि सच्ची भक्ति ही जीवन को स्थिर और सार्थक बनाती है।
जिहि हरि की चोरी करि, गये राम गुण भूलि।
ते बिंधना बागुल रचे, रहे अरध मुखि झूलि॥28॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि जो लोग हरि की भक्ति और गुणों को भूलकर केवल सांसारिक सुखों की ओर ध्यान देते हैं, वे अंततः बिंधना (फंसना) के शिकार हो जाते हैं। वे बागुल (बगुल) की तरह रहते हैं, जो केवल पानी के ऊपर झूलते हैं और स्थिरता नहीं प्राप्त करते। इसका मतलब है कि भक्ति और सच्ची आध्यात्मिकता को छोड़कर केवल भौतिकता की ओर ध्यान देना हमें अस्थिरता और बंधनों में डाल देता है।
माटी मलणि कुँभार की, घड़ीं सहै सिरि लात।
इहि औसरि चेत्या नहीं, चूका अबकी घात॥29॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि जैसे एक कुम्हार (माटी का काम करने वाला) की कढ़ाई की मिट्टी और उसका सिर कभी नहीं सहन कर सकते, वैसे ही हमें भी इस जीवन में अपनी सच्चाई और भक्ति की ओर ध्यान देना चाहिए। यदि इस मौके पर हमें चेतना नहीं मिली, तो फिर यह अवसर (औसर) चूक जाएगा और जीवन की चूकी हुई संभावना (घात) कभी भी नहीं लौटेगी। इसका मतलब है कि सच्चे ध्यान और भक्ति का समय खोने पर पछताया जा सकता है, इसलिए इसे सही समय पर अपनाना जरूरी है।
इहि औसरि चेत्या नहीं, पसु ज्यूँ पाली देह।
राम नाम जाण्या नहीं, अति पड़ी मुख षेह्ड्ड30॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि अगर इस जीवन के अवसर (औसर) पर ध्यान नहीं दिया, तो हम पशु की तरह केवल शरीर की देखभाल ही करेंगे। राम के नाम और सच्चे ज्ञान को न समझकर, हम अंत में दुखी और असंतुष्ट रह जाएंगे। इसका मतलब है कि केवल भौतिक जीवन की देखभाल से असली लक्ष्य प्राप्त नहीं होगा। सच्ची भक्ति और आत्मज्ञान की ओर ध्यान देना आवश्यक है।
राम नाम जाण्यो नहीं, लानी मोटी षोड़ि।
काया हाँडी काठ की, ना ऊ चढ़े बहोड़ि॥31॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि यदि तुमने राम के नाम का सही ज्ञान नहीं प्राप्त किया, तो तुमने केवल मोटे और अस्थायी भौतिक सुखों (लानी मोटी) को ही अपनाया है। तुम्हारा शरीर (काया) तो एक काठ की हाँडी की तरह है, जो अधिक समय तक टिकने वाली नहीं है। इसका मतलब है कि भौतिक सुखों और शरीर की अस्थिरता के बजाय, सच्चे ज्ञान और भक्ति को अपनाना चाहिए, जो स्थायी और शाश्वत है।
राम नाम जाण्या नहीं, बात बिनंठी मूलि।
हरत इहाँ ही हारिया, परति पड़ी मुख धूलि॥32॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि यदि किसी ने राम के नाम और भक्ति को नहीं समझा, तो वह जीवन में असली उद्देश्य और मार्ग (बात बिनंठी मूलि) को खो देता है। ऐसा व्यक्ति इस जीवन में असफल रहता है और अंत में केवल धूल और निराशा का सामना करता है। इसका मतलब है कि सच्चे ज्ञान और भक्ति की ओर ध्यान देना आवश्यक है, ताकि जीवन को सही दिशा और उद्देश्य मिल सके।
राम नाम जाण्या नहीं, मेल्या मनहिं बिसारि।
ते नर हाली बादरी, सदा परा पराए बारि॥42॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि जो लोग राम के नाम को नहीं जानते और अपने मन में उस ज्ञान को भुला देते हैं, वे लोग बंजर और सूखे खेत की तरह होते हैं, जिनमें कभी भी कुछ भी अच्छा नहीं उगता। वे सदा परायी चीजों के लिए तरसते रहते हैं और जीवन में सुख और संतोष की कमी महसूस करते हैं। इसका मतलब है कि सच्ची भक्ति और आध्यात्मिकता को अपनाकर ही मन और जीवन में स्थिरता और पूर्णता प्राप्त की जा सकती है।
राम नाम जाण्या नहीं, ता मुखि आनहिं आन।
कै मूसा कै कातरा, खाता गया जनम॥43॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि जो व्यक्ति राम के नाम और भक्ति को नहीं जानता, उसका जीवन व्यर्थ और दुखी होता है। वह केवल बाहरी चीज़ों (अन्य के आन) का पालन करता रहता है, जबकि वास्तविक ज्ञान और सच्चाई से अज्ञानी रहता है। ऐसा व्यक्ति अपने जीवन को मूसा की तरह बर्बाद करता है, जो केवल अपना समय और जीवन निरर्थक कार्यों में व्यतीत करता है। इसका मतलब है कि सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति से ही जीवन में सार्थकता और खुशी प्राप्त की जा सकती है।
राम नाम जाण्यो नहीं हूवा बहुत अकाज।
बूडा लौरे बापुड़ा बड़ा बूटा की लाज॥44॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि अगर किसी ने राम के नाम और भक्ति को नहीं जाना, तो उसका जीवन बेकार हो गया (अकाज)। जैसे एक बूढ़ा और लाचार व्यक्ति अपनी स्थिति को लेकर शर्मिंदा होता है, वैसे ही ऐसा व्यक्ति जीवन की सच्चाई और उद्देश्य को न समझ पाने पर शर्मिंदा और निराश होता है। इसका मतलब है कि सच्चे ज्ञान और भक्ति को अपनाना जीवन को सार्थक और सम्मानजनक बनाता है।
राम नाम जाँण्याँ नहीं, पल्यो कटक कुटुम्ब।
धंधा ही में मरि गया, बाहर हुई न बंब॥33॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि जिसने राम के नाम और भक्ति को नहीं समझा, उसने केवल सांसारिक कुटुम्ब और धंधों में ही अपना जीवन बिता दिया। वह व्यक्ति अपने बाहरी कार्यों में ही मर गया और सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान की ओर ध्यान नहीं दिया। इसका मतलब है कि केवल भौतिक वस्तुओं और सांसारिक संबंधों में उलझे रहने से जीवन की असली सार्थकता और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त नहीं होती।
मनिषा जनम दुर्लभ है, देह न बारम्बार।
तरवर थैं फल झड़ि पड़ा बहुरि न लागै डार॥34॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि मानव जन्म अत्यंत दुर्लभ है और यह शरीर बार-बार नहीं मिलता। जैसे एक पेड़ पर लगे फल झड़ जाते हैं और फिर कभी नहीं लगते, वैसे ही एक बार शरीर का क्षय हो जाने के बाद वह वापस नहीं मिलता। इसलिए इस दुर्लभ मानव जन्म को सही तरीके से उपयोग में लाना चाहिए और सच्ची भक्ति और ज्ञान की ओर ध्यान देना चाहिए।
कबीर हरि की भगति करि, तजि बिषिया रस चोज।
बारबार नहीं पाइए, मनिषा जन्म की मौज॥35॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि हरि की भक्ति करने से और भौतिक सुखों (बिषिया रस) को छोड़ने से ही सच्चा जीवन पाया जा सकता है। मानव जन्म बार-बार नहीं मिलता, इसलिए इसे सच्चे ज्ञान और भक्ति में लगाना चाहिए। इसका मतलब है कि इस जीवन का उपयोग सही दिशा में करना चाहिए क्योंकि यह अत्यंत दुर्लभ है और इसे प्राप्त करना कठिन होता है।
पाणी ज्यौर तालाब का दह दिसी गया बिलाइ।
यह सब योंही जायगा, सकै तो ठाहर लाइ॥48॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि जैसे तालाब में पानी धीरे-धीरे घटता जाता है और बिल्ली उसे देखकर चिंतित होती है, वैसे ही यह जीवन भी निरंतर बदलता और समाप्त होता रहता है। सब कुछ समय के साथ समाप्त हो जाएगा। इसलिए, अगर कोई स्थिरता और सच्चाई चाहती है, तो उसे इसे पकड़ने और बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए। इसका मतलब है कि जीवन की अस्थिरता और परिवर्तनशीलता को समझते हुए, स्थायी और सच्चे मूल्यों की ओर ध्यान देना चाहिए।
कबीर यहु तन जात है, सकै तो ठाहर लाइ।
कै सेवा करि साध की, कै गुण गोविंद के गाइ॥36॥
*टिप्पणी: *ख-के गोबिंद गुण गाइ।
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि साधु की सेवा करके और गोविंद (ईश्वर) के गुणों का गायन करके सच्ची भक्ति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त की जा सकती है। साधु की सेवा और ईश्वर के गुणों का कीर्तन जीवन को सत्य और सच्चाई की ओर ले जाता है, जिससे आत्मिक शांति और पूर्ति प्राप्त होती है।
कबीर यह तन जात है, सकै तो लेहु बहोड़ि।
नागे हाथूँ ते गए, जिनके लाख करोड़ि॥37॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि यह शरीर (तन) नश्वर है और एक दिन समाप्त हो जाएगा। अगर तुम इसे समझ सको और इसका सही उपयोग कर सको, तो इसे ठीक से समझो। जैसे बहुत से धनवान लोग, जिनके पास लाखों-करोड़ों की सम्पत्ति थी, अंत में सब कुछ छोड़कर चले गए, वैसे ही यह शरीर भी अंततः समाप्त हो जाएगा। इसका मतलब है कि शरीर और भौतिक धन की स्थिरता नहीं होती; सच्चे ज्ञान और भक्ति की ओर ध्यान देना जरूरी है।
यह तनु काचा कुंभ है, चोट चहूँ दिसि खाइ।
एक राम के नाँव बिन, जदि तदि प्रलै जाइ॥38॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि यह शरीर (तन) एक कच्चे घड़े (कुंभ) की तरह है, जो चारों ओर से टूटने और चटकने के लिए खुला होता है। यदि इसमें राम के नाम की सुरक्षा और भक्ति नहीं है, तो यह शरीर जल्दी ही नष्ट हो जाएगा। इसका मतलब है कि बिना सच्ची भक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान के, जीवन और शरीर की स्थिरता और सुरक्षा नहीं होती।
यह तन काचा कुंभ है, मांहि कया ढिंग बास।
कबीर नैंण निहारियाँ, तो नहीं जीवन आस॥52॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि यह शरीर (तन) एक कच्चे घड़े (कुंभ) की तरह है, जिसमें कोई स्थिरता नहीं होती और जो आसानी से टूट सकता है। यदि तुमने जीवन के समय का सही उपयोग नहीं किया और केवल बाहरी चीजों पर ध्यान दिया, तो जीवन का वास्तविक उद्देश्य और आशा नहीं मिलती। इसका मतलब है कि केवल भौतिक शरीर की देखभाल और बाहरी दिखावे से जीवन की सच्चाई और स्थिरता प्राप्त नहीं होती; आत्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान की ओर ध्यान देना आवश्यक है।
यह तन काचा कुंभ है, लिया फिरै था साथि।
ढबका लागा फुटि गया, कछू न आया हाथि॥39॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि यह शरीर (तन) एक कच्चे घड़े (कुंभ) की तरह है, जो साथ लेकर घूमता है लेकिन अंत में टूट जाता है। जैसे घड़े में दरारें आ जाती हैं और उसमें रखा पानी गिर जाता है, वैसे ही शरीर का अंत आने पर कुछ भी स्थायी नहीं बचता। इसका मतलब है कि इस अस्थायी शरीर और भौतिक सुखों को लेकर चलने का कोई स्थायी लाभ नहीं होता; सच्चे ज्ञान और भक्ति की ओर ध्यान देना चाहिए।
काँची कारी जिनि करै, दिन दिन बधै बियाधि।
राम कबीरै रुचि भई, याही ओषदि साधि॥40॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि जो लोग सांसारिक वस्तुओं और भौतिक सुखों में ही लगे रहते हैं, जैसे कच्ची मिट्टी (काँची कारी) से काम करना, वे हर दिन बीमारियों और दुखों (बियाधि) का सामना करते हैं। इसके विपरीत, जो लोग राम की भक्ति और कबीर के मार्ग को अपनाते हैं, वे उस भक्ति को एक औषधि मानते हैं, जो उन्हें शांति और सच्चे सुख प्रदान करती है। इसका मतलब है कि भौतिक सुखों और सांसारिक चिंताओं की तुलना में, सच्ची भक्ति और आध्यात्मिकता ही जीवन में वास्तविक सुख और स्वास्थ्य लाती है।
कबीर अपने जीवतै, ए दोइ बातैं धोइ।
लोग बड़ाई कारणै, अछता मूल न खोइ॥41॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि अगर आप जीवन में दो बातें ध्यान में रखें—सच्चे ज्ञान और भक्ति—तो आप अपने जीवन को सही दिशा में ले जा सकते हैं। लोग केवल दिखावे और भौतिकता की बड़ाई करने में लगे रहते हैं, लेकिन इसका वास्तविकता और सच्चाई से कोई वास्ता नहीं होता। इसलिए, अपने मूल उद्देश्य और सत्य को नहीं छोड़ना चाहिए और केवल बाहरी दिखावे के पीछे नहीं भागना चाहिए।
खंभा एक गइंद दोइ, क्यूँ करि बंधिसि बारि।
मानि करै तो पीव नहीं, पीव तौ मानि निवारि॥42॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि एक ही खंभे (स्तंभ) के सहारे दो बातें (गेंद) कैसे टिक सकती हैं, और फिर पानी को रोकने (बंधिसि बारि) के लिए क्या किया जा सकता है? अगर कोई अपनी भक्ति (पीव) को मानता है, तो वह समझे कि भक्ति ही एकमात्र समाधान है। यदि भक्ति और ज्ञान को सही तरीके से समझा जाए, तो किसी भी समस्या या बाधा (मानि निवारि) को दूर किया जा सकता है।
इसका मतलब है कि सच्ची भक्ति और ज्ञान ही जीवन के कठिनाईयों और समस्याओं को हल करने का सही तरीका है।
दीन गँवाया दुनी सौं, दुनी न चाली साथि।
पाइ कुहाड़ा मारिया, गाफिल अपणै हाथि॥43॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि जो लोग सांसारिक चीजों (दुनी) में लगे रहते हैं, वे अपने जीवन को बर्बाद कर देते हैं, क्योंकि सांसारिक सुख और सम्पत्ति साथ नहीं चलती। जैसे एक कुहाड़ा (हथौड़ा) खुद ही अपने हाथ से काम करता है, वैसे ही लोग अपनी खुद की मूर्खता से अपने जीवन को नष्ट कर लेते हैं। इसका मतलब है कि सांसारिक पदार्थों की बजाय, आध्यात्मिकता और भक्ति की ओर ध्यान देना चाहिए।
यह तन तो सब बन भया, करम भए कुहाड़ि।
आप आप कूँ काटिहैं, कहैं कबीर विचारि॥44॥
इस दोहे में कबीरदास जी कहते हैं कि यह शरीर (तन) एक कच्चे निर्माण की तरह है, जो कर्मों के कुहाड़े से काटा जाता है। इसका मतलब है कि हमारे कर्म ही हमारे शरीर और जीवन की वास्तविकता को निर्धारित करते हैं। हमें अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि वे ही हमारे जीवन को आकार देते हैं।
कुल खोया कुल ऊबरै, कुल राख्यो कुल जाइ।
राम निकुल कुल भेंटि लैं, सब कुल रह्या समाइ॥45॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि जिन लोगों ने अपने कुल (वंश, परिवार) को खोया, वे भी अंततः अपने कुल को सही राह पर ला सकते हैं। राम (ईश्वर) की भक्ति से सब कुछ सुरक्षित और स्थिर हो जाता है, और सभी कुल (वंश) इस भक्ति में समा जाते हैं। इसका मतलब है कि सच्ची भक्ति और आध्यात्मिकता ही सभी समस्याओं और उलझनों को दूर करती है और जीवन को स्थिरता प्रदान करती है
दुनिया के धोखे मुवा, चलै जु कुल की काँण।
तबकुल किसका लाजसी, जब ले धर्या मसाँणि॥
इस दोहे में कबीरदास जी कहते हैं कि जब लोग दुनिया के धोखे में मरे, तो उनके कुल (वंश) का कोई महत्व नहीं रह जाता। जब शरीर मिट्टी में मिल जाता है, तो कुल की कोई भी लाज (शर्म) नहीं बचती।
दुनियाँ भाँडा दुख का भरी मुँहामुह भूष।
अदया अलह राम की, कुरलै ऊँणी कूष॥47॥
यहाँ कबीरदास जी कहते हैं कि दुनिया दुखों से भरी हुई है और इसके बाहरी दिखावे अस्थायी हैं। सच्ची शांति और सुख केवल राम की भक्ति से ही प्राप्त होती है।
दुनियां के मैं कुछ नहीं, मेरे दुनी अकथ।
साहिब दरि देखौं खड़ा, सब दुनियां दोजग जंत॥61॥
इस दोहे में कबीरदास जी कहते हैं कि वे दुनिया के मामलों में कुछ भी नहीं मानते। जब वे अपने सच्चे मालिक (साहिब) की ओर देखते हैं, तो सारी दुनिया केवल दुखों का स्थान (दोजग) लगती है।
जिहि जेबड़ी जग बंधिया, तूँ जिनि बँधै कबीर।
ह्नैसी आटा लूँण ज्यूँ, सोना सँवाँ शरीर॥48॥
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि जिसने दुनिया को बंधनों में बांध लिया है, वही सच में बंधा हुआ है। जैसे आटा और नमक एक साथ होते हैं, वैसे ही शरीर और भौतिक सुख अस्थायी हैं। सच्ची स्वतंत्रता और मुक्ति केवल भक्ति और ज्ञान में है।
कहत सुनत जग जात है, विषै न सूझै काल।
कबीर प्यालै प्रेम कै, भरि भरि पिवै रसाल॥49॥
लोग केवल बातें करते और सुनते रहते हैं, लेकिन उन्हें मृत्यु की वास्तविकता का एहसास नहीं होता। कबीर कहते हैं कि प्रेम की प्याली को भर-भर कर पीना चाहिए, क्योंकि यही प्रेम जीवन का असली रस है।
कबीर हद के जीव सूँ, हित करि मुखाँ न बोलि
जे लागे बेहद सूँ, तिन सूँ अंतर खोलि॥50॥
कबीर कहते हैं कि जो लोग गहरे आत्मज्ञान में हैं, वे अक्सर चुप रहते हैं और अपने दिल की बात करते हैं। वे उन लोगों से गहरे संबंध बनाते हैं जो अनंत सत्य के संपर्क में हैं और उनके साथ आत्मिक गहराई से मिलते हैं।
कबीर साषत की सभा, तू मत बैठे जाइ।
एकै बाड़ै क्यू बड़ै, रीझ गदहड़ा गाइ॥65॥
कबीर सलाह देते हैं कि धार्मिक विद्वानों की सभाओं में बैठना व्यर्थ है। बड़े-बड़े दिखावे और वाद-विवाद से प्रभावित न हों; असली महत्वपूर्ण बात यह है कि आप सच्चाई और ध्यान की खोज में लगे रहें।
कबीर केवल राम की, तूँ जिनि छाड़ै ओट।
घण अहरणि बिचि लोह ज्यूँ, घड़ी सहे सिर चोट॥51॥
कबीर का यह पद बहुत गहरा अर्थ रखता है। इसका तात्पर्य है कि जो व्यक्ति केवल राम के नाम का जाप करता है, वही सच्चे मार्ग पर चलने वाला है। जैसे लोहे की छड़ी को बार-बार पीटने से वह टूट जाती है, वैसे ही जीवन की कठिनाइयाँ और दुख व्यक्ति को कमजोर बना सकते हैं, लेकिन सच्चा ध्यान और भक्ति उसे संजीवनी शक्ति प्रदान करती है।
यह कविता हमें यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति और राम के प्रति अटूट विश्वास ही जीवन के कठिन समय में हमें संजीवनी शक्ति प्रदान कर सकते हैं।
कबीर केवल राम कहि, सुध गरीबी झालि।
कूड़ बड़ाई बूड़सी, भारी पड़सी काल्हि॥52॥
कबीर का यह पद गरीबी और भौतिक संपत्ति की अस्थिरता को दर्शाता है। इसमें कहा गया है कि केवल राम का नाम लेने से व्यक्ति की गरीबी दूर हो जाती है। जब कोई व्यक्ति केवल बाहरी दिखावे और दुनिया की झूठी प्रशंसा पर ध्यान देता है, तो वह अंततः काल के हाथों हार जाता है।
कबीर यह सिखाना चाहते हैं कि सच्ची समृद्धि और सुख केवल राम की भक्ति और सच्चे प्रेम में निहित हैं। बाहरी दिखावे और झूठी प्रशंसा से कोई स्थायी लाभ नहीं होता।
काया मंजन क्या करै, कपड़ धोइम धोइ।
उजल हूवा न छूटिए, सुख नींदड़ी न सोह॥53॥
कबीर के इस पद में शरीर की स्वच्छता और बाहरी वस्त्रों की सफाई की तुलना में आंतरिक पवित्रता और मानसिक शांति की महत्वपूर्णता को बताया गया है।
कबीर कहते हैं कि चाहे हम कितनी भी सफाई कर लें या कितने भी वस्त्र धो लें, लेकिन यदि मन और आत्मा की गंदगी दूर नहीं की, तो हम असली सुख और शांति नहीं पा सकते।
सच्ची सफाई और सुख तभी मिल सकते हैं जब हम अपने मन को शुद्ध करें और आंतरिक शांति की खोज करें, न कि केवल बाहरी सफाई और सजावट पर ध्यान दें।
उजल कपड़ा पहरि करि, पान सुपारी खाँहि।
एके हरि का नाँव बिन, बाँधे जमपुरि जाँहि॥54॥
कबीर का यह पद बाहरी सजावट और सामग्री की अप्रभाविता पर प्रकाश डालता है। यहाँ पर कबीर कहते हैं कि चाहे व्यक्ति कितनी भी सफेद और साफ-सुथरी कपड़े पहने और पान-सुपारी खाए, लेकिन यदि वह हरि के नाम का स्मरण नहीं करता, तो उसकी आत्मा और जीवन का उद्धार नहीं हो सकता।
बाहरी दिखावे और भौतिक सुख-साधनों से वास्तविक मुक्ति और शांति प्राप्त नहीं होती। सच्चा समाधान और शांति केवल हरि के नाम और भक्ति में निहित हैं।
थली चरंतै म्रिघ लै, बीध्या एक ज सौंण।
हम तो पंथी पंथ सिरि, हर्या चरैगा कौण॥74॥
कबीर का यह पद जीवन की खोज और भ्रम की स्थिति को दर्शाता है। यहाँ कबीर कह रहे हैं कि जैसे एक मृग (हिरण) अपनी प्यास बुझाने के लिए थली (जलाशय) की तलाश करता है, जबकि वह खुद एक मृग के खून से भरा है, वैसे ही हम भी सच्ची पथ की खोज में भ्रमित होते हैं।
वे यह भी कहते हैं कि हरि (ईश्वर) की भक्ति और सच्चे मार्ग की खोज में ही असली शांति और सुख मिलेगा। बिना सच्चे मार्ग की पहचान के, व्यक्ति भ्रम और अधूरे प्रयासों में ही समय बर्बाद करता है।
तेरा संगी कोइ नहीं, सब स्वारथ बँधी लोइ।
मनि परतीति न ऊपजै, जीव बेसास न होइ॥55॥
कबीर का यह पद यह दर्शाता है कि इस संसार में कोई भी वास्तव में आपका सच्चा साथी नहीं है, क्योंकि सभी लोग स्वार्थ में बंधे होते हैं। जब तक आप खुद पर और ईश्वर पर पूरी तरह से विश्वास नहीं रखते, तब तक जीवन में सच्चा सुख और शांति प्राप्त नहीं होती
मांइ बिड़ाणों बाप बिड़, हम भी मंझि बिड़ाह।
दरिया केरी नाव ज्यूँ, संजोगे मिलियाँह॥56॥
कबीर का यह पद जीवन की अनिश्चितता और संयोग की बात करता है। यहाँ कबीर कहते हैं कि माता-पिता और हम स्वयं भी इस जीवन की समुद्र की नाव की तरह हैं, जो विभिन्न संयोगों और परिस्थितियों के अनुसार चलती है।
इत प्रधर उत घर बड़जण आए हाट।
करम किराणाँ बेचि करि, उठि ज लागे बाट॥57॥
कबीर का यह पद उन लोगों के बारे में है जो धर्म और नैतिकता के व्यापार में लगे रहते हैं, लेकिन वास्तव में उन्हें अपने कर्मों की सच्चाई की पहचान नहीं होती।
यहाँ कबीर कहते हैं कि जैसे कोई व्यक्ति अपने घर से हाट (बाजार) आता है और वहाँ की गतिविधियों से प्रभावित होता है, वैसे ही लोग धर्म और कर्म के नाम पर बाहरी दिखावे में लगे रहते हैं। वे केवल दिखावे के लिए धर्म का व्यापार करते हैं, लेकिन सच्चाई से उनका संबंध नहीं होता।
नान्हाँ काती चित दे, महँगे मोलि बिकाइ।
गाहक राजा राम है और न नेड़ा आइ॥58॥
कबीर का यह पद यह दर्शाता है कि सच्ची वस्तुएँ और मूल्य केवल आंतरिक गुणों और ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति में निहित होती हैं।
यहाँ कबीर कहते हैं कि जैसे एक छोटी सी वस्तु, जो बाहरी रूप से सस्ती लगती है, यदि उसके पीछे सच्ची आत्मा और सच्चाई हो, तो वह महँगे दाम पर बिक सकती है। इसी प्रकार, सच्चा मूल्य और अमूल्य वस्त्र केवल ईश्वर की भक्ति और आंतरिक सच्चाई में होता है।
डागल उपरि दौड़णां, सुख नींदड़ी न सोइ।
पुनै पाए द्यौंहणे, ओछी ठौर न खोइ॥59॥
कबीर का यह पद जीवन के भ्रम और अस्थिरता को दर्शाता है। यहाँ कबीर कहते हैं कि जो लोग केवल बाहरी दिखावे और भौतिक सुखों की खोज में लगे रहते हैं, वे सच्ची शांति और सुख की प्राप्ति नहीं कर पाते।
“डागल उपरि दौड़णां” का मतलब है कि बाहरी दिखावे और भौतिक सुखों की दौड़ में व्यस्त रहना। इन चीजों के पीछे भागते हुए लोग सच्ची नींद और शांति प्राप्त नहीं कर सकते।
ज्यूँ कोली पेताँ बुणै, बुणतां आवै बोड़ि।
ऐसा लेख मीच का, कछु दौड़ि सके तो दौड़ि॥76॥
कबीर का यह पद जीवन की अनिश्चितता और अव्यक्त कर्मों के परिणाम को दर्शाता है। यहाँ कबीर एक कोली (एक प्रकार का पक्षी) की बात करते हैं जो अपनी संतान को एक विशेष विधि से प्रशिक्षित करता है। यह प्रशिक्षण अंततः उसकी संतान की स्थिति पर निर्भर करता है, और जब उसकी संतान तैयार हो जाती है, तब वह अपनी दिशा और गति को स्वयं तय करती है।
कबीर इसे एक उपमा के रूप में प्रयोग करते हैं, यह दिखाने के लिए कि जीवन में सच्ची सफलता और प्रगति केवल बाहरी दिखावे और अस्थिर प्रयासों पर निर्भर नहीं होती।
मैं मैं बड़ी बलाइ है, सके तो निकसी भाजि।
कब लग राखौं हे सखी, रूई पलेटी आगि॥60॥
कबीर का यह पद आत्म-महत्वाकांक्षा और आत्मा की चेतना के बीच के संघर्ष को दर्शाता है। यहाँ कबीर आत्म-महत्वाकांक्षा की भट्टी को साकार करने की कोशिश में लगे रहते हैं, लेकिन यह भट्टी (या आग) कभी शांत नहीं होती और निरंतर जलती रहती है।
वे कहते हैं कि “मैं-मैं” की भावना एक बड़ी बाधा है और इसे मिटाना कठिन है। “रूई पलेटी आगि” का तात्पर्य है कि जैसे रूई की आग जल्दी बुझती नहीं है, वैसे ही आत्म-महत्वाकांक्षा और अहंकार को खत्म करना भी बहुत मुश्किल है।
मैं मैं मेरी जिनि करै, मेरी मूल बिनास।
मेरी पग का पैषड़ा, मेरी गल की पास॥61॥
मेरे तेर की जीवणी, बसि बंध्या संसार।
कहाँ सुकुँणबा सुत कलित, दाक्षणि बारंबार॥79॥
मेरे तेरे की रासड़ी, बलि बंध्या संसार।
दास कबीरा किमि बँधै, जाकैं राम अधार॥82॥
कबीर नांव जरजरी, भरी बिराणै भारि।
खेवट सौं परचा नहीं, क्यो करि उतरैं पारि॥83॥
कबीर नाव जरजरी, कूड़े खेवणहार।
हलके हलके तिरि गए, बूड़े तिनि सिर भार॥62॥
कबीर पगड़ा दूरि है, जिनकै बिचिहै राति।
का जाणौं का होइगा, ऊगवै तैं परभाति॥84॥
साखी – मन कौ अंग
मन कै मते न चालिये, छाड़ि जीव की बाँणि।
ताकू केरे सूत ज्यूँ, उलटि अपूठा आँणि॥1॥
चिंता चिति निबारिए, फिर बूझिए न कोइ।
इंद्री पसर मिटाइए, सहजि मिलैगा सोइ॥2॥
आसा का ईंधन करूँ, मनसा करुँ विभूति।
जोगी फेरी फिल करौं, यों बिनवाँ वै सूति॥3॥
कबीर सेरी साँकड़ी चंचल मनवाँ चोर।
गुण गावै लैलीन होइ, कछू एक मन मैं और॥4॥
कबीर मारूँ मन कूँ, टूक टूक ह्नै जाइ।
विष की क्यारी बोई करि, लुणत कहा पछिताइ॥5॥
इस मन कौ बिसमल करौं, दीठा करौं अदीठ।
जै सिर राखौं आपणां, तौ पर सिरिज अंगीठ॥6॥
मन जाणैं सब बात, जाणत ही औगुण करै।
काहे की कुसलात, कर दीपक कूँ बैं पड़ै॥7॥
हिरदा भीतरि आरसी, मुख देषणाँ न जाइ।
मुख तौ तौपरि देखिए, जे मन की दुविधा जाइ॥8॥
कबीर मन मृथा भगा, खेत बिराना खाइ।
सूलाँ करि करि से किसी जब खसम पहूँचे आइ॥9॥
मन को मन मिलता नहीं तौ होता तन का भंग।
अब ह्नै रहु काली कांवली, ज्यौं दूजा चढ़ै न रंग॥10॥
मन दीया मन पाइए, मन बिन मन नहीं होइ।
मन उनमन उस अंड ज्यूँ, खनल अकासाँ जोइ॥9॥
मन गोरख मन गोविंदो, मन हीं औघड़ होइ।
जे मन राखै जतन करि, तौ आपै करता सोइ॥10॥
एक ज दोसत हम किया, जिस गलि लाल कबाइ।
एक जग धोबी धोइ मरै, तौ भी रंग न जाइ॥11॥
पाँणी ही तैं पातला, धूवाँ ही तै झींण।
पवनाँ बेगि उतावला, सो दोसत कबीरै कीन्ह॥12॥
कबीर तुरी पलांड़ियाँ, चाबक लीया हाथि।
दिवस थकाँ साँई मिलौं, पीछे पड़िहै राति।॥13॥
मनवां तो अधर बस्या, बहुतक झीणां होइ।
आलोकत सचु पाइया, कबहूँ न न्यारा सोइ॥14॥
मन न मार्या मन करि, सके न पंच प्रहारि।
सीला साच सरधा नहीं, इंद्री अजहुँ उद्यारि॥15॥
कबीर मन बिकरै पड़ा, गया स्वादि के साथ।
गलका खाया बरज्ताँ, अब क्यूँ आवै हाथि॥16॥
कबीर मन गाफिल भया, सुमिरण लागै नाहिं।
घणीं सहैगा सासनाँ, जम की दरगह माहिं॥17॥
कोटि कर्म पल मैं करै, यहु मन बिषिया स्वादि।
सतगुर सबद न मानई, जनम गँवाया बादि॥18॥
मैंमंता मन मारि रे, घटहीं माँहै घेरि।
जबहीं चालै पीठि दै, अंकुस दे दे फेरि॥19॥
जौ तन काँहै मन धरै, मन धरि निर्मल होइ।
साहिब सौ सनमुख रहै, तौ फिरि बालक होइ॥
मैंमंता मन मारि रे, नान्हाँ करि करि पीसि।
तब सुख पावै सुंदरी, ब्रह्म झलकै सीसि॥20॥
कागद केरी नाँव री, पाँणी केरी गंग।
कहै कबीर कैसे तिरूँ, पंच कुसंगी संग॥21॥
कबीर यह मन कत गया, जो मन होता काल्हि।
डूंगरि बूठा मेह ज्यूँ, गया निबाँणाँ चालि॥22॥
मृतक कूँ धी जौ नहीं, मेरा मन बी है।
बाजै बाव बिकार की, भी मूवा जीवै॥23॥
काटि कूटि मछली, छींकै धरी चहोड़ि।
कोइ एक अषिर मन बस्या, दह मैं पड़ी बहोड़ि॥24॥
मूवा मन हम जीवत, देख्या जैसे मडिहट भूत।
मूवाँ पीछे उठि उठि लागै, ऐसा मेरा पूत॥47॥
मूवै कौंधी गौ नहीं, मन का किया बिनास।
कबीर मन पंषी भया, बहुतक चढ़ा अकास।
उहाँ ही तैं गिरि पड़ा, मन माया के पास॥25॥
भगति दुबारा सकड़ा राई दसवैं भाइ।
मन तौ मैंगल ह्नै रह्यो, क्यूँ करि सकै समाइ॥26॥
करता था तो क्यूँ रह्या, अब करि क्यूँ पछताइ।
बोवै पेड़ बबूल का, अब कहाँ तैं खाइ॥27॥
काया देवल मन धजा, विष्रै लहरि फरराइ।
मन चाल्याँ देवल चलै, ताका सर्बस जाइ॥28॥
मनह मनोरथ छाँड़ि दे, तेरा किया न होइ।
पाँणी मैं घीव गीकसै, तो रूखा खाइ न कोइ॥29॥
काया कसूं कमाण ज्यूँ, पंचतत्त करि बांण।
मारौं तो मन मृग को, नहीं तो मिथ्या जाँण॥30॥
कबीर हरि दिवान कै, क्यूँकर पावै दादि।
पहली बुरा कमाइ करि, पीछे करै फिलादि॥35॥
साखी – सूषिम मारग कौ अंग
कौंण देस कहाँ आइया, कहु क्यूँ जाँण्याँ जाइ।
उहू मार्ग पावै नहीं, भूलि पड़े इस माँहि॥1॥
उतीथैं कोइ न आवई, जाकूँ बूझौं धाइ।
इतथैं सबै पठाइये, भार लदाइ लदाइ॥2॥
*टिप्पणी: *ख में इसके आगे यह दोहा है-
कबीर संसा जीव मैं, कोइ न कहै समुझाइ।
नाँनाँ बांणी बोलता, सो कत गया बिलाइ॥3॥
सबकूँ बूझत मैं फिरौं, रहण कहै नहीं कोइ।
प्रीति न जोड़ी राम सूँ, रहण कहाँ थैं होइ॥3॥
चलो चलौं सबको कहे, मोहि अँदेसा और।
साहिब सूँ पर्चा नहीं, ए जांहिगें किस ठौर॥4॥
जाइबे को जागा नहीं, रहिबे कौं नहीं ठौर।
कहै कबीरा संत हौ, अबिगति की गति और॥5॥
कबीरा मारिग कठिन है, कोइ न सकई जाइ।
गए ते बहुडे़ नहीं, कुसल कहै को आइ॥6॥
जन कबीर का सिषर घर, बाट सलैली सैल।
पाव न टिकै पपीलका, लोगनि लादे बैल॥7॥
जहाँ न चींटी चढ़ि सकै, राइ न ठहराइ।
मन पवन का गमि नहीं, तहाँ पहूँचे जाइ॥8॥
कबीर मारग अगम है, सब मुनिजन बैठे थाकि।
तहाँ कबीरा चलि गया गहि सतगुर कीसाषि॥9॥
सुर न थाके मुनि जनां, जहाँ न कोई जाइ।
मोटे भाग कबीर के, तहाँ रहे घर छाइ॥10॥
साखी – माया कौ अंग
जग हठवाड़ा स्वाद ठग, माया बेसाँ लाइ।
रामचरण नीकाँ गही, जिनि जाइ जनम ठगाइ॥1॥
कबीर जिभ्या स्वाद ते, क्यूँ पल में ले काम।
अंगि अविद्या ऊपजै, जाइ हिरदा मैं राम॥2॥
कबीर माया पापणीं, फंध ले बैठि हाटि।
सब जग तो फंधै पड़ा, गया कबीरा काटि॥2॥
कबीर माया पापणीं, लालै लाया लोंग।
पूरी कीनहूँ न भोगई, इनका इहै बिजोग॥3॥
कबीरा माया पापणीं, हरि सूँ करे हराम।
मुखि कड़ियाली कुमति की, कहण न देईं राम॥4॥
जाँणी जे हरि को भजौ, मो मनि मोटी आस।
हरि बिचि घालै अंतरा, माया बड़ी बिसास॥5॥
कबीर माया मोहनी, मोहे जाँण सुजाँण।
भागाँ ही छूटै नहीं, भरि भरि मारै बाँण॥6॥
कबीर माया मोहनी, जैसी मीठी खाँड़।
सतगुर की कृपा भई, नहीं तो करती भाँड़॥7॥
कबीर माया मोहनी, सब जग घाल्या घाँणि।
कोइ एक जन ऊबरै, जिनि तोड़ी कुल की काँणि॥8॥
कबीर माया मोहनी, माँगी मिलै न हाथि।
मनह उतारी झूठ करि, तब लागी डौलै साथि॥9॥
माया दासी संत की, ऊँभी देइ असीस।
बिलसी अरु लातौं छड़ी सुमरि सुमरि जगदीस॥10॥
माया मुई न मन मुवा, मरि मरि गया सरीर।
आसा त्रिस्नाँ ना मुई, यों कहि गया कबीर॥11॥
आसा जीवै जग मरै, लोग मरे मरि जाइ।
सोइ मूबे धन संचते, सो उबरे जे खाइ॥12॥
कबीर सो धन संचिए, जो आगै कूँ होइ।
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्या कोइ॥13॥
त्रीया त्रिण्णाँ पापणी, तासूँ प्रीति न जोड़ि।
पैड़ी चढ़ि पाछाँ पड़े, लागै मोटी खोड़ि॥14॥
त्रिष्णाँ सींची नाँ बुझे, दिन दिन बढ़ती जाइ।
जबासा के रूप ज्यूँ, घण मेहाँ कुमिलाइ॥15॥
कबीर जग की को कहे, भौ जलि बूड़ै दास।
पारब्रह्म पति छाड़ि कर, करैं मानि की आस॥16॥
माया तजी तौ का भया, मानि तजी नहीं जाइ।
मानि बड़े गुनियर मिले, मानि सबनि की खाइ॥17॥
रामहिं थोड़ा जाँणि करि, दुनियाँ आगैं दीन।
जीवाँ कौ राजा कहै, माया के आधीन॥18॥
रज बीरज की कली, तापरि साज्या रूप।
राम नाम बिन बूड़ि है, कनक काँमणी कूप॥19॥
माया तरवर त्रिविध का, साखा दुख संताप।
सीतलता सुपिनै नहीं, फल फीको तनि ताप॥20॥
कबीर माया ढाकड़ी, सब किसही कौ खाइ।
दाँत उपाणौं पापड़ी, जे संतौं नेड़ी जाइ॥21॥
नलनी सायर घर किया, दौं लागी बहुतेणि।
जलही माँहै जलि मुई, पूरब जनम लिपेणि॥22॥
कबीर गुण की बादली, ती तरबानी छाँहिं।
बाहरि रहे ते ऊबरे, भीगें मंदिर माँहिं॥23॥
कबीर माया मोह की, भई अँधारी लोइ।
जे सूते ते मुसि लिये, रहे बसत कूँ रोइ॥24॥
माया काल की खाँणि है, धरि त्रिगणी बपरौति।
जहाँ जाइ तहाँ सुख नहीं, यह माया की रीति॥
संकल ही तैं सब लहे, माया इहि संसार।
ते क्यूँ छूटे बापुड़े, बाँधे सिरजनहार॥25॥
बाड़ि चढ़ती बेलि ज्यूँ, उलझी, आसा फंध।
तूटै पणि छूटै नहीं, भई ज बाना बंध॥26॥
सब आसण आस तणाँ, त्रिबर्तिकै को नाहिं।
थिवरिति कै निबहै नहीं, परिवर्ति परपंच माँहि॥27॥
कबीर इस संसार का, झूठा माया मोह।
जिहि घरि जिता बधावणाँ, तिहि घरि तिता अँदोह॥28॥
माया हमगौ यों कह्या, तू मति दे रे पूठि।
और हमारा हम बलू गया कबीरा रूठि॥29॥
बुगली नीर बिटालिया, सायर चढ़ा कलंक।
और पँखेरू पी गए, हंस न बोवै चंच॥30॥
कबीर माया जिनि मिलैं, सो बरियाँ दे बाँह।
नारद से मुनियर मिले, किसौ भरोसे त्याँह॥31॥
माया की झल जग जल्या, कनक काँमणीं लागि।
कहुँ धौं किहि विधि राखिये, रूई पलेटी आगि॥32॥
साखी – चाँणक कौ अंग
जीव बिलव्या जीव सों, अलप न लखिया जाइ।
गोबिंद मिलै न झल बुझै, रही बुझाइ बुझाइ॥1॥
इही उदर के कारणै, जग जाँच्यो निस जाम।
स्वामी पणौ जु सिर चढ़ो, सर्या न एको काम॥2॥
स्वामी हूँणाँ सोहरा, दोद्धा हूँणाँ दास।
गाडर आँणीं ऊन कूँ, बाँधी चरै कपास॥3॥
स्वामी हूवा सीतका, पैका कार पचास।
राम नाँम काँठै रह्या, करै सिषां की आस॥4॥
कबीर तष्टा टोकणीं, लीए फिरै सुभाइ।
रामनाम चीन्हें नहीं, पीतलि ही कै चाइ॥5॥
कलि का स्वामी लोभिया, पीतलि धरी षटाइ।
राज दुबाराँ यौं फिरै, ज्यूँ हरिहाई गाइ॥6॥
कलि का स्वामी लोभिया, मनसा धरी बधाइ।
दैहिं पईसा ब्याज कौं, लेखाँ करताँ जाइ॥7॥
कबीर कलि खोटी भई, मुनियर मिलै न कोइ।
लालच लोभी मसकरा, तिनकूँ आदर होइ॥8॥
चारिउ बेद पढ़ाइ करि, हरि सूँ न लाया हेत।
बालि कबीरा ले गया, पंडित ढूँढ़ै खेत॥9॥
बाँम्हण गुरु जगत का, साधू का गुरु नाहिं।
उरझि पुरझि करि मरि रह्या, चारिउँ बेदाँ माहिं॥10॥
बाम्हण बूड़ा बापुड़ा, जेनेऊ कै जोरि।
लख चौरासी माँ गेलई, पारब्रह्म सों तोडि॥12॥)
साषित सण का जेवणा, भीगाँ सूँ कठठाइ।
दोइ अषिर गुरु बाहिरा, बाँध्या जमपुरि जाइ॥11॥
कबीर साषत की सभा, तूँ जिनि बैसे जाइं।
एक दिबाड़ै क्यूँ बडै, रीझ गदेहड़ा गाइ॥14॥
साषत ते सूकर भला, सूचा राखे गाँव।
बूड़ा साषत बापुड़ा, बैसि समरणी नाँव॥15॥
साषत बाम्हण जिनि मिलैं, बैसनी मिलौ चंडाल।
अंक माल दे भेटिए, मानूँ मिले गोपाल॥16॥)
पाड़ोसी सू रूसणाँ, तिल तिल सुख की हाँणि।
पंडित भए सरावगी, पाँणी पीवें छाँणि॥12॥
पंडित सेती कहि रह्या, भीतरि भेद्या नाहिं।
औरूँ कौ परमोधतां, गया मुहरकाँ माँहि॥13॥
चतुराई सूवै पढ़ी, सोई पंजर माँहि।
फिरि प्रमोधै आन कौ, आपण समझै नाहिं॥14॥
रासि पराई राषताँ, खाया घर का खेत।
औरौं कौ प्रमोधतां, मुख मैं पड़िया रेत॥15॥
कबीर कहै पोर कुँ, तूँ समझावै सब कोइ।
संसा पड़गा आपको, तौ और कहे का होइ॥21॥)
तारा मंडल बैसि करि, चंद बड़ाई खाइ।
उदै भया जब सूर का, स्यूँ ताराँ छिपि जाइ॥16॥
देषण के सबको भले, जिसे सीत के कोट।
रवि के उदै न दीसहीं, बँधे न जल की पोट॥17॥
सुणत सुणावत दिन गए, उलझि न सुलझा मान।
कहै कबीर चेत्यौ नहीं, अजहुँ पहलौ दिन॥24॥)
तीरथ करि करि जग मुवा, डूँधै पाँणी न्हाइ।
राँमहि राम जपंतड़ाँ, काल घसीट्याँ जाइ॥18॥
कासी काँठै घर करैं, पीवैं निर्मल नीर।
मुकति नहीं हरि नाँव बिन, यों कहें दास कबीर॥19॥
कबीर इस संसार को, समझाऊँ कै बार।
पूँछ जु पकड़ै भेड़ की, उतर्या चाहै पार॥20॥
पद गायाँ मन हरषियाँ, साषी कह्यां आनंद।
सो तत नाँव न जाणियाँ, गल मैं पड़ि गया फंद॥)
कबीर मन फूल्या फिरै, करता हूँ मैं ध्रंम।
कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रंम॥21॥
मोर तोर की जेवड़ी, बलि बंध्या संसार।
काँ सिकडूँ बासुत कलित, दाझड़ बारंबार॥22॥
साखी – साँच कौ अंग
कबीर पूँजी साह की, तूँ जिनि खोवै ष्वार।
खरी बिगूचनि होइगी, लेखा देती बार॥1॥
लेखा देणाँ सोहरा, जे दिल साँचा होइ।
उस चंगे दीवाँन मैं, पला न पकड़े कोइ॥2॥
कबीर चित्त चमंकिया, किया पयाना दूरि।
काइथि कागद काढ़िया, तब दरिगह लेखा पूरि॥3॥
काइथि कागद काढ़ियां, तब लेखैं वार न पार।
जब लग साँस सरीर मैं, तब लग राम सँभार॥4॥
यहु सब झूठी बंदिगी, बरियाँ पंच निवाज।
साचै मारै झूठ पढ़ि, काजी करै अकाज॥5॥
कबीर काजी स्वादि बसि, ब्रह्म हतै तब दोइ।
चढ़ि मसीति एकै कहै, दरि क्यूँ साचा होइ॥6॥
काजी मुलाँ भ्रमियाँ, चल्या दुनीं कै साथि।
दिल थैं दीन बिसारिया, करद लई जब हाथि॥7॥
जोरी कलिर जिहै करै, कहते हैं ज हलाल।
जब दफतर देखंगा दई, तब हैगा कौंण हवाल॥8॥
जोरी कीयाँ जुलम है, माँगे न्याव खुदाइ।
खालिक दरि खूनी खड़ा, मार मुहे मुहि खाइ॥9॥
साँई सेती चोरियाँ, चोराँ सेती गुझ।
जाँणैगा रे जीवड़ा, मर पड़ैगी तुझ॥10॥
सेष सबूरी बाहिरा, क्या हज काबैं जाइ।
जिनकी दिल स्याबति नहीं, तिनकौं कहाँ खुदाइ॥11॥
खूब खाँड है खोपड़ी, माँहि पड़ै दुक लूँण।
पेड़ा रोटी खाइ करि, गला कटावै कौंण॥12॥
पापी पूजा बैसि करि, भषै माँस मद दोइ।
तिनकी दष्या मुकति नहीं, कोटि नरक फल होइ॥13॥
सकल बरण इकत्रा है, सकति पूजि मिलि खाँहिं।
हरि दासनि की भ्रांति करि, केवल जमपुरि जाँहिं॥14॥
कबीर लज्या लोक की, सुमिरै नाँही साच।
जानि बूझि कंचन तजै, काठा पकड़े काच॥15॥
कबीर जिनि जिनि जाँणियाँ, करत केवल सार।
सो प्राणी काहै चलै, झूठे जग की लार॥16॥
झूठे को झूठा मिलै, दूणाँ बधै सनेह।
झूठे कूँ साचा मिलै, तब ही तूटै नेह॥17॥
साखी – भ्रम विधौंसण कौ अंग
पांहण केरा पूतला, करि पूजै करतार।
इही भरोसै जे रहे, ते बूड़े काली धार॥1॥
काजल केरी कोठरी, मसि के कर्म कपाट।
पांहनि बोई पृथमी, पंडित पाड़ी बाट॥2॥
पाँहिन फूँका पूजिए, जे जनम न देई जाब।
आँधा नर आसामुषी, यौंही खोवै आब॥3॥
कबीर गुड कौ गमि नहीं, पाँषण दिया बनाइ।
सिष सोधी बिन सेविया, पारि न पहुँच्या जाइ॥5॥)
हम भी पाहन पूजते, होते रन के रोझ।
सतगुर की कृपा भई, डार्या सिर थैं बोझ॥4॥
जेती देषौं आत्मा, तेता सालिगराँम।
साथू प्रतषि देव हैं, नहीं पाथर सू काँम॥5॥
कबीर माला काठ की, मेल्ही मुगधि झुलाइ।
सुमिरण की सोधी नहीं, जाँणै डीगरि घाली जाइ॥6॥)
सेवैं सालिगराँम कूँ, मन की भ्रांति न जाइ।
सीतलता सुषिनै नहीं, दिन दिन अधकी लाइ॥6॥
माला फेरत जुग भया, पाय न मन का फेर।
कर का मन का छाँड़ि दे, मन का मन का फेर॥8॥)
सेवैं सालिगराँम कूँ, माया सेती हेत।
बोढ़े काला कापड़ा, नाँव धरावैं सेत॥7॥
जप तप दीसै थोथरा, तीरथ ब्रत बेसास।
सूवै सैबल सेविया, यों जग चल्या निरास॥8॥
तीरथ त सब बेलड़ी, सब जग मेल्या छाइ।
कबीर मूल निकंदिया, कोण हलाहल खाइ॥9॥
मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जाँणि।
दसवाँ द्वारा देहुरा, तामै जोति पिछाँणि॥10॥
कबीर दुनियाँ देहुरै, सोस नवाँवण जाइ।
हिरदा भीतर हरि बसै, तूँ ताही सौ ल्यौ लाइ॥11॥
साखी – भेष कौ अंग
कर सेती माला जपै, हिरदै बहै डंडूल।
पग तौ पाला मैं गिल्या, भाजण लागी सूल॥1॥
कर पकरै अँगुरी गिनै, मन धावै चहुँ वीर।
जाहि फिराँयाँ हरि मिलै, सो भया काठ की ठौर॥2॥
माला पहरैं मनमुषी, ताथैं कछु न होइ।
मन माला कौं फेरताँ, जुग उजियारा सोइ॥3॥
माला पहरे मनमुषी, बहुतैं फिरै अचेत।
गाँगी रोले बहि गया, हरि सूँ नाँहीं हेत॥4॥
कबीर माला काठ की, कहि समझावै तोहि।
मन न फिरावै आपणों, कहा फिरावै मोहि॥5॥
कबीर माला मन की, और संसारी भेष।
माला पहर्या हरि मिलै, तौ अरहट कै गलि देष॥6॥
माला पहर्याँ कुछ नहीं, रुल्य मूवा इहि भारि।
बाहरि ढोल्या हींगलू भीतरि भरी भँगारि॥7॥
माला पहर्याँ कुछ नहीं, काती मन कै साथि।
जब लग हरि प्रकटै नहीं, तब लग पड़ता हाथि॥8॥
माला पहर्याँ कुछ नहीं, गाँठि हिरदा की खोइ।
हरि चरनूँ चित्त राखिये, तौ अमरापुर होइ॥9॥
माला पहर्याँ कुछ नहीं बाम्हण भगत न जाण।
ब्याँह सराँधाँ कारटाँ उँभू वैंसे ताणि॥2॥)
माला पहर्या कुछ नहीं, भगति न आई हाथि।
माथौ मूँछ मुँड़ाइ करि, चल्या जगत कै साथि॥10॥
साँईं सेती साँच चलि, औराँ सूँ सुध भाइ।
भावै लम्बे केस करि, भावै घुरड़ि मुड़ाइ॥11॥
केसौं कहा बिगाड़िया, जे मूड़े सौ बार।
मन कौं न काहे मूड़िए, जामै बिषै विकार॥12॥
मन मेवासी मूँड़ि ले, केसौं मूड़े काँइ।
जे कुछ किया सु मन किया, केसौं कीया नाँहि॥13॥
मूँड़ मुँड़ावत दिन गए, अजहूँ न मिलिया राम
राँम नाम कहु क्या करैं, जे मन के औरे काँम॥14॥
स्वाँग पहरि सोरहा भया, खाया पीया षूँदि।
जिहि सेरी साधू नीकले, सो तौ मेल्ही मूँदि॥15॥
बेसनों भया तौ क्या भया, बूझा नहीं बबेक।
छापा तिलक बनाइ करि, दगध्या लोक अनेक॥16॥
तन कौं जोगी सब करैं, मन कों बिरला कोइ।
सब सिधि सहजै पाइए, जे मन जोगी होइ॥17॥
कबीर यहु तौ एक है, पड़दा दीया भेष।
भरम करम सब दूरि करि, सबहीं माँहि अलेष॥18॥
भरम न भागा जीव का, अनंतहि धरिया भेष।
सतगुर परचे बाहिरा, अंतरि रह्या अलेष॥19॥
जगत जहंदम राचिया, झूठे कुल की लाज।
तन बिनसे कुल बिनसि है, गह्या न राँम जिहाज॥20॥
पष ले बूडी पृथमीं, झूठी कुल की लार।
अलष बिसारौं भेष मैं, बूड़े काली धार॥21॥
चतुराई हरि नाँ मिले, ऐ बाताँ की बात।
एक निसप्रेही निरधार का, गाहक गोपीनाथ॥22॥
नवसत साजे काँमनीं, तन मन रही सँजोइ।
पीव कै मन भावे नहीं, पटम कीयें क्या होइ॥23॥
जब लग पीव परचा नहीं, कन्याँ कँवारी जाँणि।
हथलेवा होसै लिया, मुसकल पड़ी पिछाँणि॥24॥
कबीर हरि की भगति का, मन मैं परा उल्लास।
मैं वासा भाजै नहीं, हूँण मतै निज दास॥25॥
मैं वासा मोई किया, दुरिजिन काढ़े दूरि।
राज पियारे राँम का, नगर बस्या भरिपूरि॥26॥
साखी – साध कौ अंग
कबीर संगति साध की, कदे न निरफल होइ।
चंदन होसी बाँवना, नीब न कहसी कोइ॥1॥
कबीर संगति साध की, बेगि करीजैं जाइ।
दुरमति दूरि गँवाइसी, देसी सुमति बताइ॥2॥
मथुरा जावै द्वारिका, भावैं जावैं जगनाथ।
साध संगति हरि भगति बिन, कछू न आवै हाथ॥3॥
मेरे संगी दोइ जणाँ एक बैष्णों एक राँम।
वो है दाता मुकति का, वो सुमिरावै नाँम॥4॥
कबीरा बन बन में फिरा, कारणि अपणें राँम।
राम सरीखे जन मिले, तिन सारे सब काँम॥5॥
कबीर सोई दिन भला, जा दिन संत मिलाहिं।
अंक भरे भरि भेटिया, पाप सरीरौ जाँहिं॥6॥
कबीर चन्दन का बिड़ा, बैठ्या आक पलास।
आप सरीखे करि लिए जे होत उन पास॥7॥
कबीर खाईं कोट की, पांणी पीवे न कोइ
आइ मिलै जब गंग मैं, तब सब गंगोदिक होइ॥8॥
जाँनि बूझि साचहि तजै, करैं झूठ सूँ नेह।
ताको संगति राम जी, सुपिनै हो जिनि देहु॥9॥
कबीर तास मिलाइ, जास हियाली तूँ बसै।
वहि तर वेगि उठाइ, नित को गंजन को सहै॥10॥
केती लहरि समंद की, कत उपजै कत जाइ।
बलिहारी ता दास की, उलटी माँहि समाइ॥11॥
पंच बल धिया फिरि कड़ी, ऊझड़ ऊजड़ि जाइ।
बलिहारी ता दास की, बवकि अणाँवै ठाइ॥12॥
काजल केरी कोठड़ी, तैसा यह संसार।
बलिहारी ता दास की, पैसि जु निकसण हार॥13॥)
काजल केरी कोठढ़ी, काजल ही का कोट।
बलिहारी ता दास की, जे रहै राँम की ओट॥12॥
भगति हजारी कपड़ा, तामें मल न समाइ।
साषित काली काँवली, भावै तहाँ बिछाइ॥13॥
साखी – साध साषीभूत कौ अंग
निरबैरी निहकाँमता, साँई सेती नेह।
विषिया सूँ न्यारा रहै, संतहि का अँग एह॥1॥
संत न छाड़ै संतई, जे कोटिक मिलै असंत।
चंदन भुवंगा बैठिया, तउ सीतलता न तजंत॥2॥
कबीर हरि का भाँवता, दूरैं थैं दीसंत।
तन षीणा मन उनमनाँ, जग रूठड़ा फिरंत॥3॥
कबीर हरि का भावता, झीणाँ पंजर तास।
रैणि न आवै नींदड़ी, अंगि न चढ़ई मास॥4॥
अणरता सुख सोवणाँ, रातै नींद न आइ।
ज्यूँ जल टूटै मंछली यूँ बेलंत बिहाइ॥5॥
जिन्य कुछ जाँण्याँ नहीं तिन्ह, सुख नींदणी बिहाइ।
मैंर अबूझी बूझिया, पूरी पड़ी बलाइ॥6॥
जाँण भगत का नित मरण अणजाँणे का राज।
सर अपसर समझै नहीं, पेट भरण सूँ काज॥7॥
जिहि घटिजाँण बिनाँण है, तिहि घटि आवटणाँ घणाँ।
बिन षंडै संग्राम है नित उठि मन सौं झूमणाँ॥8॥
राम बियोगी तन बिकल, ताहि न चीन्है कोइ।
तंबोली के पान ज्यूँ, दिन दिन पीला होइ॥9॥
पीलक दौड़ी साँइयाँ, लोग कहै पिंड रोग।
छाँनै लंधण नित करै, राँम पियारे जोग॥10॥
काम मिलावै राम कूँ, जे कोई जाँणै राषि।
कबीर बिचारा क्या करे, जाकी सुखदेव बोले साषि॥11॥
काँमणि अंग बिरकत भया, रत भया हरि नाँहि।
साषी गोरखनाथ ज्यूँ, अमर भए कलि माँहि॥12॥
जदि विषै पियारी प्रीति सूँ, तब अंतर हरि नाँहि।
जब अंतर हरि जी बसै, तब विषिया सूँ चित नाँहि॥13॥
जिहि घट मैं संसौ बसै, तिहिं घटि राम न जोइ।
राम सनेही दास विचि, तिणाँ न संचर होइ॥14॥
स्वारथ को सबको सगा, सब सगलाही जाँणि।
बिन स्वारथ आदर करै, सो हरि की प्रीति पिछाँणि॥15॥
जिहिं हिरदै हरि आइया, सो क्यूँ छाँनाँ होइ।
जतन जतन करि दाबिए, तऊ उजाजा सोइ॥16॥
फाटै दीदे मैं फिरौं, नजरि न आवै कोइ।
जिहि घटि मेरा साँइयाँ, सो क्यूँ छाना होइ॥17॥
सब घटि मेरा साँइयाँ, सूनी सेज न कोइ।
भाग तिन्हौ का हे सखी, जिहि घटि परगड होइ॥18॥
पावक रूपी राँम है, घटि घटि रह्या समाइ।
चित चकमक लागै नहीं, ताथैं धुँवाँ ह्नै ह्नै जाइ॥19॥
कबीर खालिक जागिया, और न जागै कोइ।
कै जागै बिसई विष भर्या, कै दास बंदगी होइ॥20॥
कबीर चाल्या जाइ था, आगैं मिल्या खुदाइ।
मीराँ मुझ सौं यौं कह्या, किनि फुरमाई गाइ॥21॥
साखी – मधि कौ अंग
कबीर मधि अंग जेको रहै, तौ तिरत न लागै बार।
दुइ दुइ अंग सूँ लाग करि, डूबत है संसार॥1॥
कबीर दुविधा दूरि करि, एक अंग ह्नै लागि।
यहु सीतल वहु तपति है दोऊ कहिये आगि॥2॥
अनल अकाँसाँ घर किया, मधि निरंतर बास।
बसुधा ब्यौम बिरकत रहै, बिनठा हर बिसवास॥3॥
बासुरि गमि न रैंणि गमि, नाँ सुपनै तरगंम।
कबीर तहाँ बिलंबिया, जहाँ छाहड़ी न घंम॥4॥
जिहि पैडै पंडित गए, दुनिया परी बहीर।
औघट घाटी गुर कही, तिहिं चढ़ि रह्या कबीर॥5॥
श्रग नृकथै हूँ रह्या, सतगुर के प्रसादि।
चरन कँवल की मौज मैं, रहिसूँ अंतिरु आदि॥6॥
हिंदू मूये राम कहि, मुसलमान खुदाइ।
कहै कबीर सो जीवता, दुइ मैं कदे न जाइ॥7॥
दुखिया मूवा दुख कों, सुखिया सुख कौं झूरि।
सदा आनंदी राम के, जिनि सुख दुख मेल्हे दूरि॥8॥
कबीर हरदी पीयरी, चूना ऊजल भाइ।
रामसनेही यूँ मिले, दुन्यूँ बरन गँवाइ॥9॥
काबा फिर कासी भया, राँम भया रहीम।
मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीभ॥10॥
धरती अरु आसमान बिचि, दोइ तूँबड़ा अबध।
षट दरसन संसै पड़ा, अरु चौरासी सिध॥11॥
साखी – उपदेश कौ अंग
हरि जी यहै बिचारिया, साषी कहौ कबीर।
भौसागर मैं जीव है, जे कोई पकड़ैं तीर॥1॥
कली काल ततकाल है, बुरा करौ जिनि कोइ।
अनबावै लोहा दाहिणै बोबै सु लुणता होइ॥2॥
जीवन को समझै नहीं, मुबा न कहै संदेस।
जाको तन मन सौं परचा नहीं, ताकौ कौण धरम उपदेस॥3॥)
कबीर संसा जीव मैं, कोई न कहै समझाइ।
बिधि बिधि बाणों बोलता सो कत गया बिलाइ॥3॥
कबीर संसा दूरि करि जाँमण मरण भरंम।
पंचतत तत्तहि मिले सुरति समाना मंन॥4॥
ग्रिही तौ च्यंता घणीं, बैरागी तौ भीष।
दुहुँ कात्याँ बिचि जीव है, दौ हमैं संतौं सीष॥5॥
बैरागी बिरकत भला, गिरहीं चित्त उदार।
दुहै चूकाँ रीता पड़ै, ताकूँ वार न पार॥6॥
जैसी उपजै पेड़ मूँ, तैसी निबहै ओरि।
पैका पैका जोड़ताँ, जुड़िसा लाष करोड़ि॥7॥
कबीर हरि के नाँव सूँ, प्रीति रहै इकतार।
तौ मुख तैं मोती झड़ैं, हीरे अंत न पार॥8॥
ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होइ॥9॥
कोइ एक राखै सावधान, चेतनि पहरै जागि।
बस्तन बासन सूँ खिसै, चोर न सकई लागि॥10॥
साखी – बेसास कौ अंग
जिनि नर हरि जठराँह, उदिकै थैं षंड प्रगट कियौ।
सिरजे श्रवण कर चरन, जीव जीभ मुख तास दीयो॥
उरध पाव अरध सीस, बीस पषां इम रषियौ।
अंन पान जहां जरै, तहाँ तैं अनल न चषियौ॥
इहिं भाँति भयानक उद्र में, न कबहू छंछरै।
कृसन कृपाल कबीर कहि, इम प्रतिपालन क्यों करै॥1॥
भूखा भूखा क्या करै, कहा सुनावै लोग।
भांडा घड़ि जिनि मुख दिया, सोई पूरण जोग॥2॥
रचनहार कूँ चीन्हि लै, खैचे कूँ कहा रोइ।
दिल मंदिर मैं पैसि करि, तांणि पछेवड़ा सोइ॥3॥
राम नाम करि बोहड़ा, बांही बीज अधाइ।
अंति कालि सूका पड़ै, तौ निरफल कदे न जाइ॥4॥
च्यंतामणि मन में बसै, सोई चित्त मैं आंणि।
बिन च्यंता च्यंता करै, इहै प्रभू की बांणि॥5॥
कबीर का तूँ चितवै, का तेरा च्यंत्या होइ।
अणच्यंत्या हरिजी करै, जो तोहि च्यंत न होइ॥6॥
करम करीमां लिखि रह्या, अब कछू लिख्या न जाइ।
मासा घट न तिल बथै, जौ कोटिक करै उपाइ॥7॥
जाकौ चेता निरमया, ताकौ तेता होइ।
रती घटै न तिल बधै, जौ सिर कूटै कोइ॥8॥
करीम कबीर जु विह लिख्या, नरसिर भाग अभाग।
जेहूँ च्यंता चितवै, तऊ स आगै आग॥10॥)
च्यंता न करि अच्यंत रहु, सांई है संभ्रथ।
पसु पंषरू जीव जंत, तिनको गांडि किसा ग्रंथ॥9॥
संत न बांधै गाँठड़ी, पेट समाता लेइ।
सांई सूँ सनमुख रहै, जहाँ माँगै तहाँ देइ॥10॥
राँम राँम सूँ दिल मिलि, जन हम पड़ी बिराइ।
मोहि भरोसा इष्ट का, बंदा नरकि न जाइ॥11॥
कबीर तूँ काहे डरै, सिर परि हरि का हाथ।
हस्ती चढ़ि नहीं डोलिये, कूकर भूसैं जु लाष॥12॥
मीठा खाँण मधूकरी, भाँति भाँति कौ नाज।
दावा किसही का नहीं, बित बिलाइति बड़ राज॥13॥
हस्ती चढ़ि क्या डोलिए। भुसैं हजार।
ख प्रति में इसके आगे यह दोहा है-
हसती चढ़िया ज्ञान कै, सहज दुलीचा डारि।
स्वान रूप संसार है, पड़ा भुसौ झषि माँरि॥15॥)
मोनि महातम प्रेम रस, गरवा तण गुण नेह।
ए सबहीं अह लागया, जबहीं कह्या कुछ देह॥14॥
माँगण मरण समान है, बिरला वंचै कोइ।
कहै कबीर रघुनाथ सूँ, मतिर मँगावै माहि॥15॥
पांडल पंजर मन भवर, अरथ अनूपम बास।
राँम नाँम सींच्या अँमी, फल लागा वेसास॥16॥
कबीर मरौं पै मांगौं नहीं, अपणै तन कै काज।
परमारथ कै कारणै, मोहिं माँगत न आवै लाज॥20॥
भगत भरोसै एक कै, निधरक नीची दीठि।
तिनकू करम न लागसी, राम ठकोरी पीठि॥21॥)
मेर मिटी मुकता भया, पाया ब्रह्म बिसास।
अब मेरे दूजा को नहीं, एक तुम्हारी आस॥17॥
जाकी दिल में हरि बसै, सो नर कलपै काँइ।
एक लहरि समंद की, दुख दलिद्र सब जाँइ॥18॥
पद गाये लैलीन ह्नै, कटी न संसै पास।
सबै पिछीड़ै, थोथरे, एक बिनाँ बेसास॥19॥
गावण हीं मैं रोज है, रोवण हीं में राग।
इक वैरागी ग्रिह मैं, इक गृही मैं वैराग॥20॥
गाया तिनि पाया नहीं, अणगाँयाँ थैं दूरि।
जिनि गाया बिसवास सूँ, तिन राम रह्या भरिपूरि॥21॥
साखी – बिर्कताई कौ अंग
मेरे मन मैं पड़ि गई, ऐसी एक दरार।
फटा फटक पषाँण ज्यूँ, मिल्या न दूजी बार॥1॥
मन फाटा बाइक बुरै, मिटी सगाई साक।
जौ परि दूध तिवास का, ऊकटि हूवा आक॥2॥
चंदन माफों गुण करै, जैसे चोली पंन।
दोइ जनाँ भागां न मिलै, मुकताहल अरु मंन॥3॥
मोती भागाँ बीधताँ, मन मैं बस्या कबोल।
बहुत सयानाँ पचि गया, पड़ि गई गाठि गढ़ोल॥4॥
मोती पीवत बीगस्या, सानौं पाथर आइ राइ।
साजन मेरी निकल्या, जाँमि बटाऊँ जाइ॥5॥)
पासि बिनंठा कपड़ा, कदे सुरांग न होइ।
कबीर त्याग्या ग्यान करि, कनक कामनी दोइ॥4॥
चित चेतनि मैं गरक ह्नै, चेत्य न देखैं मंत।
कत कत की सालि पाड़िये, गल बल सहर अनंत॥5॥
जाता है सो जाँण दे, तेरी दसा न जाइ।
खेवटिया की नाव ज्यूँ, धणों मिलैंगे आइ॥6॥
नीर पिलावत क्या फिरै, सायर घर घर बारि।
जो त्रिषावंत होइगा, तो पीवेगा झष मारि॥7॥
सत गंठी कोपीन है, साध न मानै संक।
राँम अमलि माता रहै, गिणैं इंद्र कौ रंक॥8॥
दावै दाझण होत है, निरदावै निरसंक।
जे नर निरदावै रहैं, ते गणै इंद्र कौ रंक॥9॥
कबीर सब जग हंडिया, मंदिल कंधि चढ़ाइ।
हरि बिन अपनाँ को नहीं, देखे ठोकि बजाइ॥10॥
साखी – सम्रथाई कौ अंग
नाँ कुछ किया न करि सक्या, नाँ करणे जोग सरीर।
जे कुछ किया सु हरि किया, ताथै भया कबीर कबीर॥1॥
कबीर किया कछू न होत है, अनकीया सब होइ।
जे किया कछु होत है, तो करता औरे कोइ॥2॥
जिसहि न कोई तिसहि तूँ, जिस तूँ तिस सब कोइ।
दरिगह तेरी साँईंयाँ, नाँव हरू मन होइ॥3॥
एक खड़े ही लहैं, और खड़ा बिललाइ।
साईं मेरा सुलषना, सूता देइ जगाइ॥4॥
सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं, तऊ हरि गुण लिख्या न जाइ॥5॥
बाजण देह बजंतणी, कुल जंतड़ी न बेड़ि।
तुझै पराई क्या पड़ी, तूँ आपनी निबेड़ि॥8॥)
अबरन कौं का बरनिये, मोपै लख्या न जाइ।
अपना बाना बाहिया, कहि कहि थाके माइ॥6॥
झल बाँवे झल दाँहिनैं, झलहिं माँहि ब्यौहार।
आगैं पीछै झलमई, राखै सिरजनहार॥7॥
साईं मेरा बाँणियाँ, सहजि करै ब्यौपार।
बिन डाँडी बिन पालड़ै, तोलै सब संसार॥8॥
कबीर वार्या नाँव परि, कीया राई लूँण।
जिसहिं चलावै पंथ तूँ, तिसहिं भुलावै कौंण॥9॥
कबीर करणी क्या करै, जे राँम न कर सहाइ।
जिहिं जिहिं डाली पग धरै, सोई नवि नवि जाइ॥10॥
जदि का माइ जनमियाँ, कहूँ न पाया सुख।
डाली डाली मैं फिरौं, पाती पाती दुख॥11॥
साईं सूँ सब होत है, बंदे थै कछु नाहिं।
राई थैं परबत करै, परबत राई माहिं॥12॥
रैणाँ दूरां बिछोड़ियां, रहु रे संषम झूरि।
देवल देवलि धाहिणी, देसी अंगे सूर॥13॥
साखी – जीवन मृतक कौ अंग
जीवन मृतक ह्नै रहै, तजै जगत की आस।
तब हरि सेवा आपण करै, मति दुख पावै दास॥1॥
जिन पांऊँ सै कतरी हांठत देत बदेस।
तिन पांऊँ तिथि पाकड़ौ, आगण गया बदेस॥1॥)
कबीर मन मृतक भया, दुरबल भया सरीर।
तब पैडे लागा हरि फिरै, कहत कबीर कबीर॥2॥
कबीर मरि मड़हट रह्या, तब कोइ न बूझै सार।
हरि आदर आगै लिया, ज्यूँ गउ बछ की लार॥3॥
घर जालौं घर उबरे, घर राखौं घर जाइ।
एक अचंभा देखिया, मड़ा काल कौं खाइ॥4॥
मरताँ मरताँ जग मुवा, औसर मुवा न कोइ।
कबीर ऐसैं मरि मुवा, ज्यूँ बहूरि न मरना होइ॥5॥
बैद मुवा रोगी मुवा, मुवा सकल संसार।
एक कबीरा ना मुवा, जिनि के राम अधार॥6॥
मन मार्या ममता मुई, अहं गई सब छूटि।
जोगी था सो रमि गया, आसणि रही विभूति॥7॥
जीवन थै मरिबो भलौ, जौ मरि जानै कोइ।
मरनै पहली जे मरे, तौ कलि अजरावर होइ॥8॥
खरी कसौटी राम की, खोटा टिकैं न कोइ।
राम कसौटी सो टिकै, जो जीवन मृतक होइ॥9॥
आपा मेट्या हरि मिलै, हरि मेट्या सब जाइ।
अकथ कहाणी प्रेम की, कह्या न को पत्याइ॥10॥
निगु साँवाँ वहि जायगा, जाकै थाघी नहीं कोइ।
दीन गरीबी बंदिगी, करता होइ सु होइ॥11॥
दीन गरीबी दीन कौ, दुँदर को अभिमान।
दुँदर दिल विष सूँ भरी, दीन गरीबी राम॥12॥
कबीर नवे स आपको, पर कौं नवे न कोइ।
घालि तराजू तौलिये, नवे स भारी होइ॥14॥
बुरा बुरा सब को कहै, बुरा न दीसे कोइ।
जे दिल खोजौ आपणो, बुरा न दीसे कोइ॥15॥)
कबीर चेरा संत का, दासिन का परदास।
कबीर ऐसे ह्नै रह्या, ज्यूँ पांऊँ तलि घास॥13॥
रोड़ा ह्नै रही बाट का, तजि पादंड अभिमान।
ऐसा जे जन ह्नै रहे, ताहि मिले भगवान॥14॥632॥
रोड़ा भया तो क्या भया, पंथी को दुख देइ।
हरिजन ऐसा चाहिए, जिसी जिमीं की खेह॥18॥
खेह भई तो क्या भया, उड़ि उड़ि लागे अंग।
हरिजन ऐसा चाहिए, पाँणीं जैसा रंग॥19॥
पाणीं भया तो क्या भया, ताता सीता होइ।
हरिजन ऐसा चाहिए, जैसा हरि ही होइ॥20॥
हरि भया तो क्या भया, जैसों सब कुछ होइ।
हरिजन ऐसा चाहिए, हरि भजि निरमल होइ॥21॥
कबीर के दोहे सम्पूर्ण 54000 शब्दों में Part-7
कबीर के दोहे सम्पूर्ण 54000 शब्दों में Part-6
कबीर के दोहे सम्पूर्ण 54000 शब्दों में Part-5
कबीर के दोहे सम्पूर्ण 54000 शब्दों में Part-4
कबीर के दोहे सम्पूर्ण 54000 शब्दों में Part-3
कबीर के दोहे सम्पूर्ण 54000 शब्दों में Part-2
कबीर के दोहे सम्पूर्ण 54000 शब्दों में Part-1
Can you be more specific about the content of your article? After reading it, I still have some doubts. Hope you can help me.
Obrigado, muito legal, seu artigo abriu uma porta para mim. Foi uma grande ajuda para me ajudar a escrever minha tese sobre criptomoedas. Obrigado.
Thanks for sharing. I read many of your blog posts, cool, your blog is very good.
Thanks for sharing. I read many of your blog posts, cool, your blog is very good.
I don’t think the title of your article matches the content lol. Just kidding, mainly because I had some doubts after reading the article.
Your point of view caught my eye and was very interesting. Thanks. I have a question for you. https://accounts.binance.info/register?ref=P9L9FQKY
Can you be more specific about the content of your article? After reading it, I still have some doubts. Hope you can help me.
Thank you for your sharing. I am worried that I lack creative ideas. It is your article that makes me full of hope. Thank you. But, I have a question, can you help me?
Your point of view caught my eye and was very interesting. Thanks. I have a question for you. https://accounts.binance.com/ar/register?ref=V2H9AFPY
2Sin1kLbiAT2CLYy5cvEsYpXsOB
I want examining and I conceive this website got some truly useful stuff on it! .
Wow, marvelous blog format! How long have you ever been blogging for?you made blogging glance easy. The full look of your site is great, let alone the content!
You’re so awesome! I do not think I’ve truly read through anything like that before. So wonderful to find someone with genuine thoughts on this subject. Really.. many thanks for starting this up. This website is something that is needed on the web, someone with a little originality.
Hello to every body, it’s my first visitof this website; this blog carries remarkable and in fact good material designed for readers.
An impressive share! I’ve just forwarded this onto a co-worker who was doing a little research on this. And he actually bought me breakfast simply because I stumbled upon it for him… lol. So let me reword this…. Thanks for the meal!! But yeah, thanks for spending time to talk about this matter here on your web page.
I truly love your site.. Pleasant colors & theme. Did you build this website yourself? Please reply back as I’m trying to create my own personal blog and would like to learn where you got this from or just what the theme is named. Appreciate it.
Hiya very cool website!! Guy .. Excellent .. Amazing .. I will bookmark your blog and take the feeds additionally?KI am glad to find a lot of helpful information here in the put up, we’d like work out more techniques in this regard, thanks for sharing. . . . . .
I seriously love your blog.. Great colors & theme. Did you make this site yourself? Please reply back as I’m wanting to create my own blog and would love to know where you got this from or what the theme is called. Thanks.
I was able to find good info from your content.
That is a great tip particularly to those fresh to the blogosphere. Simple but very accurate information… Thank you for sharing this one. A must read post!
|Hello to all, for the reason that I am actually keen of
nhà cái hubet
So I’m doing a sequence of speeches over the subsequent a number of weeks, but I got here to Chattanooga at this time to discuss the first and most vital cornerstone of middle-class security, and that’s a great job in a durable, rising industry.
Your article helped me a lot, is there any more related content? Thanks!
This is a topic close to my heart cheers, where are your contact details though?
díky tomuto nádhernému čtení! Rozhodně se mi líbil každý kousek z toho a já
I’m really enjoying the design and layout of your website. It’s a very easy on the eyes which makes it much more pleasant for me to come here and visit more often. Did you hire out a developer to create your theme? Outstanding work!
Reclaiming what’s yours shouldn’t be complicated. That’s why our methodology is user-friendly andopen.You just need to supply some basic information, and we’ll manage the rest.Don’t let technical problems prevent you from your hard-earned money.It’s our mission to ensure the return of every dime.
I blog quite often and I really thank you for your content. This article has really peaked my interest. I will book mark your blog and keep checking for new information about once per week. I subscribed to your Feed as well.
Děkuji|Ahoj všem, obsah, který je na této stránce k dispozici.
これらは、本学の構想を考える上で多くの示唆を与えることとなった。学生最後の高校野球では惨敗して引退したが、片思いする葉月に告白する願掛けでホームランを打とうとしていた時に瑛太と再会する。地球連邦軍宇宙軍、軌道哨戒第3戦隊司令。地球連邦軍元帥。地球連邦軍情報部長官。宇宙軍の中では珍しい地球生まれの艦長で、L5戦役で生き残った歴戦の軍人。清濁併せ呑める狡猾な人物で、利用価値のあるものは敵対勢力でも利用し、利用価値がないものは味方ですら平然と切り捨てる冷酷無比な部分を持つ。
Hey, I think your website might be having browser compatibility issues. When I look at your blog site in Firefox, it looks fine but when opening in Internet Explorer, it has some overlapping. I just wanted to give you a quick heads up! Other then that, wonderful blog!
Hi there! Do you know if they make any plugins to safeguard against hackers? I’m kinda paranoid about losing everything I’ve worked hard on. Any suggestions?
As well as, this has provided many more jobs for the Cincinnati area, and will dramatically increase the airport’s operations.
The Ice Water Hack has gained popularity as a simple yet effective method for boosting metabolism and promoting weight loss.
Write more, thats all I have to say. Literally, it seems asthough you relied on the video to make your point.You definitely know what youre talking about, why waste your intelligence on just posting videos to your site when you could be giving ussomething informative to read?
If you are going for finest contents like me, simply go to seethis site daily for the reason that it gives quality contents,thanks
Im grateful for the blog. Awesome.
pokračovat v tom, abyste vedli ostatní.|Byl jsem velmi šťastný, že jsem objevil tuto webovou stránku. Musím vám poděkovat za váš čas
A8BTyWSKqcB
Very nice article. I absolutely appreciate this site. Stick with it!
You have made some really good points there. I checked on the net for more info about the issue and found most people will go along with your views on this website.
Wow, incredible blog layout! How long have you been blogging for? you make blogging look easy. The overall look of your site is wonderful, as well as the content!
Home Page, Consolidated Hearth Association.
This web site really has all the info I needed about this subject and didn’t know who to ask.
good post.Never knew this, appreciate it for letting me know.
Buying a Home During Inflation – Here’s a tip given by a real estate agent.
To understand what public domain means, it helps to grasp what copyrights are and why they exist, based on S. Sean Tu, a professor of law at West Virginia College Faculty of Regulation, who has taught courses in copyright, trademark and patent regulation.
If you would like to get a good deal from this piece of writing then you have to apply such strategies to your won web site.
Introducing to you the most prestigious online entertainment address today. Visit now to experience now!
Thank you for your sharing. I am worried that I lack creative ideas. It is your article that makes me full of hope. Thank you. But, I have a question, can you help me?
This blog was… how do I say it? Relevant!! Finally I’ve found something which helped me. Thanks a lot.
What’s Happening i’m new to this, I stumbled upon this I’ve found It positively useful and it has helped me out loads. I hope to contribute & aid other users like its aided me. Good job.
You could definitely see your enthusiasm in the work you write. The world hopes for more passionate writers like you who aren’t afraid to say how they believe. Always go after your heart.
I found your weblog site on google and check a few of your early posts. Continue to keep up the excellent operate. I simply further up your RSS feed to my MSN Information Reader. Searching for forward to studying extra from you afterward!…
Nice post. I study one thing more difficult on totally different blogs everyday. It is going to always be stimulating to learn content from other writers and practice somewhat something from their store. I抎 desire to use some with the content material on my weblog whether or not you don抰 mind. Natually I抣l give you a link in your internet blog. Thanks for sharing.
公益社団法人日本水難救済会. “くま クマ 熊 ベアー 5”.主婦と生活社.演:沖わか子 小雪と同室の看護婦。虎之介の結婚後はたびたび後を追い回し、新婚夫婦をゲンナリさせる。虎之介に惚れていたが、最終的には新との結婚を祝福。 お互いの感情の行き違いから離婚寸前まで陥ったが周囲の取りなしもあり龍之介と復縁。演:河内桃子龍之介の妻。演:水野哲 龍之介と章子との一人息子。
There are actually a variety of details like that to take into consideration. That is a nice level to bring up. I offer the ideas above as general inspiration however clearly there are questions like the one you convey up the place an important thing will probably be working in honest good faith. I don?t know if greatest practices have emerged around issues like that, but I’m positive that your job is clearly recognized as a good game. Each girls and boys feel the influence of only a second’s pleasure, for the remainder of their lives.
I love it whenever people get together and share opinions. Great blog, keep it up!
https://semaglupharm.com/# SemagluPharm
Great work! This is the type of information that should be shared around the web. Shame on the search engines for not positioning this post higher! Come on over and visit my web site . Thanks =)
The core of your writing while appearing reasonable originally, did not really settle well with me personally after some time. Somewhere within the sentences you actually managed to make me a believer but only for a very short while. I however have a problem with your jumps in assumptions and one might do nicely to fill in those breaks. In the event you can accomplish that, I could surely end up being impressed.
A noisy air conditioner may be unreasonable, even throughout a well being heat alert, if a residential noise enforcement officer determines the noise is unnecessarily impactful.
Having read this I believed it was extremely enlightening.I appreciate you taking the time and energy to put this information together.I once again find myself personally spending a significant amount of time both reading and posting comments.But so what, it was still worth it!
Would you be keen on exchanging links?
Hey there! This post couldn’t be written any better! Reading through this post reminds me of my old room mate! He always kept chatting about this. I will forward this write-up to him. Pretty sure he will have a good read. Many thanks for sharing!
reading this weblog’s post to be updated daily.
الاستمرار في توجيه الآخرين.|Ahoj, věřím, že je to vynikající blog. Narazil jsem na něj;
Greetings! I know this is somewhat off topic but I was wondering which blog platform are you using for this site? I’m getting tired of WordPress because I’ve had issues with hackers and I’m looking at options for another platform. I would be awesome if you could point me in the direction of a good platform.
grupo do facebook? Há muitas pessoas que eu acho que iriam realmente
Esta página tem definitivamente toda a informação que eu queria sobre este assunto e não sabia a quem perguntar. Este é o meu primeiro comentário aqui, então eu só queria dar um rápido
buď vytvořil sám, nebo zadal externí firmě, ale vypadá to.
Obrigado|Olá a todos, os conteúdos existentes nesta
vykřiknout a říct, že mě opravdu baví číst vaše příspěvky na blogu.
que eu mesmo criei ou terceirizei, mas parece que
fortsæt det gode arbejde stipendiater. Med at have så meget indhold og artikler gør du det
har også bogmærket dig for at se på nye ting på din blog Hej! Har du noget imod, hvis jeg deler din blog med min facebook
مرحبًا، أعتقد أن هذه مدونة ممتازة. لقد عثرت عليها بالصدفة ;
information.|My family members every time say that I am killing my time here
|Hello to all, for the reason that I am actually keen of
) Vou voltar a visitá-lo uma vez que o marquei no livro. O dinheiro e a liberdade são a melhor forma de mudar, que sejas rico e continues a orientar os outros.
Podem recomendar outros blogues/sites/fóruns que tratem dos mesmos temas?
muito dele está a aparecer em toda a Internet sem o meu acordo.
e dizer que gosto muito de ler os vossos blogues.
I was very happy to uncover this web site. I need to to thank you for your time due to this wonderful read!! I definitely really liked every little bit of it and i also have you book-marked to look at new things on your blog.
webové stránky jsou opravdu pozoruhodné pro lidi zkušenosti, dobře,
devido a esta maravilhosa leitura!!! O que é que eu acho?
) Znovu ho navštívím, protože jsem si ho poznamenal. Peníze a svoboda je nejlepší způsob, jak se změnit, ať jste bohatí a
Howdy would you mind sharing which blog platform you’re using? I’m looking to start my own blog soon but I’m having a hard time making a decision between BlogEngine/Wordpress/B2evolution and Drupal. The reason I ask is because your design and style seems different then most blogs and I’m looking for something unique. P.S My apologies for getting off-topic but I had to ask!
nenarazili jste někdy na problémy s plagorismem nebo porušováním autorských práv? Moje webové stránky mají spoustu unikátního obsahu, který jsem vytvořil.
enten oprettet mig selv eller outsourcet, men det ser ud til
Hmm it seems like your website ate my first comment (it was extremely long) so I guess I’ll just sum it up what I had written and say, I’m thoroughly enjoying your blog. I as well am an aspiring blog blogger but I’m still new to the whole thing. Do you have any recommendations for inexperienced blog writers? I’d definitely appreciate it.
But wanna state that this is very beneficial, Thanks for taking your time to write this.
I appreciate the effort that goes into creating high-quality content, and this post was no exception. The insights and information were top-notch and made for a really engaging read. Keep up the great work!
Your article helped me a lot, is there any more related content? Thanks!
Com tanto conteúdo e artigos, vocês já se depararam com algum problema de plágio?
gruppe? Der er mange mennesker, som jeg tror virkelig ville
Díky moc!|Hej, jeg synes, dette er en fremragende blog. Jeg snublede over det;
You’re so interesting! I do not think I have read a single thing like that before. So good to find someone with some original thoughts on this subject matter. Seriously.. thanks for starting this up. This website is something that is needed on the internet, someone with a bit of originality.
Děkuji|Ahoj všem, obsah, který je na této stránce k dispozici.
apreciariam o seu conteúdo. Por favor, me avise.
The easiest way to resolve a conflict is thru compromise.
The maple leaf is a logo for Canada and has been on the flag for the nation since 1965.
In 2010, the Dodd-Frank Wall Street Reform and Consumer Protection Act expanded the CFTC’s regulatory authority into the swaps markets.
In October 2009, native Palestinians confirmed that Hamas had fired at Israeli troops from adjoining a UN faculty for ladies the place hundreds of Palestinians had sought refuge, resulting in civilian casualties.
|Tato stránka má rozhodně všechny informace, které jsem o tomto tématu chtěl a nevěděl jsem, koho se zeptat.|Dobrý den! Tohle je můj 1. komentář tady, takže jsem chtěl jen dát rychlý
fortsæt med at guide andre. Jeg var meget glad for at afdække dette websted. Jeg er nødt til at takke dig for din tid
gruppe? Der er mange mennesker, som jeg tror virkelig ville
) Vou voltar a visitá-lo uma vez que o marquei no livro. O dinheiro e a liberdade são a melhor forma de mudar, que sejas rico e continues a orientar os outros.
Thanks for sharing. I read many of your blog posts, cool, your blog is very good.
Wonderful work! This is the type of info that should be shared around the net. Shame on Google for not positioning this post higher! Come on over and visit my site . Thanks =)
webové stránky jsou opravdu pozoruhodné pro lidi zkušenosti, dobře,
webové stránky jsou opravdu pozoruhodné pro lidi zkušenosti, dobře,
skupině? Je tu spousta lidí, o kterých si myslím, že by se opravdu
Thanks, I’ve just been looking for info about this topic for a while and yours is the greatest I have discovered till now. However, what concerning the conclusion? Are you positive in regards to the supply?
Can you be more specific about the content of your article? After reading it, I still have some doubts. Hope you can help me.
Your point of view caught my eye and was very interesting. Thanks. I have a question for you.
I like the valuable info you provide in your articles. I will bookmark your weblog and check again here regularly. I am quite sure I’ll learn lots of new stuff right here! Best of luck for the next!
Write more, thats all I have to say. Literally, it seems as though you relied on the video to make your point. You obviously know what youre talking about, why waste your intelligence on just posting videos to your weblog when you could be giving us something informative to read?
Your article helped me a lot, is there any more related content? Thanks!
great issues altogether, you simply won a brand new reader.
What would you recommend about your put up that you just made a few days in thee past?
Any positive? https://Fortune-glassi.mystrikingly.com/
great issues altogether, you simply won a brand new reader.
What would you recommend about your put up that youu jusxt made a few days in the
past? Any positive? https://Fortune-glassi.mystrikingly.com/
“東京ゲームショウ2022 結果速報! “東京ゲームショウ2013結果速報! “東京ゲームショウ2015結果速報! “東京ゲームショウ2018結果速報! “東京ゲームショウ2019結果速報! “東京ゲームショウ2014結果速報! “東京ゲームショウ2017結果速報! “東京ゲームショウ2016結果速報! “東京ゲームショウ視聴は3160万回を突破 オンラインの収穫と課題【TGS2020】”.東京ディズニーシーお土産・ BBQ内で使用する豊田市の特産品は、ブース内のポスターから専用ページに飛んで購入することやふるさと納税から様々な特産品をGETすることも可能です。
Thank you for sharing your personal experience and wisdom with us Your words are so encouraging and uplifting
While his partners impatiently await their cut up of the loot, Lt.